आलोक कुमार मिश्रा

कुछ लोग कहते हैं कि इतिहास पढ़ना और पढ़ाना बहुत नीरस काम है। पर वास्तव में ऐसा है नहीं। आपसी बातचीत में सामाजिक विज्ञान के शिक्षक दसवीं कक्षा में इतिहास विषय के अंतर्गत ‘यूरोप में राष्ट्रवाद’ नामक अध्याय को अमूमन एक कठिन पाठ मानते हैं। उनके अनुसार इसमें फ्रांस, ब्रिटेन, इटली, जर्मनी आदि यूरोपीय देशों के बारे में बहुत से तथ्य हैं, जो बच्चों ही नहीं, शिक्षकों को भी काफी नीरस लगते हैं। पर शायद ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि शिक्षक इतिहास को दिनों, घटनाओं, नामों आदि का क्रमवार विवरण मान कर पढ़ाते हुए उन्हें याद कर लेने या करा देने की समझ के साथ काम कर रहे होते हैं।

अगर इसकी जगह ऐतिहासिक प्रक्रियाओं में मानसिक रूप से मुब्तिला होकर तत्कालीन परिस्थितियों का एक जीवंत अनुभव कर पाएं और वर्तमान के बनने में उसके महत्त्व को इंगित कर पाएं तो बात बन सकती है। इन सबके लिए सबसे पहले जरूरी है कि विद्यार्थियों के मन में पाठ के प्रति उत्सुकता जगाना। कुछ मजेदार कथन, विवरण, वर्तमान की जांच-पड़ताल, गतिविधि आदि इसमें उपयोगी हो सकते हैं।

जब फ्रांस की क्रांति और उसका विश्व पर प्रभाव बताने के लिए मैं विद्यार्थियों के समक्ष उस समय के रूढ़िवादी आस्ट्रियाई शासक मैटरनिक का कथन दुहराता हूं कि ‘जब फ्रांस छींकता है तो पूरे यूरोप को जुकाम हो जाता है’ तो बच्चे फ्रांस के महत्त्व को रेखांकित करते हुए उसके इतिहास को जानने की उत्सुकता से भर जाते हैं। जब उन्हें बताता हूं कि अभी सौ-डेढ़ सौ साल पहले दुनिया का नक्शा बिल्कुल अलग था, पूंजीवाद-उदारवाद और राष्ट्रवाद के घालमेल से बहुत कुछ बदल गया है, तब वे आश्चर्य से भर जाते हैं।

सत्रहवीं-अठारहवीं सदी के नक्शे में वे जर्मनी, इटली जैसे राष्ट्र ढूंढ़े नहीं पाते हैं। वे हंस पड़ते हैं, जब सुनते हैं कि इटली के एकीकरण के बाद भी वहां के बहुत से आम लोगों को यह मालूम नहीं था कि इटली है क्या? उस समय एक पत्रकार ने जब एक आम नागरिक से पूछा कि ‘इटली क्या है?’ तब उसने बहुत सोचते हुए कहा कि ‘यह हमारे राजा की रानी का नाम है।’

दरअसल, रानी ‘ला-टालिया’ को ही उसने ‘इटालिया’ समझा। ये सब संदर्भ सुनते ही बच्चों की आंखों से इतिहास का दरवाजा खोल उसमें घुसने और उसके अनदेखे-अनजाने कोनों की पड़ताल करने की लालसा झांकने लगती है।

ब्रिटिश शासन के विस्तार और प्रभाव के लिए जब उन्हें इस कथन पर सोचने को कहता हूं कि ‘ब्रिटिश लोग गर्व से क्यों कहते थे कि उनके राज्य में कभी सूरज नहीं डूबता?’ तब वे तरह-तरह के कायास लगाते हुए खुद ही भूगोल में पढ़े गए दिन-रात की संकल्पना से जुड़ कर सही उत्तर की ओर बढ़ने लगते हैं। मारियान और जर्मेनिया के चित्र उन्हें भारत माता की संकल्पना और चित्र को समझने के तार्किक पक्ष की ओर ले जाते हैं।

वे राष्ट्रों के महिला रूपकों के जन्म की कथा और उसमें निरंतर आए बदलावों को किसी परीकथा की तरह ही सुनते हैं और वर्तमान में सुनिश्चित-सी हो गई छवियों में अपनी कल्पना के रंग भरने शुरू कर देते हैं। जैसे, एक बार कक्षा में एक राजस्थानी बच्चे ने उत्साहित होते हुए कहा था कि, ‘मैं भारत माता की एक नई तस्वीर बनाऊंगा। उसमें भारत माता राजस्थानी कपड़े में होगी और ऊंट पर बैठी होगी।’ दरअसल, बच्चा समझ चुका था कि राष्ट्र का मानवीय रूपक हमारी ही इच्छाओं का एक सहज निरूपण है।

आजादी की लड़ाई में शामिल आदिवासियों के अकथ संघर्ष को सुन कर वे दांतों तले उंगली दबा लेते हैं और उनके संबंध में बनी उनकी सारी छवियां उलट-पलट जाती हैं। दांडी यात्रा पर बढ़ते गांधी और महाड़ सत्याग्रह पर डटे आंबेडकर मेरी कक्षा को गतिमान बना देते हैं। पानी और नमक जैसी बेहद मूलभूल जरूरत पर केंद्रित करते हुए बच्चों को औपनिवेशिक और जातीय भेदभाव की परिस्थितियों में इन पर लगे कठोर नियंत्रण की कल्पना करने का अवसर देते ही राष्ट्रीय आंदोलनों की सार्थकता सिद्ध होनी शुरू हो जाती है।

विद्यार्थी इन राष्ट्र नायकों के कायल हो जाते हैं, जब वे इनके प्रतीकात्मक ही नहीं, जीवनगत संदर्भों से जुड़ कर आंदोलन खड़ा कर देने की क्षमता से परिचित होते हैं। बच्चों को बहुत अच्छा लगता है यह जान कर कि इतिहास सिर्फ राजा-रानियों की जीवनी, युद्धों का यशगान या अत्याचारों का मार्मिक आख्यान नहीं है, बल्कि इसमें आम लोगों, किसानों, मजदूरों, साधारण स्त्री-पुरुषों और बच्चों की सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

उन्हें खेलों, परिधानों, खानपान की आदतों आदि की अतीत यात्रा लुभाती है। बस उसका प्रस्तुतीकरण इस तरह का हो, जिसमें उनके सोचने, प्रतिक्रिया करने, विचार साझा करने, असहमत होने की बराबर गुंजाइश रहे। अब बताइए, इतिहास नीरस है क्या? बिल्कुल नहीं। बस उसके साथ गोता लगाना होता है, मोती हाथ आता ही है।