पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक बहुप्रचलित कहावत है, ‘ना खेलब ना खेले देइब, खेलइये बिगाड़ब’। इसका ताजा उदाहरण बिहार विधानसभा के चुनाव में देखा जा सकता है। भाजपा के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष मतों का बिखराव रोकने के लिए लालू और नीतीश ने महागठबंधन का सहारा लिया है। जहां नीतीश को पानी पी-पीकर कोसने वाले लालू यादव आजकल नीतीश का गुणगान करते नजर आ रहे हैं वहीं लालू यादव को हर वक्त कोसने वाले नीतीश आज उन्हें बिहार का गौरव बता रहे हैं। इसे सत्ता की चाह कहें या मोदी का डर? आज ये दोनों तलवारें एक ही म्यान में रहने को मजबूर हैं। यह गठबंधन ‘कहीं की र्इंट कहीं का रोड़ा भानुमती ने कुनबा’ जोड़ा जैसा ही है।
इस गठबंधन की मंशा मुसलिम-यादव वोट को पूरी तरह से अपनी ओर मोड़ने की है जिसमें फिलहाल सेंध लगती दिखाई दे रही है। ओवैसी की पार्टी एमआइएम के बिहार में चुनाव लड़ने से मुसलिम वोटों का बिखराव तय है। एमआइएम सीमांचल की 25 सीटों पर चुनाव लड़ेगी जहां मुसलिम मतदाताओं की भूमिका अहम मानी जाती है। अब भाजपा की कोशिश ओवैसी के सहारे इन वोटों को महागठबंधन के पक्ष में जाने से रोकने की होगी। ऐसा में सवाल है कि क्या बिहार के मुसलमान मतदाता वोटों के बंटवारे को बढ़ावा देगा या फिर एकजुट होकर अपनी ताकत का एहसास कराएगा?
प्रेम प्रकाश राय, साहिबाबाद
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