दिसंबर, 2018 में राजग सरकार के वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बढ़ती महंगाई पर कहा था, ‘कांग्रेसी जिसे (इंदिरा गांधी) सबसे महान नेता मानते हैं उनके शासन में महंगाई दर 24 फीसद थी। आज यह मात्र तीन-चार फीसद है’। यह वह समय था जब जनप्रतिनिधि महंगाई को जायज नहीं ठहरा कर अपनी तरह से सुधार करने की बात कहते थे। लेकिन आज सरकार के पक्षकार जिस तरह महंगाई को न्यायोचित ठहराने में जुटे हैं वह खतरे का संकेत है। लगातार बढ़ती महंगाई का मतलब है ज्यादा से ज्यादा लोगों की खरीद क्षमता का घटना यानी उत्पादन प्रक्रिया का धीमा पड़ जाना। मुफ्त-मुफ्त वाले चुनावों के इस दौर में नौकरशाही श्रीलंका की ओर इशारा कर चुकी है। लाभार्थी के बरक्स एक महंगार्थी खड़ा किया जा रहा है। मेरी कमीज ज्यादा सफेद के विकृत विमर्श के बीच मेरी महंगाई महान के बेसुरे गान की पहचान करता बेबाक बोल।
‘ये सितम और कि हम
फूल कहें खारों को
इस से तो आग ही लग जाए
समन-जारों को’
‘प्रिय संपादकों,
कृपया नकारात्मक खबरों से लोगों को आंदोलनकारी मत बनाइए। पेट्रोलियम पदार्थों की मूल्य वृद्धि का कोई भी संबंध गरीब तबके के लोगों से नहीं होता है। पेट्रोल और डीजल के उपभोक्ताओं को असल में इससे कोई मतलब ही नहीं है। आप खुद से सवाल कीजिए, क्या आप और आपकी टीम के सदस्य इससे (पेट्रोल की बढ़ी कीमत) किसी भी तरह से प्रभावित हैं?
अनुमान लगाया जा सकता है कि आपका जवाब ‘नहीं’ में होगा। अन्य वस्तुओं की कीमतों पर पेट्रोलियम पदार्थों की बढ़ी कीमतों का असर लंबे समय में नगण्य होता है। और, यह बात सभी जानते हैं। एक आदमी बहुत सी अन्य चीजों और सेवाओं की कीमतों का असर महसूस करता है, जिनमें परिवहन की कीमत कोई मायने नहीं रखती। मेरी अपील है कि आप उत्पादों और सेवाओं की कीमतों के विज्ञापन पर शोध करें।’
अखबार की दुनिया में लंबे समय तक काम करने के बाद दफ्तर के आधिकारिक ई-मेल के पते पर ऐसी पाती पहुंचे तो हम इस असमंजस में होंगे कि हंसे या रोएं। इसे गंभीरता से लें या किसी का भेजा हुआ मजाक समझ कर भूल जाएं। लेकिन जब नजर पिछले दिनों के अखबार पर जाती है तो मामला गंभीर दिखता है।
खास कर तब, जब कई दिनों से अखबार के पहले पन्ने पर पेट्रोल की बढ़ती कीमतों की खबर लगाई गई हो। महंगाई की हर खबर को पहले पन्ने पर इसी सोच के साथ रखा गया हो कि इसका वास्ता हर आम आदमी की जेब से लेकर जिंदगी पर पड़ता है और यह तो पहले पन्ने की खबर होनी ही चाहिए।
हमारे लिए एक पत्रकार के नाते महंगाई का मुद्दा नया नहीं है। आजादी के बाद की पहली से लेकर अभी तक की सरकार को इसका सामना करना पड़ा है। विश्व के किसी भी हिस्से में युद्ध के कारण महंगाई को न्यायोचित ठहराने के लिए देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू उद्धृत हो ही चुके हैं।
सत्तर के दशक की पत्र-पत्रिकाओं की कतरन देखेंगे तो पोस्टर पर ऐसा नारा लगाते हुए लोगों की तस्वीरें मिल जाएंगी- ये देखो इंदिरा का खेल/खा गई चीनी पी गई तेल। और, महंगे प्याज के आंसुओं के कारण दिल्ली की सरकार गिरने की याद जेहन में ताजा ही है।
महंगाई और सरकारों के बीच की अब तक की कदमताल के बीच नया है, उसे जायज ठहराने की कोशिश। संसद में तो ‘मैं प्याज नहीं खाती’ का अमर वाक्य गूंज ही चुका है अब सड़क पर यह समझाने की कोशिश हो रही है कि पेट्रोल की बढ़ी कीमतों का असर किसी भी तरह से गरीबों पर नहीं पड़ता है।
पेट्रोल अमीरों के इस्तेमाल की चीज है और उन्हें इसकी बढ़ी कीमतों से कोई फर्क नहीं पड़ता है। आम आदमी के बजट पर परिवहन के बढ़े खर्च को नगण्य मानने की वकालत की जा रही है।
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर पेट्रोल की कीमतों का क्या असर होता है इसे अभी ताजा-ताजा रूस और यूक्रेन के युद्ध से समझा जा सकता है। इस दौरान भारत में भी दूध से लेकर सब्जी, दाल और हर चीज के दाम बढ़े हैं। जिस किसी ने भी हाई स्कूल तक की सामाजिक विज्ञान की किताब का अध्ययन किया है, उसे इस बात की समझ होती है कि पेट्रोल की बढ़ी कीमतों का असर गैस चूल्हे और नमक के पैकेट तक पर होता है।
