दादरी के बिसाहड़ा गांव में हादसा हुआ या षड्यंत्र, इसमें अपन नहीं पड़ेंगे। लेकिन उसके बाद जो हो रहा है, उसमें बेशक हादसा जैसा कुछ भी नहीं है। सभी ओर से केवल षड्यंत्र रचा जा रहा है। दादरी में राजनीति नहीं करने की गुहार राजनेता ही लगा रहे हैं। सत्ता की राजनीति करने वाले कैसे पक्ष-विपक्ष की राजनीति को सामाजिक राजनीति से दूर रख सकते हैं? इस सत्तान्मुखी राजनीति में कर्मकांड, वैचारिक विवेक और आध्यात्मिक आदर्श ताक पर रख दिए गए हैं। ध्रुवीकरण की कोशिशों में धैर्य की अधीरता साफ झलक रही है।

मगर दादरी के बिसाहड़ा गांव का दर्द बहुत बड़ा है, जिसके मुहाने पर एक राज्य सरकार है, फिर केंद्र सरकार है और एक पड़ोसी राज्य सरकार है। उनके अलावा सांप्रदायिक ताकतें हैं और पंथनिरपेक्षता के भी ठेकेदार हैं। गांधीजी ने हिंद स्वराज में ‘पाठक-संपादक’ संवाद में इस विषय पर अपने विचार रखे थे। हर चुनाव के समय गांधी-नाम का जाप करने वाले राजनीतिक दल क्यों जीत के बाद गांधी-वाद को भूल जाते हैं? गांधी-नाम को पकड़ कर गांधी-विचार को छोड़ने वाले समाज के सामने वही बात दोहराना या रखना जरूरी है।

उसमें एक पाठक कहता है- ‘अब गोरक्षा के बारे में अपने विचार बताइए।’ संपादक का जवाब है- ‘मैं खुद गाय को पूजता हूं, यानी मान देता हूं। गाय हिंदुस्तान की रक्षा करने वाली है, क्योंकि उसकी संतान पर हिंदुस्तान का, जो खेती प्रधान देश है, आधार है। गाय कई तरह से सबसे उपयोगी जानवर है। वह उपयोगी जानवर है, यह तो मुसलमान भाई भी कबूल करेंगे। लेकिन जैसे मैं गाय को पूजता हूं, वैसे मैं मनुष्य को भी पूजता हूं। जैसे गाय उपयोगी है वैसे ही मनुष्य भी- फिर चाहे वह मुसलमान हो या हिंदू- उपयोगी है। तब क्या गाय को बचाने के लिए मैं मुसलमान से लड़ूंगा? क्या उसे मैं मारूंगा? ऐसा करने से मैं मुसलमान का और गाय का भी दुश्मन बनूंगा।

इसलिए मैं कहूंगा कि गाय की रक्षा करने का एक यही उपाय है कि मुझे अपने मुसलमान भाई के सामने हाथ जोड़ने चाहिए और उसे देश की खातिर गाय को बचाने के लिए समझाना चाहिए। अगर वह न समझे तो गाय को मरने देना चाहिए, क्योंकि वह मेरे बस की बात नहीं। अगर मुझे गाय पर अत्यंत दया आती हो तो अपनी जान दे देनी चाहिए, लेकिन मुसलमान की जान नहीं लेनी चाहिए। वही धार्मिक कानून है, ऐसा मैं मानता हूं।

‘हां’ और ‘नहीं’ के बीच हमेशा बैर रहता है। अगर मैं वाद-विवाद करूंगा तो मुसलमान भी वाद-ववाद करेगा। अगर मैं टेढ़ा बनूंगा, तो वह भी टेढ़ा बनेगा। अगर मैं बलिश्त-भर नमूंगा, तो वह भी नमेगा; और अगर वह नहीं भी नमे तो मेरा नमन गलत नहीं कहलाएगा। जब हमने जिद की तब गोकशी बढ़ी। मेरी राय है कि गोरक्षा प्रचारिणी सभा को गोवध प्रचारिणी सभा कहना चाहिए। ऐसी सभा का होना हमारे लिए बदनामी की बात है। जब गाय की रक्षा करना हम भूल गए तब ऐसी सभा की जरूरत पड़ी होगी।’

एक ऐसी ही समस्या उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के आसपास के गांव में उभरी थी। करीब दस साल पहले वहां सौ से ज्यादा गायों को कटने से गांव वालों ने रोका था। तब खुली छोड़ दी गई गाएं आज कुछ हजार के आसपास हो गई हैं। किसानों को रात भर खेतों पर ही सोना पड़ता है क्योंकि उन्हें डर रहता है कि गाएं खेतों में घुस कर पैदावार को नष्ट कर देंगी। गोरक्षा संस्थाओं या सरकारी योजनाओं ने गौशालाओं को सुचारु रूप से चलाने के कोई संयोजित कार्यक्रम नहीं बनाए। केवल गोरक्षा के राजनीतिक आह्वान के अलावा गो-संरक्षण की इच्छाशक्ति सरकार या समाज में नदारद है। बाजारवाद को बढ़ाने में लगाए गए समाज में गाय के प्रति संवेदना महज औपचारिक रह गई है।

आज की वैचारिक बियाबानी से पांच सौ साल पहले कबीर ने भी पंथ और मजहब के कट्टरवादी लोगों को कसाई कहा था। कहा था- ‘अवधू दोनों दीन कसाई/ अल्ला राम का मरम न जाना/ झूठी सौगंध खाई।’ इसी कैनावत की साखी है- ‘कटू बचन कबीर के/ सुनत आग लग जाय/ शीलवंत तो मगन भया/ अज्ञानी जल जाय।’ कबीर की मानवीय समरसता में हाथ-पैर से कर्म करना और आध्यात्मिक विचार का समावेशी समाज रहा है।

विकास और परिवर्तन के सपनों में कहीं सामाजिक समरसता और शासनात्मक बदलाव न खो जाए। जहां विदेश में डिजिटल इंडिया की गौरवपूर्ण गाथा गढ़ी जा रही है, वहीं देश में दादरी जैसी घटना बार-बार शर्मसार करने के लिए उठ खड़ी होती है। समाज स्वयंभू राजनीति के बजाय सामाजिक समरसता से चलता और टिकता है। समाज टिकेगा तभी सत्ता टिकी रह सकती है।
संदीप जोशी
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