अली दौड़ प्रतियोगिता में तेज भाग रहा है। वह समाप्त रेखा को सबसे पहले छू लेता है। वह प्रतियोगिता में प्रथम आया है, लेकिन बहुत उदास है। अली तीसरे नंबर पर आना चाहता था, क्योंकि तीसरे नंबर पर जीतने वाले विजेता को ईनाम में जूते मिलने वाले थे। प्रथम आने वाले अली का चेहरा ऐसा रुआंसा हो उठता है कि दर्शकों की भी इच्छा उसके साथ रोने की हो जाती है।
ईरानी फिल्मकार माजीद मजीदी की फिल्म ‘चिल्ड्रन आफ हैवन’ ऐसे दो बाल किरदारों की कहानी है, जिन्हें देख कर लगता है कि इस दुनिया में दया और मानवता के लिए हमेशा जगह बनी रहेगी। 1997 में माजीद मजीदी ने अपनी इस फिल्म में दो बच्चों के जरिए सामाजिक असमानता, आर्थिक तंगी से जूझ रहे तेहरान में स्वर्गिक भावों को दिखलाया है। अपने अभाव में एक-दूसरे को प्यार करते, एक-दूसरे की फिक्र करते बच्चे। इनके पिता छोटे-मोटे काम करते हैं, और मां बीमार होते हुए भी पूरे घर की देखभाल करती है।
अमर किरदार तोत्तो चान – एक ऐसी बच्ची जिसने दुनिया को सीखने का नया तरीका बताया
फिल्म का मुख्य किरदार अली दस वर्ष का है और उसकी बहन जेहरा सात वर्ष की है। जेहरा के जूते टूट जाते हैं और अली उसे ठीक करवाने के लिए जाता है। अली रास्ते में सब्जी खरीदने के लिए रुक जाता है और जूते का थैला बगल में रख देता है। तभी उधर से एक कचरे वाला गुजरता है और वह जूते के थैले को लेकर चला जाता है। सब्जी खरीदने के बाद अली देखता है कि जूते का थैला नहीं है। अली जिस तरह बदहवास होकर गलियों में जूते को ढूंढ़ता है वह एक भावुक दृश्य है। जेहरा को जब पता चलता है कि उसके जूते खो गए हैं तो वह बहुत परेशान हो जाती है कि बिना जूतों के स्कूल कैसे जाएगी।
अली और जेहरा इसका एक समाधान निकालते हैं। इसके तहत अली के जूते पहन कर जेहरा सुबह स्कूल जाएगी। अली को दोपहर के स्कूल में जाना होता है तो बाद में वह जेहरा से जूते बदल लेगा। स्कूल में शिक्षिका देखती है कि जेहरा अपनी नाप से बड़े जूते पहन कर आई है। स्कूल खत्म होते ही जेहरा अली को जूते देने के लिए दौड़ती है। इस चक्कर में अली को अक्सर स्कूल के लिए देर हो जाती है।
अमर किरदार: जब बिली इलियट नाचा, तो वर्ग की दीवारें हिल गईं
एक दिन जेहरा एक लड़की के पांव में अपने जूते देखती है। जेहरा उस लड़की के पीछे जाती है और देखती है कि उस लड़की के घर में बहुत गरीबी है। उसके पिता कचरा उठाते हैं, जिन्हें दिखता नहीं है। जेहरा को लगता है कि उस लड़की को जूतों की जरूरत उससे ज्यादा है। यहां पर निर्देशक ने दो अभावग्रस्त जिंदगियों का संघर्ष दिखाया है जहां जेहरा को लगता है कि उसके पास थोड़ा कम अभाव है।
एक तरफ दौड़ में प्रथम आने के लिए अली और जेहरा उदास हो रहे होते हैं, वहीं उनके पिता के पास इतने पैसे आ जाते हैं कि वह दोनों बच्चों के लिए नए जूते खरीदते हैं। फिल्म में अमीर फारूक हाशमी ने अली के किरदार के रूप में मासूमियत और सहृदयता के भावों को अमर कर दिया है। ये बच्चे अभाव की दुनिया में देवदूत जैसे लगते हैं।
