किशोरी लाल अपनी तमाम कोशिश के बाद अपनी बेटी सीमा के लिए एक क्लर्क तलाश कर पाए। उनके लिए तो वही कलेक्टर से कम नहीं था। बड़ी मुश्किल से शादी का सौदा पांच लाख में पटा था। किशोरी लाल ने इसके लिए गांव का अपना पुश्तैनी घर गिरवी रख दिया था ताकि अपने रिश्तेदारों के सामने हाथ न फैलाना पड़े। वे हर कीमत पर अपनी तीसरी व आखिरी बेटी की शादी अच्छे घर में करना चाहते थे। वे उसे दोनों बड़ी बेटियों की तरह जैसे-तैसे नहीं ब्याहना चाहते थे।

किशोरी लाल को अच्छी तरह याद है, उस दिन सीमा कितना विरोध कर रही थी, जब उसकी बड़ी बहन नीमा की शादी दो बच्चों के विधुर बाप से होने जा रही थी। ‘नहीं होगी मेरी बहन की शादी उस दो बच्चे के बाप से, जाते ही बच्चों के लालन-पालन में जुट जाए, क्या यही इसकी जिंदगी है?’
‘तुम्हारे कहने से क्या होता है, मैं जहां चाहूंगा, वहीं होगी इसकी शादी। दहेज देने के लिए पैसे कहां है हमारे पास?’ किशोरी लाल गुस्से में आकर बोले।
‘जब आपको हम बेटियों को कुंए में ही धकेलना था, तो जन्म लेते ही गला क्यों नहीं घोंट दिया?’ सीमा सिसक उठी।
सीमा की मां, जो अब तक बिल्कुल चुप थी, बीच में बोल पड़ी, ‘हां-हां, नहीं होगी नीमा की शादी उससे।’

‘ठीक है तो मैं ही मर जाऊंगा, मेरे मर जाने के बाद तुम सब चैन से रहना।’ किशोरी लाल लगभग रोते हुए बोले।
‘आप ऐसे क्यों बोल रहे हैं जी! आखिर इसकी जिंदगी का सवाल है।’ सीमा की मां अपने पति को समझाने के ख्याल से बोली।
‘जाने दो सीमा, करने दो इन्हें मेरी शादी। शायद मेरी तकदीर ही ऐसी होगी।’ नीमा ने पिताजी की हालत देखते हुए कहा।
‘तकदीर कुछ नहीं होती। दीदी, लाचार-बेबस ही तकदीर को मानते हैं।’ सीमा गुस्से में बोली।

‘जाने दो, तुम्हें इससे क्या, मुझे रहना है उसके साथ।’ नीमा झुंझला उठी, लेकिन अपनी आंखों में उमड़े आंसुओं को वह छुपा नहीं पाई।
‘तुम महान हो दीदी’। सीमा ने थरथराते होंठों से कहा। उसके चेहरे पर नीमा के प्रति अगाध प्रेम झलक रहा था।
सीमा अच्छे घर में ब्याहने के सपने को त्याग चुकी थी। वह अच्छी तरह जानती थी कि अच्छे खाते-पीते घर के लड़के की कीमत पांच-छह लाख से कम नहीं होगी। पिताजी की आय इतनी भी नहीं थी कि पांच व्यक्तियों का परिवार भी सुचारू रूप से चल सके। महीने के अंत होते-होते लेनदारों की भीड़ घर पर जमा हो जाती, कभी मकान का किराया बाकी रहता तो कभी राशन का। ऐसे में पांच-छह लाख का इंतजाम करना पिताजी के लिए कठिन ही नहीं, नामुमकिन भी था।

