नोटबंदी के अब डेढ़ महीने से ज्यादा दिन हो गए हैं और अभी भी जरूरतमंदों की लाइन कम होती नजर नहीं आ रही। समस्याएं तो हर किसी को हो रही है, लेकिन शायद हर वर्ग के लोगों के बारे में यह कहना कठिन है। बात अगर छोटे व्यापारियों की हो, शादियों के खर्चे को लेकर चिंतित मां-बाप की, बैंक वालों की हो या फिर विद्यार्थियों की, सबमें एक चीज सामान्य है कि पैसे की मांग और पूर्ति के बीच लगातार दूरियां बढ़ती जा रही। पेटीएम पर दुकानें चल रही हैं, लेकिन ठेलों पर लगी जलेबियां पेटीएम के चक्कर में ठंडी पड़ती जा रही है। चूना पोतने वाले दिल्ली से अपने गांव की ओर पलायन करते नजर आ रहे हैं। मिडिल क्लास के लोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए बैंक जाते हैं और 3000 रुपए का चेक देते हैं। बैंक प्रबंधक 3000 को काट कर 2000 करने को कहता है और फिर 2000 का नोट मजबूरी में लेकर वह व्यक्ति सिर झुकाए घर आ रहा है।
अब 2000 रुपए का खुदरा करवाने के लिए परचून और सब्जी की दुकानों पर जाने पर पता चलता है, इसकी कोई कीमत नहीं है। ‘फेयर प्राइस’ और ‘बिग एप्पल’ ही 200 का सामान खरीदने पर खुदरा करने को राजी हो सकते हैं। बड़ी मुश्किल से खुदरा करवा कर 1800 रुपए लेकर घर पहुंचते हैं और घर में तब जाकर आठ तारीख के पहले वाली चेहरे पर एक थकी हुई रौनक देखने को मिलती है। यह तो सामान्य बात है कि बैंक से 2000 रुपए के नोट मिल रहे हैं। यह भी सामान्य बात है कि 20 रुपए के नोट 2000 रुपए के चेक देने पर मिल रहे हैं। लेकिन एक आसामान्य स्थिति तब आती है जब 2000 रुपए के चेक देने पर पांच रुपए के 400 सिक्के थमा दिए जाते है और दोनों हाथ में र्इंट की तरह से रख कर लोग वापस घर को लौटते हैं।
एक धारणा आजकल लगभग गायब होती दिख रही है कि सरकार का छोटे उद्योगों, खासकर हाथ से बने सामानों का हस्तकला, शिल्पों के लघु और मध्य के उद्योगों के विकास पर जोर देना। लेकिन उलट सच यह है कि नोटबंदी जैसी अवधारणा से उसका विनाश होना तय है। लघु उद्योग कमजोर पड़ गए हैं, खुदरा व्यापारी अपने सामानों की बिक्री करने के बजाय लाइन में लग कर अपना समय बर्बाद करते देखे जा सकते हैं। सब्जी वाला पेटीएम दिल्ली में तो रखे हुए है, लेकिन क्या गांव का दुकानदार पेटीएम रख कर बेचता नजर आ रहा है?
नोटबंदी से चुनिंदा लोगों के विकास का मार्ग दिखता प्रतीत हो रहा है। आजकल ऐसा लग रहा है कि विकास की प्रक्रिया में हम अमीर-गरीब के बीच की खाई को पाटने के बजाय और गहरा करते जा रहे हैं। विकास की प्रक्रिया में हम इतने प्रतिस्पर्धी होते चले जा रहे हैं कि शायद यह भूल जा रहे हैं कि हमने मिश्रित अर्थव्यवस्था की राह को कभी चुना था।
नोटबंदी में हम एक तरह से अपनी आजादी खोते जा रहे हैं। आधार कार्ड पर हमारे रुपयों की निर्भरता और अपने पहचानों का इस तरह उजागरीकरण शायद काले धन को समाप्त करने की राह पर चल तो रहा है पर दूसरी तरफ हम फिर से दासता की जंजीरों में जकड़े जा रहे हैं। पेटीएम पर बिक्री शायद आसान हो रही हैं, लेकिन इससे अमीर लोगों का वर्चस्व बढ़ता भी दिख रहा है। मोबाइल बैंकिंग सुविधा है लेन देन का, पर इस जाल में फंस कर लोग बर्बाद भी हो रहे हैं। बैंक की दिन-प्रतिदिन की नियमावली जिस तरीके से बदल रही है, यह लोगों को लाइन से शायद निजात दिलाने के लिए व्यवस्था हो रही है, लेकिन इससे कहीं न कहीं लोग भ्रमित होकर नियमों के सही प्रकार के जानकारी के अभाव में अपना अधिकार खोते नजर आ रहे हैं। क्या यही अपने देश के विकास का मॉडल है?
’प्रभात, दिल्ली विवि

