यूरोपीय यूनियन और भारत के बीच में जो फ्री ट्रेड डील हुई है, उससे शराब करोबार में उत्साह देखने को मिल रहा है, कई प्रीमियम ब्रॉन्ड की शराब अब सस्ती दरों में मिल सकती हैं। जानकारों को मानना है कि अब इस डील की वजह से जो शराब मार्केट अभी तक संरक्षित रहता था, वो अब ‘प्रीमियमकरण की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
क्या कह रहे हैं शराब कारोबारी?
असल मे एफटीए के बाद प्रीमियम रेंज वाली यूरोपीयन वाइन पर टैरिफ 150 फीसदी से घटकर 20 फीसदी हो जाएगा, वहीं मीडियम रेंज पर 30 फीसदी तक रहेगा। वहीं 2.5 यूरो से कम कीमत वाली वाइनों पर किसी भी तरह की ड्यूटी में छूट नहीं दी जाएगी। इसी तरह स्पिरिट्स पर ड्यूटी को 150 फीसदी से घटाकर 40 फीसदी कर दी जाएगी, बीर पर 110 से 50 फीसदी की जाएगी। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक 2026 के अंत तक इसे लागू कर दिया जाएगा।
इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए द बीयर कैफे के फाउंडर राहुल सिंह कहते हैं कि भारत का आज का ग्राहक वैरायटी पसंद करता है, उसे दुनिया के बड़े-बड़े ब्रान्ड्स में दिलचस्पी रहती है। एफटीए ती वजह से इंटरनेशनल बीयर, वाइन और स्पिरिट्स को ज्यादा बढ़ावा मिलेगा जिससे ड्रिकिंग एक्सपीरियंस भी और बेहतर हो जाएगा। हम क्योंकि खुद एक कंज्यूमर फेसिंग ब्रॉन्ड हैं. ऐसे में हमारे लिए यह एक सकारात्मक कदम है। राहुल के मुताबिक कस्टम ड्यूटी में किसी भी तरह की कटौती का सीधा फायदा उपभोक्ताओं की कीमतों पर पड़ता है। इससे उन विशेष उत्पादों को भी भारतीय बाज़ार तक पहुंच मिलती है जो शायद पहले एंट्री करने से हिचक रहे थे।
क्या शराब होगी सस्ती?
इस बारे में Passcode Hospitality के मैनेजिंग डायरेक्टर रक्षय धारिवाल ने भी अपने विचार रखे हैं। वे जोर देकर कहते हैं कि प्राइस रिडक्शन तभी लागू हो सकता है जब एग्रीमेंट को सही मायनों में सहमति मिल पाए और पुराना स्टॉक खत्म हो जाए। रक्षय ये भी मानते हैं कि भारत में कोई शराब को लेकर कोई एक दाम नहीं चलता है, हर राज्य का अपना तरीका है। ऐसे में महाराष्ट्र में शायद दाम ज्यादा गिर जाएं, वहीं गोवा और हरियाणा में कम असर देखने को मिले। धारिवाल यह भी मानते हैं कि प्रति बोतल कीमत 20 से 25 प्रतिशत तक कम हो सकती है, लेकिन देखने वाली बात यह होगी कि कंपनियां ग्राहकों तक कितना लाभ पहुंचाना चाहती हैं।
चुनौती क्या रहने वाली है?
वैसे भारत के जो ब्रॉन्ड हैं, उन पर भी इस ट्रेड डील का असर पड़ने वाला है। इस बारे में धारिवाल कहते हैं कि सबसे बड़ा असर इन्हीं लोगों पर आने वाला है। उन्हें अब सीधे-सीधे यूरोपीयन ब्रॉन्ड से टक्कर लेनी होगी। उनके मुताबिक कुछ ब्रॉन्ड्स को अब आयातित प्रतिस्पर्धियों से भी निपटना होगा। दिल्ली में आयातित टकीला के लिए लेबल रजिस्ट्रेशन की लागत सालाना 1 लाख रुपये है, जबकि अगावे ड्रिंक्स के लिए प्रति लेबल सालाना 25 लाख रुपये देने पड़ते हैं।
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