आज भारत और इजराइल की दोस्ती को लगभग तीस साल होने को आए हैं। यह भी आश्चर्य की बात है कि इंदिरा जी के जमाने में हमारा देश इजराइल के पश्चिमी गाजा पट्टी पर बसे देश फिलस्तीन का समर्थन करता था, पर उससे हमें मिला कुछ नहीं। मगर जबसे हमने अपने संबंध इसराइल से बनाए हैं, भारत को काफी कुछ सीखने और खुद को मजबूत बनाने का मौका मिला है। भारत की यह अद्भुत साझेदारी तीस साल में गहरे सांस्कृतिक संबंध, सैन्य एवं आर्थिक सहयोग तक भी जा पहुंची है।

भारत ने इजराइल को मान्यता चाहे 17 सितंबर, 1950 को दी थी, लेकिन पूर्ण रूप से राजनीतिक संबंधों में प्रगाढ़ता 29 जनवरी, 1992 से आई है। यह खुशी की बात है कि पूर्व प्रधानमंत्री नेतन्याहू के सत्ता से हटने के बाद आज वहां के वर्तमान प्रधानमंत्री बेनेट भी आज की राजनीति में भारत का महत्त्व समझते हुए आज इस मित्रता को बढ़ाना और प्रगाढ़ करना उचित समझते हैं।

  • एमएम राजावत, शाजापुर

भाषा की भद्रता

राजनेताओं को बयानबाजी मर्यादा में रह कर करनी चाहिए, मगर समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के राजनेताओं की बेतुका, शर्मनाक और अभद्र बयानबाजी सामने आती रहती है। कई बार तो कुछ राजनेता अपने पद की मर्यादा का भी ख्याल नहीं रखते हैं। अभद्र भाषा का प्रयोग करने वाले की खुद की छवि ही खराब होती है, न कि उसकी जिसके लिए वह प्रयोग की जाती है।

ऐसी अभद्रतापूर्ण टिप्पणियों की जितनी निंदा की जाए उतनी कम है। सोचने वाली बात तो यह है कि पार्टी का आला नेतृत्व ऐसी घटिया बयानबाजी करने वालों के लिए सख्ती क्यों नहीं दिखाता? सवाल है कि चुनाव के समय राजनेता अभद्र भाषा का प्रयोग करके आखिर क्या सिद्ध करना चाहते हैं? क्या वे यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि वे ऐसा करके अपनी विरोधी राजनीतिक पार्टियों के लोगों को नीचा दिखाने की कोशिश करके आमजन की आंखों में धूल झोंक कर अपना वोट बैंक बढ़ा लेंगे। यह गलत सोच है। बेतुकी, अभद्र भाषा को आमजन कभी पसंद नहीं करता।

जो विवादित, निंदनीय या घटिया बयानबाजी करते हैं, उन्हें एक बात याद रखनी चाहिए कि जुबान से समाज में इज्जत बढ़ती है और जुबान से इंसान की इज्जत मिट्टी में मिलते देर नहीं लगती। इसलिए पहले सोचो, समझो, फिर बोलो। विश्व के सबसे लोकतंत्र के राजनेताओं को ऐसी अभद्र और घटिया बातें शोभा नहीं देती हैं। चुनाव आयोग को भी चाहिए कि वह ऐसी अभद्र और घटिया बातें करने वालों पर लगाम कसने के लिए उचित कदम उठाए।

  • राजेश कुमार चौहान, जालंधर

गांव की ओर

आज भी एक बड़ी आबादी गांवों में बसती है, लेकिन रोजगार और बेहतर शिक्षा के लिए गांवों से शहरों की ओर पलायन तेजी से बढ़ रहा है। और यही वजह है कि शहरों में कई तरह की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। वैसे अब गांवों की तरफ सरकरों का ध्यान जाने से सुधार तो हुआ है, मगर फिर भी सुविधाओं के लिहाज से वह बात नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों को बचाने के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास करने होंगे। बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के साधन उपलब्ध कराने होंगे। कृषि पर ध्यान देने की जरूरत है।