इसका असर उस श्रमिक पर होता है जो महीनों तक किसी बहुत ही सस्ते ढाबे पर खाकर अपना पेट भरता है और अचानक से उसकी थाली की कीमत बढ़ जाती है। कोरोना के बाद स्कूल खुले हैं और कई जगहों पर स्कूल बसों की फीस पांच सौ रुपए तक बढ़ा दी गई है।
उल्लिखित ई-मेल का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कमोबेश ऐसी ही अपील जनप्रतिनिधि भी कर रहे हैं। महंगाई बढ़ने का मतलब है, लोगों की खरीद क्षमता का घटना। अगर आपको लोगों की घटी क्रयशक्ति की फिक्र नहीं है तो आपको पूरी अर्थव्यवस्था की फिक्र नहीं है।
उत्तर प्रदेश के हाल में आए विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद विमर्श में एक नया शब्द आया-लाभार्थी। भाजपा की जीत में सबसे ज्यादा महिमामंडन ‘लाभार्थी’ शब्द का ही हुआ। भारत जैसे विकासशील देश में जनकल्याणकारी योजनाएं बुनियादी जरूरत होती हैं। लेकिन अर्थव्यवस्था की बुनियाद हिली होगी तो लाभार्थियों के सहारे महंगार्थी पार नहीं पा सकते हैं।
उत्तर प्रदेश के साथ ही पंजाब विधानसभा चुनाव के नतीजे भी आए। पंजाब में उस आम आदमी पार्टी की जीत हुई जिसने दिल्ली में मुफ्त बिजली-पानी का नारा दिया। आम आदमी पार्टी पंजाब में भी उसी नारे के साथ उतरी और दिल्ली की तरह ही प्रचंड बहुमत पाने में कामयाब रही। उत्तर प्रदेश में राशन योजना को तीन महीने आगे बढ़ा दिया गया है और पंजाब में केजरीवाल अपने मुफ्त के वादे को पूरा करने की राह खोज रहे हैं। सवाल यह है कि इतने बड़े तबके को कब तक मुफ्त में चीजें मिल पाएंगी?
उत्तर प्रदेश, पंजाब के लाभार्थियों के महिमामंडन के बीच दिल्ली में एक बैठक होती है। केंद्र सरकार से जुड़े नौकरशाह सरकार को आगाह करते हैं कि जिस तरह राज्य मुफ्त वाली योजना के आधार पर चुनाव जीत रहे हैं और उसे आगे बढ़ा रहे हैं तो वह दिन दूर नहीं जब हम श्रीलंका के हाल पर पहुंच जाएं।
नौकरशाहों की इस चेतावनी को अभी ज्यादा तवज्जो नहीं दी गई है। लेकिन क्या हमें अपने संकटग्रस्त पड़ोसी देश से सबक नहीं लेना चाहिए? सरकारें जब उत्पादन के साधनों को उपेक्षित कर सिर्फ लोकलुभावन नारों के भरोसे आगे बढ़ती है तो उस देश का हाल श्रीलंका जैसा होता है। श्रीलंका के लोगों ने राजनीतिक तौर पर एक मजबूत नेता को चुना था। हाल-हाल तक जो देश राष्ट्रवादी जागरणों से गूंज रहा था, आज वहां की सरकार के मंत्री इस्तीफा दे चुके हैं।
श्रीलंका की अर्थव्यवस्था की हालत इतनी बुरी हो चुकी है कि सरकार की कोई राजनीतिक साख नहीं बची है। जब सरकारी खजाने में पैसे नहीं होते हैं तो मंत्रियों को न किसी राष्ट्र से मतलब रह जाता है और न किसी वाद से। अब वहां सड़कों पर वह जनता आंदोलन कर रही है जिसके हाथ पूरी तरह खाली हो चुके हैं।
वजह चाहे जो भी हो लगातार बढ़ती महंगाई और लोगों की खरीद क्षमता का घटना भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती है। खरीद क्षमता पर असर पड़ने का सीधा मतलब होता है उत्पादन प्रक्रिया का प्रभावित होना। आज इस बात की जरूरत है कि मुद्रास्फीति पर नियंत्रण कर इस तरह की विकास योजनाएं बनाई जाएं जिससे उत्पादन का स्तर सुधरे।
मनरेगा जैसी कोई योजना है या किसी को अनाज दिया जा रहा है तो वह भी कहीं न कहीं उत्पादन व्यवस्था के दायरे में आता है। लेकिन बहुत दिनों तक मुफ्त-मुफ्त को बढ़ावा देकर देश की अर्थव्यवस्था को नहीं बचाया जा सकता है। राजनीतिक रूप से चाहे कितनी भी मजबूत सरकार हो अगर अर्थव्यवस्था कमजोर होती है तो देर-सबेर जनता सड़कों पर आ ही जाती है। सरकार के पक्षकार लाभार्थी के बरक्स जिस महंगार्थी को खड़ा कर रहे हैं उसका नुकसान अंतत: अर्थव्यवस्था के साथ पूरे देश को होना है।
