सुभाष चंद्र शर्मा

एक समय था जब हमारे अपने पड़ोसियों से भी चाचा-चाची, ताऊ-ताई, दादा-दादी के उसी प्रकार के रिश्ते होते थे, जैसे हमारे अपनों से। मगर जैसे-जैसे पश्चिम से प्रेरित शहरी जीवनशैली हम पर हावी होती चली गई, लोगों ने समाज के रूप में सिमटना भी आत्मसात कर लिया। अब नौबत यह आ गई है कि आज का युवा वर्ग किसी की सलाह को भी दखल बताता है और उसे बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। इसमें वह अपनी तौहीन मानता है। चिंता की बात यह है कि यह स्थिति अब केवल शहरों में सीमित नहीं रही, गांवों में भी परसती जा रही है। नतीजा यह हुआ कि अधिकांश दंपति शादी के बाद अपने परिवार से अलग ज्यादा पसंद करते हैं।

संयुक्त परिवारों का सबसे बड़ा लाभ यह था कि सुख में तो सभी मिल-जुलकर खुशी बांटते ही थे, असली सहभागिता दुख की स्थितियों में होती थी। साझेपन और संवेदना की जरूरत दुख में ही पड़ती है। परिवार के रूप में एकल स्वरूप में सिमटने वाले समाज को यह तब समझ में आता है, जब दुख से भरा वक्त आता है।

बच्चों को घर के बुजुर्ग उनके जीवन के लिए ऐसी सीख दे जाते थे, जो भविष्य में उनके काम आती थी। यह सिलसिला निरंतर जारी रहता था। पानी के बहाव की स्थिति होती है कि वह ऊपर से नीचे को बहता है। यह संयुक्त परिवारों के जीवन की पाठशाला की पढ़ाई थी। आज बच्चों को रोजी-रोटी की शिक्षा यानी जीविका की शिक्षा तो स्कूल-कालेज में दी जा रही है।

उसमें कोई कसर नहीं है। उस ओर मां बाप का भी बच्चों पर पूरा दबाव है। वे रात-दिन एक किए हुए हैं। अलग से कोचिंग भी कराते हैं। जीविका की शिक्षा स्कूल-कालेजों में मिल जाती है, लेकिन जीवन की शिक्षा का स्कूल-कालेजों में ही नहीं, घर-परिवारों में भी अभाव हो गया। जीवन की सीख किसे कहते हैं यह आज के अधिकांश युवाओं को पता ही नहीं है। उनकी केवल एक ही धुन है कि जैसे भी हो, बस पैसा कमाओ। यही वह परिवार और समाज से सीख रहा है। इसी चक्कर में उसके अपनों से भी रिश्ते-नाते टूटते जा रहे हैं।

गांवों को लेकर चिंता इसलिए होगी कि आज भी हमारे देश के करीब सत्तर फीसद लोग गांवों में रहते हैं। जिन लोगों ने गांवों से शहरों की ओर कूच किया, उसमें उनकी कोई न कोई मजबूरी रही। रोजी-रोटी की तलाश या फिर गांवों में शिक्षा की उचित व्यवस्था नहीं होने से लोग शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।

शहरों में जाकर उनकी आर्थिक स्थिति और शिक्षा से जुड़ी समस्या तो हल हो सकती है, लेकिन इसी के साथ-साथ धीरे-धीरे उन पर महानगरीय रंग चढ़ता जाता है। यह सब कोई एक दिन में नहीं हो जाता है। इसमें वर्षों और कई दशक भी लगते हैं। गांवों से शहरों में लोगों को इसकी चकाचौंध ने इस कदर अपने आगोश में लिया कि धीरे-धीरे गांवों से उनके रिश्ते नाते खत्म होते चले गए।

हालांकि ऐसा नहीं कि शहर के लोग अपने बच्चों को जीवन की बेहतर सीख नहीं देते हैं, मगर गांवों में बच्चों को मिले पाठ के मुकाबले के शहरों के संस्कारों में जमीन-आसमान का अंतर है। शहरों के बच्चे अपने घर में और बाहर देखते हैं कि किस प्रकार से अनेक परिजन दांवपेच लगा कर पैसा कमा कर लाते हैं। कैसे रातों रात लोग लखपती, करोड़पति और अरबपति बन जाते हैं। वे यह भी देखते हैं कि किस प्रकार से लोग इस आपाधापी और गलाकाट प्रतिस्पर्धा में लोग किसी का बुरे से बुरा करने में भी नहीं हिचकते।

एक समय था जब गांव की बेटी सबकी बेटी के रूप में प्यार और संरक्षण पाती थी। गांव का कोई व्यक्ति जब अपनी बेटी से मिलने उसकी ससुराल जाता था, तो उस गांव में अपने गांव की ब्याही गई किसी अन्य लडकी के भी घर मिलने चला जाता था और उसे आशीर्वाद देता था। वह महिला भी उसे अपने गांव के रिश्ते के अनुसार भइया, चाचा, ताऊ, बाबा कहकर संबोधित करती थी।

वह आने वाले से अपने परिवार के बारे में समाचार तो सुनती ही थी, पूरे गांव के बारे में भी पूछती थी। यह था एक दूसरे से जुड़ाव। एक कहावत है कि हमें दूध मिले तो हमारे पड़ोसी को हमारे यहां से कम से कम छाछ तो अवश्य मिलनी ही चाहिए। यही सब चीजें थी, जो हमें एक दूसरे जोड़े हुए थीं।

मगर अब सोचने पर पता चलता है कि इंसान और पशु-पक्षी में क्या अंतर है! पेट तो पशु-पक्षी भी भरते हैं, अपने रहने की जगह बनाते हैं। कुछ निर्धारित समय तक परिवार के साथ भी रहते हैं। फर्क केवल इतना कि प्रकृति से इंसान को अच्छे-बुरे में फर्क करने, सोचने की शक्ति मिली हुई है। कई मायनों में पशु-पक्षी इंसान से अच्छे साबित होते हैं।

अनेक लोग यह रोना रोते देखे जाते हैं कि आज के युवा अपने मां-बाप की भी नहीं सुनते। दरअसल, उन्हें जीवन की ऐसी सीख नहीं दी गई, जो वह किसी की सुने। सब धनपति बनने की चाह में दौड़ते रहे। बच्चों की ओर ध्यान कहां दिया गया? अपनी सुविधा और समय के अभाव की वजह से बच्चों को बचपन में ही छात्रावास में डाल दिया जाता है। महीने, दो महीने में मेहमान की तरह लोग अपने बच्चों से मिलने कुछ देर के लिए चले जाते हैं। स्कूलों में जीविका की शिक्षा के अलावा और क्या पढ़ाया जा रहा है!