बात छह जनवरी 1984 की है। दिल्ली विश्वविद्यालय में अमृता प्रीतम आमंत्रित थीं। सभा के बाद वे मेरी मित्र उषा पुरी के घर आर्इं। तब तक उन्हें इमरोज जैसे प्रेमी का साथ मिल चुका था। बहुत देर तक हम उन दोनों की उपस्थिति की ऊष्णता का आनंद आत्मसात करते रहे। इमरोज ने बताया कि अमृता के कमरे में उन्होंने ऐसी लाइटें लगाई हैं, जिससे वे हर कोण से जब जैसे चाहें लिख-पढ़ सकें और यह भी कि दोपहर को वे दोनों मिल कर खाना बनाते हैं।

लगभग दो घंटे बाद जब हम लोग उन्हें विदा करने सीढ़ियों तक गए तो बिजली गुल हो चुकी थी। मैं उन्हें टॉर्च से रास्ता दिखाने आगे चली तो उन्होंने इमरोज का हाथ पकड़ कर उतरना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा था- ‘मेरे पास तो अपनी रोशनी है, तुम लोग अपना इंतजाम कर लो।’ सब लोग हंस पड़े। साथ ही मुझे महसूस हुआ कि जीवन भर जिस प्रेम की उन्हें तलाश थी, वे उसे पा गई हैं। मैंने उनकी किताब ‘धूप का टुकड़ा’ पर उनके हस्ताक्षर के लिए अनुरोध किया था। बड़े प्यार से उन्होंने लिखा था- ‘परछांवयां ते परदा पौण वालेओ, छाती च बलदी अग का परछावा नहीं हुंदा।’

मैं तब तक उनकी आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ पढ़ चुकी थी। याद आया कि यह कविता तब लिखी गई थी, जब कुछ ऐसे लोगों ने उनका मन दुखाया था, जिनका सिवाय समकालीन और हमजबां होने के उनसे कोई वास्ता न था। पंजाबी साहित्यकारों ने पूर्वाग्रहपूर्ण आलोचना की थी। एक बार नहीं, हर बार और ताजिंदगी। अमृता प्रीतम के दर्द के बीज ‘आक’ के पेड़ के बीजों की तरह रूई के पंख लगा कर सारे विश्व में अंकुरित हुए और दोस्ती के हजारों हाथ आगे बढ़े। पंजाबियों ने अपनी जरखेज जमीन को अमृता के लिए बंजर बना लिया था।

नुकसान पंजाब का ही हुआ। पर अमृता प्रीतम की छाती में आग जलती रही। आश्चर्य होता है कि हिंदी भाषा के कद्रदानों, अखिल भारतीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के उच्चतम पुरस्कारों ने भी इस आग को ठंडा नहीं किया। उन्हें लगता था कि उनकी ‘जिंद रूपी कुड़ी’ के मुंह की बुरकी (निवाला) इस बेरहमी से एक झपट्टे में छीन ले गई कि गालों पर खरोंचे पड़ गर्इं, होंठ लहूलुहान हो गए। यह उद्गार अमृता के घायल मन को उघाड़ कर रख देते हैं- ‘जिंद कुड़ी ने कल रात नूं, सुपने दी एक बुरकी मन्नी/ एक झपट्टे बुरकी खुस्सी, दोवें हत्थ बलूंधर घते/ एक झपट्टे गल्ल झरीटी, नुंदर वज्जी मुंह दे उत्ते!’

अमृता प्रीतम की कविताओं से गुजरना प्यार की अनबूझ प्यास का साक्षात्कार है। एक चिर किशोर मन की स्वप्निल संसार का दर्शन है। अपने कल्पना-पुरुष को हाड़मांस में पाने की प्रबल लालसा है। प्रेम को पाने के लिए कंटीले रास्तों का सफर उन्होंने खुद चुना। प्यार के मिलन का आनंद और विरह की वेदना दोनों की अभिव्यक्ति के लिए उनके उपमान बिंब और प्रतीक अछूते हैं। जितने कोमल भाव उतनी ही नाजुक अभिव्यक्ति।

अमृता प्रीतम ने बारहमासे की तर्ज पर प्रिय की विरह वेदना को लोक मन से जोड़ा है। चैत, वैशाख और फिर सावन जब धरती ने अंजुरी बना कर अंबर की रहमत को पीया, पर वह नहीं आया- ‘बदला दी दुनिया छा गई/ धरती ने बुक्कां जोड़ के अंबरदी रहमत पी लई/ पर तूं नहीं आया।’ चांद, सूरज, तारे, आकाश, धरती रसोई के उपकरण- सब अमृता के नाजुक खयालों को जामा पहनाने के लिए होड़ में रहते थे। ऐसे टटके उपमान सुनने वाले की संवेदनाओं को तीखा करते जाते हैं। फिर अमृता प्रीतम की लय से भरपूर वाणी कविता की भीतरी आत्मा की संवाहक थी।

पचास के दशक में दिल्ली के आकाशवाणी केंद्र से प्रसारित पंजाबी कार्यक्रम! ठीक आठ बजे लोग सब काम छोड़ कर रेडियो के नजदीक आ जाते थे। ‘आवाज दी दुनिया दे दोस्तों, मेरा आदाब’- अमृता प्रीतम पंद्रह मिनट तक उद्घोषणाएं नहीं, बल्कि गद्य-गीतों की रचना करती चलती थीं। इस बहुआयामी लेखिका की कलम हर विधा को आबाद कर गई। कहानी, उपन्यास, संस्मरण, दर्शन कुछ नहीं छूटा। अपने समय की सच्चाइयों को इन विधाओं में उकेरती चली गई।

विभाजन की त्रासदी को अमृता प्रीतम ने झेला था। उनकी कविता ‘अज्ज आखां वारिस शाह नूं, किते कब्रा विच्चों बोल, ते अज्ज किताबे इश्क दा कोई अगला वरका फोल’, पाकिस्तान और हिंदुस्तान की सीमाओं को तोड़ कर जैसे एक साझा चीत्कार है। इस कविता को उन दिनों लोग अपनी जेब में रखते थे। निकाल कर पढ़ते, जीभर कर रोते, तह कर जेब में रख लेते, फिर पढ़ने के लिए। ऐसी सर्जनशीलता कभी विलीन नहीं होती। अमृता प्रीतम से शब्द उधार लेकर उन्हीं को अर्पित- ‘बुत तेरा सूरजी/ अदब दे वरके तेरे/ जल्द-जल्द वी फोलेगा कोई/ बदलां दी बारी खोल के इक टोटा धुप्प दा/ धरती ते उतर आएगा।’

(कानन झींगन)

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