कोरोना महामारी ने एक ओर बहुत सारे देशों को आर्थिक स्तर पर कमजोर कर दिया है, वहीं इसका सबसे बुरा प्रभाव शिक्षा व्यवस्था पर पड़ा है। बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाली ब्रिटेन की संस्था ‘सेव द चिल्ड्रन’ का कहना है कि कोरोना महामारी ने एक ‘अभूतपूर्व शिक्षा आपातकाल’ खड़ा कर दिया है, जिसके कारण भारत जैसे देशों में करोड़ों बच्चों से शिक्षा का अधिकार छिन जाएगा।
यह एक चिंता का विषय है कि सरकारें शिक्षा के क्षेत्र में निवेश करने से कतराती हैं। जबकि मौजूदा आबादी के बीच अधिक से अधिक लोगों तक शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित हो सके, इसके लिए सरकार को महत्त्वपूर्ण कदम उठाने होंगे।
सन 1964 में ही इस मसले पर बने कोठारी आयोग ने सिफारिश किया था कि शिक्षा पर जीडीपी का छह प्रतिशत खर्च किया जाना चाहिए, लेकिन सरकारों की ओर से इस पर कोई विचार नहीं किया गया। कोरोना महामारी के बाद सरकार को इसके लिए तैयार रहना चाहिए कि शिक्षा के क्षेत्र को कैसे बचाया जा सके।
सेव द चिल्ड्रन संस्था का कहना है कोरोना महामारी के बाद सबसे विषम परिस्थिति शिक्षा के क्षेत्र में खड़ी होगी। संस्था का मानना है कि मानव इतिहास में पहली बार वैश्विक स्तर पर बच्चों की एक पूरी पीढ़ी की शिक्षा से बाधित होगी।
शिक्षा तक सभी की पहुंच हो और उसमें किसी प्रकार की असमानता न हो, इस विषय में सरकार को गंभीरता से विचार करना होगा, क्योंकि कोरोना महामारी के दौरान ही यह देखा गया है की साधन संपन्न बच्चों तक तो आॅनलाइन शिक्षा की पहुंच है, लेकिन संसाधनों से विहीन बच्चों तक आनलाइन शिक्षा नहीं पहुंच पा रही है। यह शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी असफलता को दर्शाती है। सरकार को इस ओर विशेष ध्यान देना चाहिए और सभी तक शिक्षा का अधिकार पहुंच सके, इसके लिए निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए।
’शेषमणि शर्मा, इलाहाबाद विवि, प्रयागराज
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