हमारे समय में बेहतर विकल्प के लिए शुभू पटवा का दुनिया मेरे आगे ‘क्षमा और सहिष्णुता’ (17 सितंबर) लेख बहुत विचारणीय है। यह मूलत: व्यक्तिगत सद्गुण है, पर सामाजिक सद्गुण बन जाए तो इससे बड़ा संस्कृति के लिए कोई संदर्भ नहीं हो सकता। क्षमा करना बहुत कठिन है। कहना जरूर आसान है कि हां हमने क्षमा कर दिया, पर कितने लोग हैं, जो किसी को भी क्षमा कर पाते हैं! यह मन की अवस्था है। जब तक हम मन से किसी को क्षमा नहीं करते, तब तक कोई मतलब ही नहीं। यह तभी संभव होता है, जब व्यक्ति हर तरह के अहंकार और अहं से मुक्त हो। कह देना आसान है, लेकिन आचरण में ढालना कठिन। सामने हजार बातें, हजार संदर्भ आ जाते हैं- एक अलग ही अहं की दुनिया आ जाती है।
सबसे बड़ा प्रश्न ही यही है कि अहंकार से कैसे मुक्त हों? अगर अहं पीछा नहीं छोड़ता तो क्षमा भाव कहां से आएगा? यह कोई मंडी में बिकता नहीं कि कोई भी मोल ले ले। यह तो जीवन में सहज रूप से जन्मता है। इसे विशेष प्रयास करके जमाना पड़ता है। बचपन से ही क्षमा का भाव पैदा करना पड़ता है। यह आचरण की अवस्था है। इसी के समांतर सहिष्णुता है। जब हम किसी के प्रति क्षमाशील होते हैं तभी हम सहिष्णु भी हो पाते हैं। तभी इंसान को सही मायने में समझ पाते हैं। हमारे भीतर जो मनुष्य सोया है उसे जगाने का काम मूलत: क्षमा और सहिष्णुता के विचार ही करते हैं।
यह विचार मुख्य तौर पर देखा जाए तो मनुष्य की सर्जनात्मक शक्ति को सामने लाने का है। यहां रचनात्मक होकर ही जीवन की संभावना पर विचार किया जा सकता है। अगर जीवन के प्रारंभ में ही इस तरह के विचार से समाज का प्रशिक्षण हो जाए तो समाज हर तरह की हिंसा से मुक्त होकर जीवन का सही निर्माण करेगा। शुभू पटवा सही लिखते हैं कि इसका सही पाठ प्राथमिक शालाओं में दिया जा सकता है। घर और प्राथमिक पाठशाला ही देखा जाए तो सही मायने में एक बालक का निर्माण करती हैं। इस निर्माण की भूमि पर हमें सबसे ज्यादा गौर करने की जरूरत है।
विवेक कुमार मिश्र, बारां रोड, कोटा</strong>
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