कुछ समय पहले मैंने उदयपुर से कमीज के लिए कपड़ा खरीदा था। सोचा कि अपनी मर्जी से सिलवा कर पहनूंगा। लेकिन मास्टरजी यानी दर्जी ने चीनी कॉलर के बजाय सामान्य शर्ट बना दी। कुछ देर गुस्सा भी आया कि कपड़ा खराब कर दिया। दुकान में खड़ा बहस कर रहा था, तभी गुस्सा शांत होता चला गया। मैंने पूछा कि क्या आजकल लोग कपड़े नहीं सिलवाते, जो इस तरह की लापरवाही हो गई! उन्होंने कहा कि आजकल कपड़े कौन सिलवा कर पहनता है।
सभी तो मॉल में जाकर बने-बनाए कपड़े ही लेते हैं। पता नहीं, आपने क्या सोचा! पिछले पंद्रह साल से बमुश्किलन कोई पैंट-शर्ट सिलवा कर ले गया होगा। मैंने पूछा कि फिर आपकी दुकान कैसे चलती है? पेट कैसे पालते हैं? उन्होंने बताया कि लोगों के कपड़े सिलवाने कम होते गए हैं। अब या तो दुकान में चौकीदारी या फिर बड़ी-बड़ी दुकानों के बाहर ‘आॅल्टर’ करने का काम करता हूं। रात में चौकीदारी करना भी मजबूरी है।
करीब बीस साल हो गए होंगे, जब मैंने दर्जी के सिले कपड़े पहने हों। आज चारों ओर ‘स्मार्ट सिटी’, ‘डिजिटल इंडिया’ की गुहार सुनी जा रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि इस डिजिटल इंडिया और स्मार्ट सिटी में हमारे मास्टरजी कहां होंगे। क्या सब्जी और क्या तेल, कपड़े या जूते, रोज की जरूरतों के सारे सामान एक स्थान पर मिलना एक किस्म से समय की बचत तो हो सकती है, लेकिन इन ‘एक छतीय हाट’ यानी मॉल में सामान की कीमतों में खासा अंतर देखा जा सकता है।
अगर कपड़े की बात करें तो तमाम राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय ब्रांड के कपड़ों की कीमतों की शुरुआत ही हजार रुपए से होती है। जो शर्ट और पैंट दो-ढाई सौ रुपए की लागत में तैयार होते हैं, उसकी कीमत हम सभ्य और नगरीय समाज के लोग ‘सत्तर प्रतिशत प्लस बीस प्रतिशत’ की छूट के टैग पर हजार, पंद्रह सौ देकर खरीदते हैं।
यह बाजार का एक छत में सिमटना है या बाजार का विकेंद्रीकरण, यह तो समाजशास्त्री और बाजार के गुरु बेहतर जानते हैं। लेकिन इन ‘एक छतीय बाजार’ में खुदरा व्यापारी रो रहा है। बचपन में अपने शहर डेहरी-आॅन-सोन के मुहल्ले में एक ‘मास्टर सैलून’ हुआ करता था। वह अब भी है, लेकिन उसके ‘नैन-नक्श’ बदल गए हैं। लकड़ी के तख्ते पर बैठ कर बाल कटाना और लगातार रोते रहना भी याद है।
पिछले दस सालों में उनकी भी दरों में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन एक छतीय बाजार की तुलना में काफी कम। सैलून वाले मास्टरजी अभी भी पंद्रह रुपए में और बीस रुपए में बाल-दाढ़ी बना देते हैं। लेकिन एक छतीय दुकानों में सौ रुपए तो शुरुआती दर है। यह अंतर साफतौर पर दर्जी पेशे में भी देखा जा सकता है। आज भी कस्बों और छोटे शहरों में दर्जी की दुकानें हैं, लोग कपड़े खरीद कर सिलवाने में विश्वास रखते हैं। लेकिन रेडिमेड का चस्का जिस शहर और गांव को लग चुका है, वहां टेलर मास्टर अब खास अवसरों पर ही व्यस्त हो पाते हैं।
प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ में हामिद दौड़ कर दर्जी के पास जाता है और वहां से अपना नया कुर्ता और नाड़े वाला पाजामा पहन कर पूरे मेले में रोशन होता है। उसी तरह हम लोग भी बचपन में शर्ट-पैंट सिलवाने के लिए मास्टरजी के पास जाते थे। तब नाप लेने के बाद जब तक तैयार नहीं हो जाते थे, हम रोज दुकान का चक्कर काटते थे।
जब तक हमारी शर्ट दुकान में टंगी हुई नहीं दिखाई देती, तब तक मास्टरजी की जान आफत में होती थी। पिछले साल उन्हीं बचपन के मास्टरजी से मुलाकात हुई। बताने लगे कि अब हमारी दुकान पर भीड़ नहीं होती। जिसे देखो, वही बने-बनाए कपड़े पहनने लगा है। किसी के पास इतना वक्त कहां है, जो सिलने का इंतजार करे। जब जी चाहा, तभी बनी-बनाई शर्ट और पैंट खरीद कर पहन लेते हैं। इन्हें देख कर लगता है कि पुराने कपड़े छोड़ कर वे नई कमीज पहन कर निकल गए… विचार की तरह!
हमारा समाज और बाजार बहुत तेजी से बदलाव के चक्र से गुजर रहा है, जहां मूल्य और कपड़े का ब्रांड अहम हो चुका है। जिस रफ्तार से बाजार हमारे घरों में खड़ा हो चुका है, उसे देखते हुए लगने लगा है कि हम बाजार में हैं या बाजार हममें। दर्जी की दुकानों में कपड़ों के थान और डंडों में लिपटे विभिन्न ब्रांडों के कपड़ों पर जाले लग रहे हैं।
अगर जेंडर की दृष्टि से इन मसलों पर नजर डालें तो थोड़ी उम्मीद की किरण दिखाई देती है। कुछ हद तक लड़कियां अब भी सलवार-कमीज दर्जी से सिलवाती हैं। लेकिन इस भरोसे दर्जी को कितने और दिनों तक बचाया जा सकेगा! काश, हम अपने आसपास के दर्जी को बचा पाएं!
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