दिल्ली सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य के बजट में बढ़ोतरी की है। एक सामान्य या गरीब नागरिक के लिए ये दोनों ही क्षेत्र बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। अगर एक गरीब आदमी की संतान को अच्छी शिक्षा मिल जाए और उसके स्वास्थ्य की अच्छी देखरेख हो जाए, इससे बड़ी क्या बात हो सकती है? अब जब दिल्ली सरकार ने इस क्षेत्र में बजट बढ़ाया है तो स्वाभाविक है कि इस दिशा में काम भी होगा। इसके लिए अन्य सुविधाओं के साथ-साथ नए स्कूल और नए अस्पताल खुलेंगे। इसके लिए जमीन चाहिए। दिल्ली में जमीन डीडीए के पास है और डीडीए केंद्र सरकार के अधीन है!
अच्छा होता अगर केंद्र सरकार बच्चों के भविष्य का खयाल रखते हुए इन मदों के लिए जमीन उपलब्ध कराने की पहल करती। पर जगह लेने की प्रक्रिया को सरल बनाने के स्थान पर और दिल्ली सरकार की मदद के स्थान पर राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में भाजपा और कांग्रेस वाले कह रहे हैं कि जब केजरीवाल के पास जमीन की दिक्कत थी तो उन्हें ऐसे वादे नहीं करने चाहिए थे!
उनके कहने का तो यही मतलब निकलता है कि भले ही नए स्कूल न खुलें और अस्पताल न खुलें हमें तो अपनी राजनीति करनी है। उनकी नजर में तो बच्चों के भविष्य से ज्यादा महत्त्वपूर्ण अपने राजनीतिक विरोधी को उसकी ताकत दिखानी है! इन जनकल्याण के कार्यों से केंद्र शासित प्रदेश के अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं होगा, बल्कि लोग केंद्र सरकार की प्रशंसा ही करेंगे! देश में किसी सरकार ने पहली बार उन मुद्दों की ओर ध्यान दिया है जिनसे सीधे जनता को लाभ होने वाला है। जनता की भलाई के काम में तो अगर-मगर नहीं होनी चाहिए! आलोचना या समालोचना का सवाल तो उस समय उठता है, जब जमीन देने के बाद दिल्ली सरकार अपने दायित्व का निर्वहन न करे।
(यतेंद्र चौधरी, वसंत कुंज, नई दिल्ली)
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