आज सीमा के लिए रिश्ता आया। रिश्ता अच्छे घराने से था। सीमा की मां उसे बार-बार समझा रही थी, ‘देखो बेटी, लड़का बहुत अच्छा है। नौकरी करता है, घर-द्वार ठीक है। मेरी बात मानो तो जिद छोड़ दो इससे अच्छा लड़का फिर नहीं मिलने वाला।’
‘नहीं, मुझे ऐसे लड़के से शादी नहीं करनी’।
‘आखिर तुम्हें कैसा लड़का चाहिए?’ सीमा की मां चिढ़ कर बोली।
‘जैसा मेरी बहनों को मिला है, मैं आप लोगों को बर्बाद कर आबाद नहीं होना चाहती।’
‘क्या?’ सीमा की मां के चेहरे पर आश्चर्य और पीड़ा के मिले-जुले भाव उभर आए।
‘लड़की को लेकर आओ सीमा की मां’। किशोरी लाल ने आवाज लगाई। ‘अभी आई’ कहकर वह सीमा को लेकर उस कमरे में पहुंची, जहां लड़के वाले सीमा का इंतजार कर रहे थे।

‘नमस्ते करो बेटी’। सीमा की मां ने सीमा से कहा, तो वह क्रोध भरी निगाहों से अपनी मां को घूरने लगी। उसकी मां उसकी निगाहों को अनदेखा कर कहने लगी। ‘आप लोगों को मेरी बेटी में कोई अवगुण नहीं मिलेगा भाई साहब’।
सीमा की पिताजी सीमा को इस नजर से देखते रहे, मानो कह रहे हों, नमस्ते करो बेटी, इज्जत का सवाल है। सीमा ने उन लोगों को नमस्ते किया और वह एक खाली कुर्सी पर बैठ गई। सामने बैठे नवयुवक को उसकी यह हरकत अच्छी नहीं लगी। शायद उसी की शादी सीमा से होने वाली थी। वह अपने जीवन में नकचढ़ी लड़की नहीं चाहता था, इसलिए बोल पड़ा, ‘आपको थोड़ी भी तमीज नहीं है, किसी से पूछे बिना कुर्सी पर बैठ गईं’।

‘आप कौन हैं मिस्टर?’ सीमा ने गुस्से में आकर पूछा।
‘इन्हीं लड़के से तुम्हारे रिश्ते की बात चल रही है बेटी’। किशोरी लाल ने स्थिति की नाजुकता को समझ कर बात संभालते हुए कहा।
‘ओ अच्छा, लेकिन आपसे मेरी शादी भला कैसे हो सकती है?’
युवक समझ नहीं पा रहा था कि यह हो क्या रहा है। उसकी उम्मीदों से परे था कि जिस लड़की को ब्याह के लिए देखने आया है वह ऐसा व्यवहार करे। उसने झल्ला कर कहा,‘हां-हां, मुझे भी नहीं करनी तुमसे शादी, ऐसी बदमिजाज व घमंडी लड़की से भला कौन शादी करना चाहेगा?’ युवक भी अपने गुस्से पर काबू नहीं रख सका।

युवक की झल्लाहट से सीमा को होश आया। उसने थोड़ा रुक कर कहा, ‘माफ कीजिएगा, न तो मैं बदमिजाज हूं और न ही घमंडी। दरअसल मैं ही आपके लायक नहीं हूं’। सीमा अब कुछ नम्र हो चुकी थी।
‘मुझे तो ऐसे लड़के की तलाश है जिसकी मैं लाठी बन सकूं’।
‘मैं समझा नहीं’। युवक ने हैरत से पूछा।

‘आप नहीं समझेंगे, मेरी दोनों बहनों की शादियां भी ऐसे घरों में ही हुई हैं जहां दहेज नहीं देना पड़ा। और, अब मैं भी ऐसे ही किसी लड़के से शादी करना चाहती हूं जो दहेज न लेता हो और साहब, बिना दहेज के तो वही शादी करेगा जो शारीरिक-मानसिक तौर बीमार हो या जिसकी पत्नी मर गई हो, जिसे बच्चों को संभालने के लिए एक आया की जरूरत हो। जिसकी जिंदगी में मैं दूसरी बीवी के रूप में होऊंगी। अगर ऐसा कोई आदमी आप लोगों की नजर में हो, तो अवश्य बताइए। मैं आप लोगों का अहसान मानूंगी।’

कमरे में उपस्थित सभी लोग उसकी बात सुन कर हतप्रभ रह गए। उन लोगों को ऐसा लग रहा था, मानो एक लड़की ने अकेले ही सबके गालों पर तमाचा जड़ दिया हो।