‘सर, फुटबाल में खिलाड़ी जावेद रहेगा।’ कक्षा के कुछ छात्रों ने कहा। ‘नहीं, नहीं सर, जावेद से कहीं अच्छा अशोक रहेगा।’ कक्षा में अशोक के कुछ साथियों ने कहा। बढ़ते हुए शोर को देख अध्यापक जी ने मेज को जोर से थपथपाया। एक पल तो कक्षा के वातावरण में चुप्पी छा गई। लेकिन कुछ ही देर में फिर से शोर होने लगा। आखिर अध्यापक जी ने फैसला किया, ‘ठीक है, दोनों को आज शाम को कक्षा आठवीं से जो फुटबाल का मैच खेला जाएगा उसमें खिलाया जाएगा। दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। दोनों में से जिसका खेल अच्छा होगा, उसे ही जिला स्तरीय फुटबाल प्रतियोगिता के लिए चुना जाएगा।’

विद्यालय में खेलकूद प्रतियोगिता चल रही थी। जावेद फुटबाल के खेल में रुचि रखता था। उसे अच्छा खेलना भी आता था। यह बात उसकी कक्षा के कई छात्र जानते थे, इसलिए ज्यादातर विद्यार्थी उसी का समर्थन कर रहे थे।

दूसरी ओर अशोक कक्षा का मानीटर था। उसका व्यवहार ऐसा था कि वह सब पर हावी होना चाहता था। वह इसमें बहुत हद तक सफल भी हो जाता था। उसके भी कुछ साथी इसलिए इसका समर्थन कर रहे थे। शाम को निश्चित समय पर रेफरी महोदय ने खेल शुरू करने के लिए सीटी बजाई।
दोनों टीमें फुटबाल के मैदान में उतरने लगी। अशोक ने सफेद रंग की टी-शर्ट पहन रखी थी। उसके एक साथी महेश ने उसे मैदान में उतरते समय कान में कुछ कहा, जिसे सुन अशोक हौले-हौले मुस्कुरा दिया। दूसरी ओर, जावेद नीले रंग की टी-शर्ट पहन मैदान में उतरा। सीटी बजने के साथ ही दोनों टीमों का खेल प्रारंभ हो गया। हाफ टाइम के आते-आते जावेद ने अपने विरुद्ध खेल रही टीम पर गोल कर दिया। उसकी कक्षा के ज्यादातर छात्रों ने उसकी प्रशंसा में तालियां बजा कर उसके खेल को प्रोत्साहित किया।

जनसत्ता साहित्य पेज: कहानी – दहेज के सौदे में लड़की का इंकार

इधर, अशोक ने अभी तक कोई विशेष खेल नहीं दिखाया था। जब जावेद ने गोल किया तो, वह उससे और भी ईर्ष्या करने लगा। अशोक यह अच्छे से जानता था कि वह खेल में जावेद के सामने टिक नहीं पाएगा। लेकिन, उसे तो अगले हफ्ते होने वाली जिला खेल प्रतियोगिता में खेलने का लालच जो था।
पूरा प्रयास करने के बाद भी जब अशोक से अच्छा खेलना मुश्किल हो रहा था, तो उसके मन में महेश की कही गई बात प्रबल रूप से दबाव डालने लगी। जावेद व अशोक एक ओर थे।

जावेद तेजी से फुटबाल के साथ आगे विरुद्ध टीम की ओर बढ़ रहा था। उसकी तरह ही अशोक भी आगे बढ़ रहा था। दूसरी टीम का खिलाड़ी जावेद से बाल लेने के लिए भिड़ा ही था कि अशोक ने तेजी से आगे बढ़ते हुए जावेद को धक्का देकर गिरा दिया। दर्शकों को ठीक से पता नहीं लग सका कि आखिर जावेद गिरा कैसे? जावेद भी पूरी तरह समझ नहीं पाया कि वह कैसे गिर गया? उसके घुटने में चोट आई थी। वह आगे नहीं खेल सका। जावेद के समर्थक निराश हो गए।

अब अशोक और महेश खुश थे कि उनकी योजना सफल हो गई। अब शेष बाकी रहे समय अशोक ही खेला। खेल में जावेद की टीम ही उस एकमात्र गोल से विजय हुई थी जो उसने हाफ टाइम से पहले किया था। सब उसके खेल की प्रशंसा कर रहे थे। अशोक और महेश इसलिए खुश थे कि चलो अब जावेद के जख्मी हो जानेसे वह खेल नहीं पाएगा। अब अशोक को ही प्रतियोगिता में स्थान मिलने की पूरी संभावना थी।

अशोक जब घर पहुंचा तो उसकी प्रसन्नता और भी बढ़ गई थी। वह ऊपर अपने कमरे में सीढ़ियां चढ़ता हुआ खेल के बारे में सोच रहा था। तभी अचानक पैर फिसल जाने से वह सीढ़ियों के नीचे लुढ़क गया। उसके बाएं हाथ में चोट आई थी। वह रात भर दर्द से बेचैन रहा। दर्दनिवारक दवा से भी उसे राहत नहीं मिल रही थी। अब हर बार के दर्द की टीस के साथ ही उसे खेल के मैदान में जावेद के साथ की गई ईर्ष्या जनित घटना पर दुख होने लगा। वह सोचने लगा, क्या वह भी मेरी तरह ही दर्द से बेचैन नहीं होगा? क्या मैंने उसे धक्का देकर उसका खेल प्रतियोगिता में श्रेष्ठ छात्र बनने का हक नहीं छीना? उसकी आंखों में एक अच्छे खिलाड़ी के साथ किए गए छल कपट वाले किए व्यवहार पर पश्चाताप के आंसू भर आए। वह पूरी रात दर्द और अपराधबोध की भावना के साथ करवटें बदलता रहा।

दूसरे दिन जब अशोक स्कूल गया तो उसने जावेद से उसके दुख-दर्द के बारे में पूछा। जावेद कहने लगा, ‘पता नहीं उस दिन कैसे गिर गया? कुछ पता नहीं चला। मैं तो बाल के साथ खेलते हुए अच्छे से आगे बढ़ रहा था।’

तभी अशोक ने आंखों में आंसू भर कर दुख प्रकट करते हुए कहा ‘जावेद तुम मुझे माफ करना। तुम उस दिन मेरी वजह से गिरे थे। मैंने ही तुम्हें थोड़ा धकेल दिया था, ताकि खेल प्रतियोगिता में भाग ले सकूं।’ अशोक ने सब कुछ सच-सच बता दिया। जावेद ने उसकी सच्चाई पर बस इतना कहा, ‘तुमने अपने गलत व्यवहार को स्वीकार लिया, यही सबसे अच्छी बात है। ईर्ष्या का भाव हमारा सुख चैन छीनकर हमें गलत राह की ओर भटकाता है।’ इतना कह जावेद ने अशोक को गले लगा लिया। कुछ दिनों बाद जावेद और अशोक की जोड़ी विद्यालय में सबको अच्छी लगने लगी।