अपने देश के चुनावों में सांप्रदायिकता या धार्मिक आधार पर मतदाताओं का ध्रुवीकरण एक बड़ी समस्या है। सांप्रदायिक ध्रुवीकरणों के ‘धर्मनिरपेक्ष’ इलाज की कोशिश में जातीय और क्षेत्रीय अस्मिताओं को उभारा जाना भी उतना ही खतरनाक है। इसकी एक बानगी पिछले दिनों बिहार में देखने को मिली। एक मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के डीएनए में कुछ गड़बड़ी होने की बात कही तो नीतीश कुमार ने इसे बिहारी अस्मिता का प्रश्न बनाते हुए मोदी सरकार पर चौतरफा हमले किए। उनके प्रवक्ताओं ने अपने-अपने बचाव में एक-दूसरे पर अशोभनीय टिप्पणी करने का आरोप लगाया। दोनों तरफ से जान-बूझ कर भावनात्मक धुंध पैदा करने की कोशिश की गई। किसी ने नहीं सोचा कि ऐसी राजनीति का खमियाजा देर-सबेर बिहार को ही चुकाना पड़ेगा।
यहां आचार्य नरेंद्र देव के फैजाबाद वाले उपचुनाव का जिक्र करना प्रासंगिक होगा, जिसमें बाबा राघवदेव उनके विरुद्ध खड़े किए गए थे। चुनाव के दौरान कांग्रेस की ओर से परचा बांटा गया था, जिसमें गांधीजी और रामचंद्र की बातचीत में यह चिंता प्रकट की गई थी कि आचार्य नरेंद्र देव मार्क्सवादी हैं, जो साथ ही नास्तिक भी। वे ईश्वर को नहीं मानते, धर्म को नहीं मानते और राम को उनके मानने का सवाल ही नहीं। वे अयोध्या से जीत कर गए तो निश्चित ही वह धर्मध्वजा नीची हो जाएगी, जो अभी खूब ऊंची फहराती है। चुनाव कांग्रेसी और समाजवादी के बीच न होकर बाबा और नास्तिक के बीच हो गया। बेशक, कांग्रेस की जीत हुई और नरेंद्र देव चुनाव हार गए, मगर किस कीमत पर? यहां मुझे एक उर्दू शायर की पंक्ति याद आती है कि ‘पैहम सजूद पाए सनम पर दमे-विदा/ मोमिन खुदा को भूल गए इज्बरात में।’
इससे भारतीय राजनीति की पड़ताल करें तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारतीय राजनीति अपने लक्ष्य से भटक गई है। स्वार्थ से भीगी और कर्तव्य शिथिलता से तार-तार हुई राजनीति नव ऊर्जा की अपेक्षा रखता है।
बालेंद्र कुमार, दिल्ली विवि, दिल्ली
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