रिमोट से टीवी चैनल बदलते-बदलते एकाएक कोई दर्शक अगर सदन की कार्यवाही देख ले तो उसे अपने ‘माननीयों’ की हकीकत दिख जाएगी। हाल के दिनों में तो विपक्ष और सरकार के बीच कुछ ऐसा बवाल मचा है कि कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं। ऐसा दृश्य अमूमन किसी प्राइमरी विद्यालय का लगता है जहां अध्यापक (स्पीकर) के बार-बार कहने के बाद भी छात्रों का उत्पात जारी रहता है।

कुछ ऐसा ही सोमवार की कार्यवाही में भी देखने को मिला जब लोकसभा अध्यक्ष के बार-बार चेतावनी देने के बावजूद विपक्ष शोर शराबे और सदन को अखाड़ा बनाने में लगा रहा। इसका श्रेय भाजपा को भी जाता है। आखिरकार उसने भी बाते दस सालों में यही सब किया था।

और इसी बीच विदेश मंत्री ने किसी मेधावी छात्र की तरह रटा-रटाया बयान पढ़ते हुए अपने ऊपर लगे आरोपों को निराधार बताया। एक बार को हम मंत्रीजी के मानवीय दृष्टिकोण को समझ भी लें पर यह कैसे यकीन करें कि वे ललितगेट के सभी कपाटों को खोलने में सहयोग करेंगी। खैर, बस दिल इतना सोच कर रुक जाता हैं ‘आखिर नुकसान किसका’। जनता तो बस जब ऊब जाती है तो उसी रिमोट से चैनल ही बदलती हैं।
अमित साहू, दिल्ली</strong>

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