आज की भाग-दौड़ भरी जिंदगी और अत्यधिक व्यस्तता के बीच आनलाइन सामान पहुंचाने का कारोबार न केवल रोजगार का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत बन गया है, बल्कि यह उपभोक्ताओं के लिए एक बड़े बाजार की शक्ल ले चुका है। खासकर कोविड महामारी के बाद से इसमें जबरदस्त उछाल आया है और अब मांग पर हर तरह के उत्पाद मिनटों में घर पर पहुंच जाते हैं। मगर तत्काल सामान पहुंचाने की होड़ में इस कार्य से जुड़े कर्मियों पर आनलाइन कंपनियों के दबाव और उनकी सुरक्षा को लेकर चिंताएं भी बढ़ी हैं।
सामान पहुंचाने के दौरान सड़क हादसों में मौत हो जाने की देश भर में कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। यही वजह है कि केंद्र सरकार ने अब दस मिनट में सामान पहुंचाने से संबंधित कंपनियों के दावों पर रोक लगाने का आदेश दिया है। सवाल है कि आखिर सरकार को इस मामले में हस्तक्षेप क्यों करना पड़ा? क्या संबंधित कंपनियों की यह जिम्मेदारी नहीं है कि वे अपने कर्मियों की सुरक्षा और बेहतरी की फिक्र करे?
बीते वर्ष के आखिरी दिन यानी 31 दिसंबर 2025 को घर पर सामान पहुंचाने वाले कर्मियों ने हड़ताल का आह्वान कर अपनी दिक्कतों की तरफ देश, समाज और सरकार का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की थी। कुछ अरसे से ऑनलाइन बाजार की यह कह कर हिमायत की जा रही है कि इससे रोजगार के नए अवसर सृजित हुए हैं और उपभोक्ताओं को भी अपनी पसंद के सामान की खरीदारी का आसान विकल्प मिल गया है। साथ यह भी कहा जाता है कि इस क्षेत्र में काम करने वाले कर्मियों को अपने कार्य की अवधि खुद तय करने की आजादी है।
मगर, क्या वास्तव में उन्हें काम करने की आजादी है? निर्धारित समय के भीतर सामान पहुंचाने और प्रतिदिन का लक्ष्य पूरा करने का दबाव कई बार उन्हें मानसिक ही नहीं, बल्कि शारीरिक तकलीफ भी देता है। इस दबाव में सड़क पर तेज रफ्तार में दोपहिया वाहन चलाने से हर समय जान का जोखिम बना रहता है। ऐसे में दस मिनट में सामान पहुंचाने के वादों पर रोक लगाना निहायत जरूरी हो गया था।
नीति आयोग की वर्ष 2022 की एक रपट के अनुसार, वर्ष 2020 में देश भर में आनलाइन मांग पर सामान पहुंचाने वाले कर्मियों की संख्या करीब 77 लाख थी और यह आंकड़ा 2030 तक 2.35 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। इससे यह बात तो स्पष्ट है कि आनलाइन बाजार के कारोबार से रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं, लेकिन साथ ही संबंधित कंपनियों की प्रतिस्पर्धा में कर्मियों की सुरक्षा और काम के दबाव का संकट भी पैदा हुआ है।
कहा जा रहा है कि सरकार के आदेश के बाद आनलाइन कंपनियों ने अपने मंच से दस मिनट में सामान पहुंचाने का दावा हटा लिया है। मगर इस तरह की कोशिशें फिर से किसी दूसरे रूप में न हों, इसके लिए सरकार की ओर से एक निगरानी तंत्र बनाने की जरूरत है। सरकार को संबंधति आनलाइन मंचों के साथ मिलकर यह कोशिश करनी होगी कि श्रमशक्ति का यह हिस्सा सुरक्षित वातारण में विकास और सामाजिक गतिशीलता की सीढ़ी बने और उनके अधिकारों की भी रक्षा हो सके।
