हरिद्वार में रहने वाली राम्या को नई दिल्ली में लगने वाले विश्व पुस्तक मेले का बेसब्री से इंतजार था। साल भर पहले से उसने उन किताबों की सूची बनाई हुई थी, जो उसे मेले से लेनी थी। किताबें तो वो आनलाइन भी मंगवा सकती थी, लेकिन मेले में जाने का एक फायदा यह भी होता कि वह उन किताबों को भी उलट-पुलट कर देख सकती थी, जिनके बारे में नहीं जानती थी। राम्या की बड़ी बहन दिल्ली में रहती है, जो खुद भी पढ़ने की शौकीन है। पुस्तक मेला शुरू होते ही राम्या बड़ी बहन के यहां आ गई और दोनों पहुंच गई पुस्तक मेले में।
राम्या ने एक खास रचनाकार की किताब को भी अपनी सूची में रखा था। सोचा था कि पहले मेले में किताब को उलट-पुलट कर देखेगी, तभी वही रचनाकार उसे संबंधित प्रकाशन की स्टाल पर मिल गई। राम्या और रचनाकार की फेसबुक पर दोस्ती थी।
राम्या ने नमस्ते करने के लिए अपने हाथ सक्रिय किए ही थे कि रचनाकार ने राम्या का हाथ पकड़ लिया और कहा कि वह उनकी पुस्तक खरीद कर, उसकी तारीफ करते हुए रील बनाए और सोशल मीडिया पर डाल दे। राम्या उनकी बात सुनते ही चौंक गई। जिस रचनाकार को वह गंभीर समझती थी, जिसकी किताब लेने का वह पहले ही सोच चुकी थी, उनका ऐसा व्यवहार?
राम्या सोशल मीडिया पर उन्हीं पुस्तकों के बारे में लिखती है, जो उसे वाकई पसंद आती हों। जिसे पढ़ कर राम्या को लगे कि इसे और लोगों को भी पढ़ना चाहिए, वह सिर्फ उसके बारे में ही लिखती है। पर, इस बार राम्या थोड़ी संकोच में पड़ गई। वह इतनी वरिष्ठ रचनाकार को न नहीं कह पाई।
स्टाल पर किताब का मूल्य चुकाने के बाद रचनाकार राम्या को मेले के सेल्फी प्वाइंट पर ले गई, और राम्या की उसकी किताब की तारीफ करते हुए वीडियो बनाए। राम्या को कोफ्त हो रही थी कि जो वक्त उसे, किताबों को ढूंढने में देना था, उसे वह झूठी तारीफ के वीडियो बना कर बर्बाद कर रही है।
इन दिनों यह समस्या राम्या ही नहीं, कई लोगों की है। हर किसी की किताबों की अपनी पसंद होती है। जब गंभीर दिखने वाले साहित्यकार भी अपनी किताब की जबरन तारीफ करवाएं तो यह साहित्य के लिए सोचने का समय है। जबरन तारीफ से चंद प्रतियां बिक भी जाएंगी तो उससे किसका भला होगा? साहित्यकार का या प्रकाशक का? साहित्यकार की पहचान तो तब होती है, जब कोई पाठक उसकी किताब पढ़े, और रचना से प्रभावित हो जाए।
इन दिनों कई पाठकों की शिकायत रही है कि उन्होंने सोशल मीडिया पर अति प्रचार के बाद फलां-फलां किताब खरीद ली, जिसमें पढ़ने लायक कुछ भी नहीं था। यहां तक कि किताबों का प्रचार भी उन साहित्यकारों ने किया था, जिनकी खुद की किताबों में पढ़ने और समझने के लिए बहुत कुछ होता है। ऐसे में पाठक गुमराह क्यों न हो जाएं? लेकिन यह भी सच है कि इस तरह से गुमराह कर के साहित्य की दुनिया में ज्यादा दिनों तक नहीं टिका जा सकता है।
