समाज पर बाजार का जोर ज्यों-ज्यों बढ़ता जा रहा है, उपभोक्ताओं को भ्रमित करके उनसे फायदा उठाने के नए-नए तरीके भी देखने को मिल रहे हैं। साधारण और भोले लोग एक तरह से इस ठगी के इस मायाजाल में फंसते चले जा रहे हैं और इससे निकलने का कोई रास्ता उन्हें नजर नहीं आ रहा हैं। आम लोग अपने सभी घरेलू और रोजमर्रा के काम में आने वाले सामान की गारंटी-वारंटी, बीमा और सर्विसिंग के चक्कर में हैरान-परेशान हैं। इसके अलावा, आजकल बीमा पॉलिसियों की जानकारी के नाम पर आने वाली फोन कॉल ने भी जीना दूभर कर रखा है। विज्ञापन और मार्केटिंग के नए तरीके दरअसल ठीक से देखने और किसी के भुक्तभोगी होने पर ठगी जैसे लगते हैं। इसके आधुनिक और अजब-गजब तरीकों से बाजार भरा पड़ा है। अगर किसी ने अपने वाहन का बीमा करा रखा है और यह जान कर खुद को सुरक्षित समझ रहा है कि दुर्घटना के बाद राशि का दावा उसे सही-सही मिल जाएगा, तो वह एक तरह के मुगालते में होता है।

हालांकि बीमा कराने के दौरान बीमा प्रतिनिधि अपने उपभोक्ता को आश्वस्त करता है कि दुर्घटना के बाद उसे शत-प्रतिशत या मामूली राशि काट कर मुआवजा मिल जाएगा। मगर दुर्घटना का मुआवजा देते समय कंपनियां बिल में से एक बड़ी राशि लोगों से वसूल कर लेती हैं। भुक्तभोगी को बताया जाता है कि इसमें कुछ पार्ट्स के पैसे और दूसरे मदों में होने वाले खर्च आपको वहन करने होंगे। जाहिर है, वाहन का मालिक ठगा-सा रह जाता है। कई बार यह राशि उसके बिल की चौथाई से पचास फीसद तक होती है। किसी की कार की मरम्मत करने वाली वर्कशॉप को यह भली-भांति पता है कि उसे वाहन मालिक से यह राशि कैसे निकलवानी है। लोग चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते हैं। इसी तरह घरेलू सामान की एएमसी यानी मरम्मती के सालाना अनुबंध के नाम पर कुछ संस्थाओं और कंपनियों के विज्ञापनों की भरमार देखने को मिल जाती है। सेवा सर्विसिंग के नाम से घरेलू सामानों, मसलन एसी, फ्रिज, वाशिंग मशीन, टीवी, कंप्यूटर आदि सामानों की एएमसी की जाती है।

मगर व्यक्ति को जोरदार झटका उस समय लगता है जब कोई सामान खराब हो जाता है और वह एएमसी करने वाली कंपनी या संस्था को फोन करता है। अव्वल तो कंपनी का व्यक्ति जरूरत के वक्त पर आता नहीं है और अगर आ भी गया तो किसी महंगे पार्ट को खराब बता कर दुरुस्त करने के नाम पर लेकर चला जाता है। फिर कई हजार का बिल थमा कर वसूली होती है। तकनीकी जानकारी नहीं होने के कारण आम उपभोक्ता कुछ समझ नहीं पाता है कि उससे जो पैसा लिया जा रहा है, वह जरूरी और वाजिब है या नहीं। उधर वार्षिक रखरखाव की सेवा देने वाले उपभोक्ता को मूर्ख बना कर पैसा बनाने में सफल हो जाते हैं। इस तरह की घटनाएं हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल हो चुकी हैं।

दूसरी ओर, एएमसी की सेवा देने वाली कंपनी अपने मैकेनिक को मेहनताने या तनख्वाह के नाम पर बहुत कम राशि देती है। एक एएमसी करने वाली कंपनी में काम कर चुके परिचित ने मुझे बताया कि इलेक्ट्रॉनिक सामान के पार्ट्स को ठीक करने के नाम पर हम दो-तीन गुणा अधिक राशि वसूल कर लेते हैं। उदाहरण के लिए, अगर एसी के पंखे की मोटर जल जाती है तो बाजार में यह चार सौ रुपए में ठीक कर दी जाती है। मगर हमारी कंपनी उपभोक्ता से आठ सौ से एक हजार रुपए वसूल लेती है। यही हालत अन्य घरेलू उपकरणों की है।
इसी तरह जब लोग कोई घरेलू इलेक्ट्रॉनिक सामान खरीदते हैं तो एक से पांच साल की वारंटी दी जाती है।

शर्तें बहुत ही छोटे अक्षरों में लिखी जाती हैं जो आमतौर पर पढ़ने में नहीं आतीं। वारंटी अवधि में उपकरण खराब हो गया तो उसे ठीक कराना या बदलवाना टेढ़ी खीर है। जिस नंबर पर शिकायत दर्ज करवाई जाती है, वहां बड़ी मुश्किल से संपर्क हो पाता है। शिकायत के बाद लेटलतीफी के साथ कोई मैकेनिक आता भी है तो वह परेशानी बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ता है। फ्रिज खराब हो गया और वारंटी अवधि में हैं तो वह उसे वर्कशॉप ले जाने और परिवहन शुल्क के नाम पर मोटे पैसे वसूल लेता है। फिर बताया जाएगा कि जो पार्ट्स खराब हैं, उसे ठीक कर दिया है। मगर कुछ ऐसे पार्ट्स होते हैं, जिनकी कोई वारंटी नहीं होती। उसकी राशि वसूली जाती है। अच्छी सर्विस के नाम पर उपभोक्ता एक तरह से ठगी के मायाजाल में फंस कर खुद को असहाय महसूस करता है। मुश्किल यह भी है कि वस्तुओं की वारंटी से लेकर किसी भी तरह की सेवा की शर्तों को लेकर न लोग जागरूक हैं और न संबंधित महकमों को इस मसले पर जन-जागरूकता पैदा करने की जरूरत महसूस होती है। (बाल मुकुंद ओझा)