पिछले साल हुर्रियत नेताओं को गले लगाने के चलते विदेश सचिव स्तर की मुलाकात रद्द होने के बाद से ही पाकिस्तान दुनिया भर के सामने यह रोना रो रहा था कि भारत उससे बात करने को तैयार नहीं, लेकिन जब इसकी नौबत आई तो वह नए सिरे से पुरानी हरकतों पर उतर आया। सीमा पर आतंक फैलाने, आतंकी हमलों को अंजाम देने और संयुक्तराष्ट्र के साथ-साथ इस्लामी देशों के संगठन के समक्ष गुहार लगाने के बाद वह हुर्रियत नेताओं से मुलाकात पर अड़ गया।
इससे साफ है कि पाकिस्तान की दिलचस्पी बातचीत में नहीं, बल्कि कश्मीर के बहाने भारत को परेशान करने में थी। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने दो टूक यह स्पष्ट करके बिल्कुल सही किया कि हुर्रियत जैसा संगठन कश्मीर समस्या के समाधान में तीसरा पक्ष नहीं हो सकता। पाकिस्तान चाहता है कि अतीत में जाने-अनजाने हुर्रियत को उसका मौका बनने दिया जाए। देर से ही सही, मोदी सरकार ने इस गलती को ठीक करके सही किया। भारत के सख्त और कड़े रवैए से पाकिस्तान दबाव में आया और आखिरकार बिना किसी बातचीत किए भाग खड़ा हुआ।
शुभम सोनी, इछावर, मप्र
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