8th Pay Commission: 8वें केंद्रीय वेतन आयोग के टर्म्स ऑफ रेफरेंस (ToR) को लेकर पेंशनभोगियों में चिंताएं फिर से उभर आई हैं। सेंट्रल गवर्नमेंट पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन (CGPWA), जम्मू ने कथित तौर पर प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री को पत्र लिखकर कहा कि मौजूदा पेंशनभोगियों और पारिवारिक पेंशनभोगियों को 8वें वेतन आयोग के दायरे से बाहर रखा गया है।

CGPWA ने सरकार को लिखा पत्र

PTI की एक रिपोर्ट के अनुसार, CGPWA ने प्रधानमंत्री, केंद्रीय वित्त मंत्री, पेंशन राज्य मंत्री और केंद्रीय वेतन आयोग के अध्यक्ष को पत्र लिखकर 8वें केंद्रीय वेतन आयोग के टर्म्स ऑफ रेफरेंस पर आपत्तियां जताई हैं।

एसोसिएशन का कहना है कि अधिसूचित ToR 8वें वेतन आयोग के दायरे को केवल सेवारत केंद्र सरकार के कर्मचारियों तक सीमित करता है, जिससे मौजूदा पेंशनभोगी और पारिवारिक पेंशनभोगी अपने आप बाहर हो जाते हैं।

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पेंशनभोगियों को ToR से बाहर रखने का आरोप

CGPWA का दावा है कि 8वें वेतन आयोग के ToR जारी होने के बाद, वित्त मंत्री और अन्य मंत्रियों ने कई बयान देकर आश्वासन दिया था कि आयोग पेंशनभोगियों के हितों पर भी विचार करेगा।

हालांकि, एसोसिएशन का तर्क है कि ये आश्वासन 3 नवंबर, 2025 को अधिसूचित ToR में स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देते हैं।

एसोसिएशन ने यह भी बताया कि 2 दिसंबर, 2025 को वित्त मंत्रालय ने राज्यसभा में स्पष्ट किया था कि पेंशन को 8वें वेतन आयोग के दायरे से बाहर नहीं रखा गया है, लेकिन यह ToR में नहीं दिखता है।

इन चीजों पर आपत्तियां

PTI रिपोर्ट के अनुसार, CGPWA के अध्यक्ष और पूर्व DGP एस.पी. खोड़ा ने अपने पत्र में वित्त विधेयक 2025 का जिक्र किया और कहा कि सेंट्रल सिविल सर्विसेज (पेंशन) नियमों में पूर्वव्यापी प्रभाव से किए गए संशोधन, पेंशनभोगियों के बीच उनकी रिटायरमेंट की डेट के आधार पर भेदभाव को वैध बनाते हैं।

उनका तर्क है कि ऐसे वैधानिक परिवर्तन पिछले सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और संसद में दिए गए मौखिक आश्वासनों को अप्रभावी बनाते हैं, जिन्हें केवल औपचारिक विधायी संशोधनों द्वारा ही पलटा जा सकता है।

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‘अनफंडेड लागत’ शब्द पर सवाल

CGPWA ने टर्म्स ऑफ रेफरेंस (ToR) में इस्तेमाल किए गए “गैर-अंशदायी पेंशन योजनाओं की अनफंडेड लागत” शब्द पर भी कड़ी आपत्ति जताई है।

एसोसिएशन का कहना है कि यह शब्दावली अभूतपूर्व है और इससे ऐसा लगता है कि पेंशन को संवैधानिक अधिकार के बजाय वित्तीय बोझ के रूप में देखा जा रहा है।

पत्र में बताया गया है कि सांसदों, जजों और रक्षा कर्मियों की पेंशन भी नॉन-कंट्रीब्यूटरी होती है और भारत की संचित निधि से दी जाती है, लेकिन उनके लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

CGPWA ने अपने पत्र में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया, जिनमें कहा गया है कि पेंशन एक संपत्ति का अधिकार है और स्थगित वेतन है। इसके अलावा, पेंशनभोगी एक ही वर्ग के होते हैं और उनके रिटायरमेंट की तारीख के आधार पर उनके साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता।

एसोसिएशन ने चेतावनी दी कि पेंशन को “अनफंडेड कॉस्ट” कहना संवैधानिक सिद्धांतों और स्थापित कानून के खिलाफ है।

अतिरिक्त पेंशन और कम्यूटेड पेंशन का मुद्दा

पत्र में सीनियर सिटीजन पेंशनभोगियों को मिलने वाली अतिरिक्त पेंशन का मुद्दा भी उठाया गया। संसदीय स्थायी समिति (110वीं रिपोर्ट) की सिफारिश का हवाला देते हुए CGPWA ने अतिरिक्त पेंशन के लिए आयु सीमा में कमी और एक टियर वाली संरचना लागू करने की मांग की।

इसके अलावा, 15 साल बाद कम्यूटेड पेंशन की बहाली से संबंधित नियम पर भी आपत्ति जताई गई। एसोसिएशन का कहना है कि सरकार 12 साल के भीतर कम्यूटेड राशि वसूल कर लेती है और फिर बहाली रोककर सिर्फ ब्याज कमाती है।

सरकार का रुख

सरकार का कहना है कि पेंशन को आयोग के दायरे से बाहर नहीं किया गया है। यह विरोधाभासी स्थिति विवाद को हवा दे रही है।

सरकार ने साफ किया है कि पेंशन को 8वें वेतन आयोग के दायरे से बाहर नहीं किया गया है। वित्त मंत्रालय ने हाल ही में संसद में अपने जवाब में कहा कि आयोग पेंशन और ग्रेच्युटी से संबंधित पहलुओं पर विचार करेगा, जिसमें NPS और नॉन-NPS दोनों तरह के कर्मचारी शामिल हैं।