कई लोगों से यह सुना-जाना है कि अमुक बस या ट्रेन के सफर में किसी परिवार या व्यक्ति से परिचय हुआ और वह परिचय एक सुदीर्घ मैत्री में बदल गया, भले ही ‘दोनों पक्ष’ अलग-अलग शहरों के हों। और कुछ परिचय ऐसे भी होते हैं, जो किसी सुदीर्घ मैत्री में नहीं बदलते, न ही दोनों पक्ष फिर शायद कभी आपस में मिल पाते हैं, पर जितनी देर साथ रहते हैं, उतनी देर एक सख्य बना रहता है। कभी-कभी सोचता हूं, यह जो ‘तटस्थ’ जगहें होती हैं- किसी सड़क-गली, बस-बाजार-स्टीमर आदि की- वे भी किसी सुदीर्घ मैत्री या थोड़ी देर के आत्मीय सख्य भाव में अपना योग देती हैं। गुलेरीजी की ‘उसने कहा था’ कहानी इस संदर्भ में हमेशा याद आती है।

समाज और सामाजिकता का अर्थ यही है कि हम एक सहयोगी की भूमिका में भी रहें। एक-दूसरे के दुख-सुख और दिलचस्पियां जानें।
लेकिन देखता हूं कि आजकल एक सशंक-भाव सहयात्रियों में बना रहता है। बातचीत जल्दी से नहीं शुरू होती है। शताब्दी या राजधानी एक्सप्रेस में सफर करते हुए मैंने पाया है कि अगर मैं कुछ पूछ या बता कर सहयात्री की ओर मुखातिब न होऊं, तो कई घंटे अनबोले बीत जा सकते हैं। हवाई यात्राओं में तो यह अनबोला आमतौर पर बना ही रहता है। एक-दूसरा दृश्य भी आजकल अक्सर दिखाई पड़ता है। अगर आपके डिब्बे में कोई नेता सफर कर रहा हो तो उसके इर्द-गिर्द सुरक्षा गार्ड रहते हैं। वह अपने साथ आए किसी सहयोगी या सहयोगियों से ही बतियाता रहता है। किसी और सहयात्री से उसकी भेंट ही नहीं होती।

बहरहाल, दो पक्षों का सफर के दौरान मिलना-जुलना, बतियाना, साथ रहना इस कारण से भी होता है कि सफर में उपस्थित हुए किसी संकट के वक्त वे एक-दूसरे के काम आ सकते हैं। दरअसल, यह ‘तथ्य’ कहीं मन-मस्तिष्क की भीतरी तहों में बसा होता है। जो भी हो, सफर के दौरान हुई मैत्रियां बड़ी प्रिय और मूल्यवान होती हैं। वे ‘सामाजिक-सहयोग’ में हमारा भरोसा बढ़ाती हैं। पिछले दिनों भोपाल में मेरे एक प्रियजन यह बता रहे थे कि यूरोप के एक ‘पैकेज टूर’ में उनके साथ कई दंपति या परिवार थे। शुरू-शुरू के संकोच के बाद वे सब एक-दूसरे से कुछ इतना खुले कि लगा सभी वर्षों से परिचित थे। अब उनमें से कइयों से इ-मेल, फोन, वाट्सऐप या फेसबुक पर उनकी मुलाकातें होती रहती हैं।

यह भी तथ्य है कि अपने परिवार के अलावा जो रिश्तेदारियां बनती हैं, वे आमतौर पर अपरिचितों को पास लाकर उनसे परिचय करवाती हैं। अपरिचित ही परिचित बनते हैं। रवींद्रनाथ ठाकुर ने ‘गीतांजलि’ के एक गीत में लिखा है- ‘कत अजानारे जानाइले तुमि, कत घरे दिले ठांई/ दूर के करिले निकट, बंधु, पर के करिले भाई।’ यानी ‘पहचान मिली अनजानों की/ कितनी जगहों पर ठांव मिली/ जो दूर कहीं थे, बंधु बने/ जो पर थे, प्रियजन कहलाए’।

तो जो अपरिचित होते हैं, जिन्हें पहले कभी देखा नहीं होता, वे अचानक एक दिन जीवन-यात्रा में साथ हो लेते हैं, साथ बने रहते हैं। बिछुड़ जाते हैं, तो भी कहीं रहते हैं हमारे भीतर, क्योंकि उन्होंने मनुष्य पर भरोसे की हमारी धारणा और विश्वास में कोई गांठ लगा दी होती है। वे ‘अपरिचित’ किसी भी उम्र, देश-प्रदेश, भाषा के हो सकते हैं। सो, आज फिर याद आ रही है सात-आठ वर्ष की उस लड़की की, जो एक बार हमें ‘राजधानी’ में, दिल्ली से हावड़ा तक की यात्रा में मिली थी। वह एक बंगाली मां और तमिल भाषी पिता की संतान थी। पिता वायु सेना में अफसर थे। वह अपनी मां के साथ कोलकाता जा रही थी- नाना-नानी से मिलने। उससे मेरी बातें कुछ बांग्ला, कुछ हिंदी, कुछ अंगरेजी में भी होती रहीं। उसने न जाने कितनी बातें अपने स्कूल, परिवार, सहेली की मुझे और मेरी पत्नी को बतार्इं। उसकी मां, उसकी बातों पर मुस्कराती रहीं। उससे फिर भेंट नहीं हुई। न उसकी सारी बातें याद रहीं।

ऐसी ही मुलाकातें कुछ धुंधली, कुछ स्पष्ट-सी याद आती रहती हैं। सचमुच ये भरोसा जगाती हैं मानव-संबंधों में गहराई और प्रीति का। कभी करुणा और कभी सहज ही सहयोग और रक्षा का। मुझे अभी तक तो किसी सहयात्री ने ‘ठगा’ नहीं है। जयपुर के एक कलाकार शिविर में भेंट हुई थी आॅक्सफोर्ड की कलाकार हेलेन गैनली से। सामान्य परिचय हुआ। लेकिन जब देसी-विदेशी कलाकारों से भरी हुई बस रणथंभौर का अभयारण्य देखने पहुंची तो मैंने पाया कि मेरी पत्नी, बेटी वर्षिता और मेरे साथ-साथ वे चल रही हैं। खूब बातें हो रही हैं। हम साथ-साथ ही पशु-पक्षियों की गतिविधियों पर टिप्पणी कर रहे हैं। कोई घंटे भर बाद ऐसा लगा, मानो हम उन्हें वर्षों से जानते हैं। वे मेरी ही उम्र की हैं, सो विनोद पूर्वक बोलीं- ‘हम जुड़वां हैं, बिछड़ गए थे।’

(प्रयाग शुक्ल)

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