शादी के पंद्रह साल बीत चुके थे। स्वरा की दुनिया अब स्कूल और घर तक ही सिमट गई थी। अपनी जिम्मेदारियों को सजगता से निभाते हुए वह जीवन का सफर तय कर रही थी। सब कुछ अच्छा होते हुए भी उसने अपनी ख्वाहिशों के साथ समझौता करना सीख लिया था। यतिन ने स्वरा को पहली बार एक शादी में देखा था। वह उसकी बहन की सहेली थी – सुंदर और पढ़ी-लिखी। रसायनशास्त्र में स्नातकोत्तर कर स्वरा पहली ही नजर में यतिन को भा गई। यतिन के पिता इस रिश्ते से सहमत नहीं थे, पर यतिन की जिद के आगे उन्हें झुकना पड़ा और जल्दबाजी में शादी हो गई।
शादी के तुरंत बाद ही स्वरा को घर की परंपराओं में ढलने की सीख दी जाने लगी। सास की निगरानी और ननदों की नसीहतें हर कदम पर साथ रहतीं। श्रृंगार को लेकर घर में एक अघोषित संहिता थी – सजना भी सीमित और समाज के अनुसार होना चाहिए। यतिन पढ़ा-लिखा था, पर सोच वही पुरानी थी, जहां स्त्री की चुप्पी को ही शालीनता माना जाता था। स्वरा की आत्म-अभिव्यक्ति के लिए कोई स्थान नहीं था, केवल भूमिका निभाने का दायित्व था। घर की दीवारें बोलती नहीं थीं, लेकिन उनमें स्त्री की सजगता को संदेह की नजर से देखा जाता था।
विवाह के बाद सब कुछ सामान्य दिखता था। स्वरा जब सजती, तो जैसे हर रंग उसमें घुल जाता। लाल बिंदी, भर-भर कर पहनी लाल चूड़ियां उसकी पहचान बन चुकी थीं। वह श्रृंगार को स्त्री-सत्ता की अभिव्यक्ति मानती थी, पर धीरे-धीरे वही अभिव्यक्ति एक अपराध की तरह देखी जाने लगी। रात को बिस्तर पर लेटते ही यतिन उसकी चूड़ियां उतरवा देता। शुरू में स्वरा ने इसे प्रेम की नजाकत समझा। उसने सोचा, शायद आवाज कमरे के बाहर चली जाती होगी। मगर एक रात यतिन ने कहा—चूड़ियों की आवाज से डर लगता है। लगता है जैसे किसी चुड़ैल के पास सोया हूं। और, यह जो सुबह-सुबह पायल की छम-छम करती हो, इसे भी निकाल दो। आजकल यह सब कौन पहनता है?
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स्वरा सिहर गई। उसके श्रृंगार को डरावनी उपमा दी गई थी। यतिन बचपन से ऐसे माहौल में पला था, जहां चूड़ी, पायल और मेहंदी को केवल ‘औरतों की बेड़ियां’ कहा जाता था। उसके पिता हमेशा कहते – चूड़ियां और पायल पहनकर औरतें कैद हो जाती हैं, मर्दों पर बोझ बनती हैं। यह सोच यतिन के मन में घर कर गई। बाहर से वह पढ़ा-लिखा और आधुनिक दिखता था, लेकिन भीतर से उसने मान लिया था कि ये सब सजावटी प्रतीक औरतों को बंधन में रखने के औजार हैं। उसका मानना था कि पति-पत्नी के रिश्ते में बराबरी होनी चाहिए, पर बिंदी-सिंदूर-मेहंदी-पायल जैसी चीजें औरत को पुराने ढर्रे से बांध देती हैं।
शादी के शुरुआती दिनों में उसने सोचा कि शायद यह सब सामान्य श्रृंगार है, जिसे अनदेखा कर देना चाहिए। लेकिन जब उसने पाया कि स्वरा के रग-रग में ये चीजें बसती हैं, उसकी खुशी, उसका आत्मविश्वास इन्हीं से जुड़ा है, तो भीतर ही भीतर खीझ उठती। वह चाहता था कि उसकी पत्नी आधुनिक और सहज दिखे। यही कारण था कि उसे चूड़ियां, पायल और मेहंदी से अजीब-सी चिढ़ महसूस होती थी। एक दिन चूड़ियां टूट गईं। सास ने ताना मारा- ‘सोहागन होकर चूड़ियां उतारकर कौन सोता है? अपशगुन करती हो!’ ननद ने वीडियो कॉल पर कहा—‘इसीलिए तो यतिन की तरक्की नहीं होती। सुहागन होकर भी समझ नहीं है।’
