जब से राजनीति में संकीर्ण नजरिए और तंगदिमागी में इजाफा हुआ है तब से गंभीर मुद्दों की जगह बेसिर-पैर के फालतू या बकवासबाजी के मुद्दे केंद्रीय स्थान पाते जा रहे हैं। मीडिया भी सामाजिक सरोकारों के गंभीर मुद्दों की तुलना में बेसिर-पैर मुद्दों को अधिक महत्त्व देता और उन्हें चटखारे लेकर परोसता है।
भाजपा शासित मुंबई महानगर पालिका ने जैन समाज के पवित्र पर्व पर्यूषण को ध्यान में रखते हुए मांस की बिक्री पर कुछ दिनों के लिए प्रतिबंध लगाने का फैसला कर दिया था। लोगों में यह भी चर्चा है कि बिहार के चुनाव को ध्यान में रखते हुए इस तरह के मुद्दे को हवा देने की कोशिश की गई, जिससे भाजपा को जैन समाज की सहानुभूति मिल सके। अब न्यायालय ने मुंबई महानगरपालिका के निर्णय को खारिज करते हुए मांस बिक्री पर पाबंदी हटा दी है। पर इसकी इतनी अधिक चर्चा हो चुकी कि जो राजनीतिक संदेश भाजपा देना चाहती थी वह तो चला गया।
क्या हमारे सार्वजनिक निकायों को यह नहीं मालूम कि समाज के एक वर्ग की तुष्टि के लिए दूसरे समाजों को तकलीफ और नुकसान पहुंचाना अच्छी बात नहीं है, व्यापक जनहित में नहीं है, यह माहौल को विषाक्त बनाती है और समाज में विभाजन। इस तरह की अवांछनीय हरकतों का एकाधिकार केवल भाजपा के पास ही नहीं है, कांग्रेस यही करते-करते इस अधोगति को प्राप्त हुई, जहां से वह शायद ही कभी उभर पाए! अपने को प्रगतिशील जताने वाले लालू प्रसाद यादव जब नीतीश कुमार के विरोधी थे तब ग्रहण के दौरान नीतीश के बिस्कुट खाने की खिल्ली उड़ाई थी, जबकि नीतीश ने ग्रहण के दौरान कुछ खाकर अंधविश्वास को नकारा था जिस प्रगतिशील कदम की सराहना करनी थी उसे ही लालू ने मखौल का विषय बनाने की फूहड़ हरकत की थी। अगर मैं भाग्य पर भरोसा करता होता तो शायद यही कहता कि देश की जनता के भाग्य में ऐसे ही नेता लिखे हैं। लेकिन अब यही कह सकता हूं कि यह कमजोर शिक्षा, जागरूकता और वैज्ञानिक चेतना की कमी का परिणाम जरूर है।
श्याम बोहरे, बावड़ियाकलां, भोपाल
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