सुबह-सुबह गांव का ओसारा यानी बरामदा क्यों याद आ गया, कुछ समझ में नहीं आया! यहां दिल्ली में द्वारका के फ्लैट में न वे लकड़ी के खंभे हैं, न उनमें बने घोंसलों में सूपाबेनी चिड़िया। काले पंख पर सफेद धारी की चमक लिए गौरैया के आकार वाली वह चिड़िया हमारे लिए आकर्षक थी। बचपन में बीते उन घंटों के सामने कोई घड़ी भी नहीं थी। समय उन्मुक्त भाव से हम बच्चों की गोद में बैठा था। सूपाबेनी कब आती है, कब जाती है, यही देखते रहते थे। फ्लैट की घंटी बजी। मित्र की आवाज थी- ‘नहीं चलना है कनाट प्लेस?’ मैंने कहा कि जल्दी मत करो यार, अपने गांव का बरामदा देख रहा हूं।
खपड़ा-नरिया से छाए छप्पर जब टूटने लगे तो गांव के रोशन मियां और वकील मियां बुलाए गए। बनाने में तीन दिन लगे। दोनों भाइयों को जलपान और मजदूरी दी गई। हम लोगों की आंखों में न कोई मुसलमान था, न हिंदू। सूपाबेनी उड़ती हुई कहीं दूर चली जाती थी और पेट भर कर लौटती थी। घोंसले में नवजात बच्चों के लिए अपनी चोंच में कुछ लेकर आती थी। उन्हें कैसे खिलाती है, वे कैसे खाते हैं! भूख कितनी रोचक बन जाती है! लेकिन इन फ्लैटों में कहीं कोई घोंसला नहीं। मुंडेरों पर आसपास कबूतर गुटर-गूं करते रहते हैं। लेकिन खिड़की के शीशे से हमें देख कर डर जाते हैं और उड़ जाते हैं आसमान की ओर।
सिर के पिछले भाग में बड़ा फोड़ा निकल आया था। गफार मियां की बुजुर्ग बहू दिख गर्इं। वे गांव की चीर-फाड़ वाली डॉक्टर थीं। मेरा फोड़ा देखा और कमर से चाकू कर निकाल चीर दिया। जाते-जाते कह गर्इं कि सिंदूर और तेल लगा देना। उसके बाद नीम की पत्तियां पीस कर पट्टी बांध देना। तीस साल बीत गए उस फोड़े को गए। गहरे दाग पर अंगुली जाती है तो वे याद आती हैं। मेरी मां मरीं तो घर में पूरे दिन उपवास रहा। मगर उन डॉक्टर साहिबा का जी नहीं माना। हम बच्चों को अपने घर ले गर्इं। भोजन कराया। इतना ही ज्ञान था कि किसी अपने की मौत पर घर में चूल्हा नहीं जलता।
अपार्टमेंट में नोटिस लगा हैं- ‘अमुकजी के बुजुर्ग पिताजी नहीं रहे। चार बजे शाम में शवदाह में शामिल होना है।’ सभी चुपचाप गए। कार में बैठे कुछ ने मौतों पर अपने संस्मरण सुनाए। फिर सभी अपने-अपने धंधे में लग गए। सामने की डाल पर बैठी चिड़िया हमें देख उड़ गई। मेरे बरामदे की सूपाबेनी भी उड़ जाती थी। ओसारे की सूपाबेनी उस दिन उदास और दुखी होकर उड़ी थी। ओसारा ढह गया था। घोंसले उजड़ गए थे। वह कहां जाकर बसेगी, उसे भी नहीं मालूम था।
उसके जैसे कई घोंसलों में मातम छाया था। पुरनिया लोगों ने एक नया मकान बनवा दिया। उसमें घोंसले नहीं थे, लेकिन आदमी के रहने के लिए जगह ज्यादा थी। यह घर सुग्रीव मिस्त्री की राय से बना था। बाद में पंडितों ने आंगन देख कर कहा कि आंगन सूर्यवेधी है। यानी वास्तुशास्त्र के अनुरूप नहीं है। इससे परिवार में दरिद्रता बनी रहेगी। डर कर आंगन ठीक कराया गया। दिशाशूल फ्लैट को अब कौन तोड़ेगा! हमें दिशाशूल से क्या लेना-देना! जो कमरा दिशाशूल में होगा, उसे किराए पर लगा देंगे।
सीवान के पास पचरूखी मेरा गांव है। अब गांवों में बिजली आने लगी है। जिस रात नहीं आती, पचरूखी अमावस के अंधकार में डूब जाता है। ठीक रही तो हर कमरे, बरामदे में चांदनी चमक जाती है। पंखे हिलने-डुलने लगते हैं। यहां चिकनगुनिया और डेंगू का इतना हल्ला नहीं है। नए मकान की पक्की छत है। कुछ परिचित लोग दौड़े-भागे अपने घरों को लौट रहे हैं। रात में एक बजे का समय है। कोई नाटक देख कर लौटे हैं। जोकर की बातें याद कर हंसते जा रहे हैं। अब सो जाएंगे। टूटी खाट है कि चौकी या दरवाजे का चबूतरा, नींद गहरी आती है। यहां फ्लैट के पड़ोसी नींद की गोलियां लेते हैं। अनिद्रा सुबह का दुखड़ा बन जाती है।
तभी सोचता हूं कि ओसारे की चौखटों में बने चिड़ियों के कोटरों से जब कई सूपाबेनी उड़ कर निकल गर्इं तो वे कहां गई होंगी, कैसी होंगी। पेड़ों में घोंसला नहीं बना सकतीं। कौवे और सांपों से डर है। सुरक्षा तो सभी को चाहिए! ये ओसारे, फ्लैट सभी हमारी सुरक्षा के लिए ही बने हैं। कबूतरों से पूछने की इच्छा होती है कि बता सकते हो, मेरे ओसारे की सूपाबेनी कहां गई! ये कबूतर सूपाबेनी को नहीं जानते, जैसे इस महानगर में हम बहुतों को नहीं जानते। कभी खामोश भी रहना चाहिए। सारे परिचय सुख नहीं देते।
रमाशंकर श्रीवास्तव
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