कहने को तो जीवन एक बार मिलता है, लेकिन इस यथार्थ से रूबरू होने के साथ हम यह भी जानते हैं कि इस एक जीवन को जीने के लिए रोज हमें कितनी ही चीजों की जरूरत पड़ती है। उस पर भी हर चीज संतुलित मात्रा में चाहिए। अगर कोई भी चीज अपनी निर्धारित मात्रा से कम या ज्यादा हो जाए तो बात बिगड़ते देर नहीं लगती। इसलिए जीवन की कुछ गतिविधियों के लिए उचित संतुलन का होना आवश्यक है, जैसे चलना, दौड़ना और यहां तक कि बिना गिरे खड़े रहना या बैठना जैसे सरल कार्य भी। दरअसल, संतुलन वह चीज है जो हम सबकी विभिन्न स्थितियों में स्थिरता बनाए रखने में मदद करती है। मसलन, किसी चट्टान पर कदम रखना या जब हम गिरते हैं तो खुद को संभालना। हमारे पास अपने संतुलन को बेहतर बनाने और उम्र के साथ होने वाली गिरावट को रोकने की क्षमता मौजूद होती है। बस जरूरत होती है उसे जानने की और समय पर सक्रिय होने की।

हम जितने अधिक सक्रिय होंगे, हमारा संतुलन उतना ही बेहतर होगा। अच्छा संतुलन हमें गिरने और चोट लगने से बचाने में मदद कर सकता है और हमें वह काम करने में मदद कर सकता है जो हमें पसंद है। साथ ही उम्र बढ़ने के साथ हमें लंबे समय तक स्वतंत्र रहने में सक्षम बनाता है।

संतुलन के लिए विचार है अहम

संतुलन के साथ एक और अहम चीज है ‘विचार’। विचार एक तरह से हमसे अलग होते हैं। वे ऐसी वस्तु नहीं हैं जो स्वभाव के साथ एकाकार हो जाएं। वे आते हैं और चले जाते हैं, लेकिन हम बने रहते हैं ‘स्थिर’। एक जगह कहीं पढ़ा है, विचारों को शून्य करने का तरीका है विचारों के प्रति पूरी तरह से सजग हो जाना। कोई व्यक्ति अपने विचारों के प्रति जितना ज्यादा सजग होगा, उतने ही कम विचार उसके मन में आएंगे। लेकिन ये विचार अपने आने और जाने के क्रम में बहुत कुछ कर सकते हैं, जिनसे जीवन की दिशा और दशा दोनों प्रभावित हो सकती है। ये हमारे मन, कर्म और वाणी को भी प्रभावित कर सकते हैं। विचारों और बोली की महत्ता पर कहा भी गया है कि ‘बिना विचारे जो करें सो पाछे पछताय’।

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इसका मतलब यह है कि अगर कोई व्यक्ति किसी काम को करने से पहले कुछ नहीं सोचता और उसे बस कर ही डालता है, तो बाद में उसे अपनी गलती का एहसास होता है और वह पछताता है। कर्म करने से पहले जिस तरह ठीक से सोचना चाहिए, उसी तरह वाणी के प्रयोग करने से पहले भी कम से कम दस बार जरूर सोचना चाहिए। बल्कि गुस्से के वक्त तो चुप रह जाना ही बेहतर है। जीवन में कई बार ऐसी घटनाएं होती हैं, जो इस बात पर निर्भर करती हैं कि हम क्या कहते हैं और कैसे कहते हैं!

लापरवाही से भरा विचार हो सकता है घातक

हम कल्पना कर सकते हैं कि हम किसी नौकरी के साक्षात्कार के लिए गए हों और वहां ऐसी बातें कह कर आ जाते हैं जो लापरवाही से भरा और विचारहीन हैं। इस क्रम में हम स्वयं का बेहतर संस्करण प्रस्तुत करने से चूक जाते हैं और हमें नौकरी मिलने की संभावना भी कम हो जाती है। इसलिए अपनी जिह्वा को हमेशा अपने वश में रखना चाहिए और समय पर सोच-विचार कर ही खोलना चाहिए। यानी हमें जो कहना है, उसके हर पहलू पर विचार करके ही बोलिए। फिर आपके बोलने का क्या परिणाम होगा उसका निरीक्षण करना भी आपकी जिम्मेदारी है। क्योंकि जब तक हमने कुछ नहीं कहा है, स्थिति हमारे नियंत्रण में होती है, लेकिन जैसे ही हमने अपनी बात रख दी, उसके बाद उस पर से हमारा नियंत्रण खत्म हो जाता है। कई बार इससे अपकीर्ति होने का भय भी रहता है। साथ ही लज्जित होने और पश्चाताप से भर जाने का भी डर बना रहता है। इस संदर्भ में एक कहावत है कि यही मुंह पान भी खिलाता है और यही मुंह पिटाई भी खिलाता है या फिर जोखिम भरी परिस्थितियों में डाल देता है।

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इसका यह अर्थ भी नहीं है कि हम चुपचाप अपने मुंह को सिलकर बैठे रहें। अच्छी लगने वाली बातें करना भी एक कला है। मतलब हम जब किसी के साथ बैठे हों तो अपनी विद्वत्ता दिखाने के चक्कर में जरूरत से ज्यादा बोलना या डींग हांकना गलत बात है। शेख सादी का कथन है कि दो बातें हमेशा ध्यान रखनी चाहिए- एक तो बात करने के अवसर पर चुप हो जाना और दूसरे चुप रहने के स्थान पर बोलना।

मिठा बोलने का करना चाहिए प्रयास

इसका अर्थ यह है कि मितभाषी बनने का प्रयास करना चाहिए। कम बोला जाए, लेकिन भली-भांति सोच-विचार कर बोला जाए। वाणी प्रयोग के अन्य नियमों में प्रिय वचन बोलना भी आता है। यानी कि हम जब भी बोलें, प्रिय बोलें। मन को शीतल करने वाले शब्दों का प्रयोग करें। अप्रिय न बोलें। एक प्रसिद्ध उक्ति है- ‘सत्यं ब्रूयात, प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यं अप्रियं’। यानी सत्य बोलें, प्रिय बोलें, लेकिन अप्रिय लगने वाले सत्य से भी परहेज करें। यह वाणी की मर्यादा है कि सत्य को भी इस प्रकार से बोलना चाहिए कि सुनने वाले को अप्रिय न लगे। सुनने वाले को यह नहीं लगना चाहिए कि हमारी भाषा से हमारा पद, धन या अभिमान बोल रहा है। वाणी हमेशा संयत, विनम्र और मधुर होनी चाहिए। ताकि सभी एक-दूसरे के निकट आ सकें। कभी-कभी लोग इसलिए भी बात करते हैं कि वे बस चाहते हैं कि कोई उनकी बात सुने। अपनी बात कहने के बाद वे बेहतर महसूस कर सकते हैं। चाणक्य की यह उक्ति मशहूर है कि जिस वाणी से लोग अच्छा अनुभव करते हों, ऐसी प्रिय वाणी बोलने में कंजूसी कैसी!