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बड़प्पन के बरक्स

आमतौर पर समाज में जिन्हें ‘बड़े’ लोग के तौर पर देखा-समझा जाता है, उनसे हमारी अपेक्षाएं क्या होती हैं?

संकल्प की शक्ति

इतिहास साक्षी है कि मनुष्य के संकल्प के सामने नकारात्मक शक्तियां भी नाकाम हो जाती हैं।

दोस्ती बनाम दीवारें

अक्सर हमें ऐसे इंसान की तलाश होती है, जिससे हम अपना सुख-दुख, हर्ष-विषाद, हंसी-खुशी साझा कर सकें और अपनी इन्हीं अनकही भावनाओं को खुल कर व्यक्त करने के लिए हम सबको मित्र की जरूरत होती है।

बाजार में संवेदनाएं

प्रेम एक शब्द से अधिक भाव है। इसकी भाषा को हर कोई जानता है, भले ही भाषा कोई हो।

बुढ़ापे की छांव में

जिंदगी एक पहाड़ है। इसके एक-एक पड़ाव एक-एक चोटी हैं। जैसे-जैसे ऊपर चढ़ते जाएंगे, थकान बढ़ती जाती है।

त्रासद सपनों की विरासत

भूखा आदमी परेशान है। एक छोटा-सा परिवार भी है उसका। कितनी भयानक सर्दी है। पेट में अन्न का दाना नहीं।

पसंद नापसंद

किसी पत्र-पत्रिका में मेरी कोई रचना छपती और वह मेजर साहब की नजर से गुजरती है, तो उनका फोन आता ही है।

साहित्य का ‘आइटम स्वांग’

साहित्य में मूल्यवान वही माना गया जो मानवीय मूल्यों के साथ चले। लेकिन बीसवीं सदी के अंत में सोवियत रूस के विघटन के बाद मजबूत बाजार उत्तर आधुनिक मूल्यों के तौर पर मुठभेड़ कर रहा है।

भेदभाव का पाठ

नब्बे साल की बुजुर्ग महिला ने कहा- ‘मैं अगला जन्म लूंगी तो ये मोटी-मोटी बड़ी किताबें पढूंगी।’ उनके मन की कसक मुझे कहीं अंदर तक कचोट गई।

‘वैकेंसी’ वाली वैक्सीन

बेरोजगारी का आलम और ऊपर से कोरोनाकाल। इसमें भी सोशल मीडिया की सक्रियता। बेदिल को एक ऐसी बानगी देखने को मिली जिसमें ‘वैक्सीन’ का मतलब ‘वैकेंसी’ समझ लिया गया और देखते ही सूचना देने वाले की शामत आ गई।

अच्छाई का दायरा

मनुष्य हर समय कुछ न कुछ सीखता और सिखाता रहता है। दुनिया में सब तरह के लोग होते हैं।

गुम होता बचपन

सुबह की प्रकाश किरणें जब खिलती हैं, तो वातावरण प्रफुल्लित हो उठता है। पशु-पक्षियों की आवाजें हमारे कानों में गूंज उठती हैं।

सौंदर्य का स्वेद बोध

साहित्य और चेतना को मुक्त होने की वकालत करती निराला की ये पंक्तियां शब्दों की दुनिया के कारीगरों से बहुत कुछ कहती हैं। इन बातों में सबसे जरूरी है सौंदर्यबोध की बात।

समानता का अक्षर तर्क

निराला ने कविता के साथ गद्य लेखन भी खूब किया है। उन्होंने गद्य को ‘जीवन संग्राम की भाषा’ कहा है।

सांसत और विरासत के बीच निराला

मौजूदा दौर को जिन हर्र्फोंं, तर्कों और हवालों में हम सबसे ज्यादा महसूस कर सकते हैं, वे हैं- आंदोलन की दरकार और संवेदना के लोकतंत्र की हिफाजत।

दुनिया मेरे आगे: एकांगी दृष्टि

हममें से बहुत कम लोग व्यक्तियों, घटनाओं और विचारों को समग्रता से देख, परख और समझ पाते हैं।

ज्ञान सागर: समस्याएं समय के साथ हो जाती हैं हल

समस्याएं सहजात होती हैं यानी कि जन्म के साथ ही आती हैं। इनसानी जीवन समस्याओं को लेकर हमेशा बिखरा हुआ रहता है।

दुनिया मेरे आगे: सिकुड़ती दुनिया

भागदौड़ भरी जीवन शैली ने जीवन की छोटी-छोटी बातों की तरफ हमारा ध्यान जाने से लगभग रोक दिया है।

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