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प्लास्टिक की चूड़ियों पर भी ताने मिले। अंतत: स्वरा ने सोने की दो साधारण चूड़ियां पहन लीं। रंग-बिरंगी कांच की चूड़ियां उसकी दराज में कैद हो गईं। स्वरा ने श्रृंगार के विवादों पर चुप रहना सीख लिया।
घर में देवी-पूजा थी। उस दिन उसे लाल साड़ी पहनने की अनुमति मिली। उसने हल्का मेकअप किया और बरसों बाद शीशे में खुद को देखा। लगा, वह फिर से खुद को पहचान रही हो। तभी यतिन की आवाज आई—‘नीचे जा रही हो तो मेहंदी मत लगाना। अगर लगा भी ली तो पलंग पर मेरे पास मत सोना, बदबू आती है।’
स्वरा का मन तड़प उठा। वह मेहंदी की खुशबू को मदमस्त करने वाली मानती थी। पर उसकी यह पसंद भी ‘बदबू’ कह दी गई। नीचे पहुंची तो सास ने कहा—‘कम से कम पूजा के समय तो श्रृंगार ठीक से कर लिया करो।’ स्वरा मुस्कुराई, पर भीतर से टूटी। उसके लिए श्रृंगार अब प्रेम का नहीं, उपेक्षा का प्रतीक बन गया था।
कुछ वर्षों बाद बेटे अर्जुन का जन्म हुआ। घर में खुशी का माहौल था, पर उस उल्लास में भी स्वरा का अकेलापन कहीं दब गया। मां बनने की जिम्मेदारी ने उसके भीतर संवेदना जगाई, पर उसके सपनों की खिड़की और छोटी हो गई।
उसने स्कूल में नौकरी शुरू की। वहां वह बच्चों की प्रिय और सहकर्मियों की सराही जाने वाली शिक्षिका थी। भीतर की स्त्री अब भी सवालों से भरी थी। धीरे-धीरे उसकी साड़ियों के रंग फीके पड़ गए। बिंदी छोटी हो गई। गहने दराज में बंद हो गए। अब वह केवल एक चेन और टॉप्स पहनती थी। स्वरा ने हर उस चीज से दूरी बना ली, जो कभी उसकी पहचान थी।
फिर आया स्कूल का वार्षिक उत्सव। विषय था—‘स्त्री की स्वतंत्र पहचान’। सभी शिक्षिकाओं को लाल साड़ी पहननी थी। स्वरा ने अपनी वही पुरानी लाल शिफॉन साड़ी निकाली, जो शादी के बाद कभी नहीं पहनी थी। उसने बाल खुले छोड़े, हल्का मेकअप किया और बड़ी बिंदी लगाई।
बरसों बाद उसने खुद को सजाकर देखा। लगा जैसे खोई हुई स्वरा लौट आई हो। स्कूल में सबकी नजरें उस पर टिक गईं। लड़कियां उसकी साड़ी और आत्मविश्वास से प्रभावित थीं। नाटक शुरू हुआ। मंच पर एक लड़की बोली—‘मेरे कपड़ों को मेरा मापदंड मत समझो, मेरे सपनों से मेरी पहचान समझो। जब तक हम खुद को जैसे हैं वैसे स्वीकार नहीं करते, तब तक कोई हमें स्वीकार नहीं करेगा।’
तालियों की गूंज में स्वरा जैसे खुद को सुन रही थी। वह सोच रही थी—‘क्या मेरी जिंदगी किसी और की शर्तों पर ही चलनी चाहिए? क्या मैं तय नहीं कर सकती कि मैं क्या पहनूं? क्या चाहूं?’
घर लौटते समय स्वरा ने अपनी बिंदी को छुआ, बाल संवारे और खुद को हल्की मुस्कान दी। अब वह बदल रही थी। अब वह सिर्फ समर्पित पत्नी नहीं, अपनी पहचान को स्वीकारती हुई स्त्री थी।
उसने घर में भी अपनी पसंद की चीजें वापस लानी शुरू कर दीं—थोड़ी बड़ी बिंदी, कुछ चूड़ियां, गहरे रंगों की साड़ियां। यतिन ने ताना मारा—‘अब फिर से सजना शुरू कर दिया है क्या?’ स्वरा ने मुस्कुराकर कहा—‘हां, अब फिर से जीना शुरू कर रही हूं।’
जो चूड़ियां तानों से टूटी थीं, वही अब आत्म-स्वर की गूंज से खनकने लगीं। स्वरा ने सोचा, आधुनिक या पारंपरिक रहना स्त्री का अपना निर्णय होना चाहिए। उसका श्रृंगार, उसका पहनावा और उसकी पहचान उसके अपने चुनाव से तय होंगे, किसी और की शर्तों से नहीं। स्वरा ने दृढ़ता से सोचा—‘अब मैं अपनी शर्तों पर जिऊंगी। यही मेरी असली पहचान है।’
