भारतीय सिनेमा की प्रसिद्धि और प्रासंगिकता पूरे विश्व में विख्यात है। उन्नीसवीं सदी में शुरू की गई नाटक कला और अभिनय ने पर्दे पर खूब रंग और संगीत बिखेरा। समय के साथ सिनेमा कब हमारे बीच हम सबका अहम हिस्सा बन गया, इस बात पर भी अध्ययन किए जाने की जरूरत है।

सिनेमा केवल मनोरंजन का जरिया हुआ करता था, लेकिन आज के दौर में बॉलीवुड और सिनेमा जगत एक भद्दा मजाक, आरोप-प्रत्यारोप का अखाड़ा और गुनाहों का मंजर बन गया है। जबकि अब तक इसी सिनेमा की दुनिया ने हमें प्रसिद्ध, प्रतिष्ठित और सद्भावपूर्ण कलाकारों से रूबरू कराया है और उनके अभिनय को हम तक पहुंचाया।
लेकिन बीते दो दशक के दौरान सिनेमा जगत के मायने और उसकी रूपरेखा बदलती गई है।

न जाने वह मंच कहां गया, जिसमें हर कलाकार एक दूसरे की सराहना करते नहीं थकते थे। भाईचारे की मिसाल देते थे, एक दूसरे का सहारा बनते थे। अब परिस्थितियां विपरीत हो गई हैं। अब अभिनय के रंगमंच पर कलाकारों का ऐसा अप्रत्यक्ष चेहरा देखने को मिलता है, बोली में ऐसी अभद्रता सुनाई पड़ती है, जिससे इस क्षेत्र के गौरव, मान-सम्मान, काबिलियत पर आंच आती है।

पिछले कुछ महीनों से बॉलीवुड ने ऐसे उतार-चढ़ाव देखे हैं, जिसमें अभिनय का हर पात्र बिखरा हुआ नजर आ रहा है। सिनेमा न जाने कब मनोरंजन के विकल्प से प्रसिद्धि और लोकप्रियता पाने के लिए किसी भी हद तक चले जाने का जरिया बन गया, इस बात का अंदाजा भी नहीं हो पाता है।
’निशा कश्यप, पटना, बिहार