गुजरात के स्थानीय निकायों के चुनावी नतीजों को भाजपा और कांग्रेस अपने-अपने नजरिये से देख रही हैं। हानगरपालिकाओं और नगरपालिकाओं में इस बार भी भारी जीत दर्ज कर भाजपा मानती है कि उसकाजनाधार अब भी वैसे ही कायम है। दूसरी ओर, जिला पंचायतों में भारी बढ़त हासिल कर कांग्रेस फूले नहीं समा रही है। वह भाजपा के इस दुर्ग को फतह करन का सपना देखने लगी है।

पर भाजपा ही नहीं, कांग्रेस और अन्य पार्टियों के लिए भी इन नतीजों में एक सबक है। क्या वे यह पाठ पढ़ने को तैयार है? सबक यह है कि ग्रामीण इलाकों के लोग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। खेती पर आश्रित लोग पाते हैं कि इस व्यवस्था में उनका कोई भविष्य नहीं है। खेती लगातार घाटे का धंधा होती गई है। इस पर निर्भर लोग मजबूरी में ही इससे चिपके हुए हैं। किसानों को अक्सर उनकी उपज का वाजिब दाम नहीं मिल पाता है।

जब कीट-प्रकोप या मौसम की प्रतिकूलता आदि के चलते फसल मारी जाती है तब तो किसान मुसीबत में होता ही है, जब पैदावार अच्छी हो तब भी जरूरी नहीं कि खुशी हासिल हो। पैदावार का उचित मूल्य न मिलने से उसे हताश होना पड़ता है। आज किसान की आय छोटे-से छोटे सरकारी कर्मचारी के बराबर भी नहीं है।

इसलिए हैरत की बात नहीं कि सरकारी नौकरी के लिए मारामारी बढ़ रही है, आरक्षण के लिए उग्र आंदोलन हो रहे हैं, और दूसरी तरफ, खेती में लगे लोग इससे पिंड छुड़ाना चाहते हैं। इसे सिर्फ किसानों के संकट के रूप में देखना ठीक नहीं। यह हमारी खाद्य सुरक्षा के भी दिनोंदिन खतरे की तरफ बढ़ने का संकेत है। ग्रामीण गुजरात के मोहभंग को समूचे परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है।
’उमेश राय, पटना</strong>