स्वाभाविक रूप से मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसका जीवन कई प्रत्यक्ष और परोक्ष सूत्रों से संचालित होता है।
संसार का निर्माण, संहार और पालन करने वालों में भी ‘मैं’ है।
मनुष्यों में स्मृति कोशिकाएं नष्ट नहीं होतीं, लेकिन बहुत बार बच्चे भी तो अपने माता-पिता को भूल ही जाते हैं।
भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली भाषा भोजपुरी के साथ झारखंड सरकार द्वारा अन्याय किया…
मासूम जीवों की जान लेना कोई बहादुरी तो नहीं है। जब यह आत्मबोध आया, तब मैंने गुलेल से तौबा कर…
जिंदगी में पुलों की तलाश करते-करते अधूरे पुलों की विरासत ढोना आज जैसे आम लोगों की नियति बन गई है।
फूलों के रंग और उनकी महक मन को परम आनंद से भर देती है।
वैसे भी शहरों में अब स्वयं खटिया की ही खटिया खड़ी हो चुकी है।
हमारे यहां डाक्टरों को ‘भगवान’ कहा जाता है, क्योंकि वे नाजुक परिस्थिति में भी हमारा जीवन बचा लाते हैं।
पिछले दो सालों में लगभग हर घर में वैद्य या डाक्टर उग आए हैं।
जिस देश की शिक्षा-व्यवस्था बहुसंख्यकों के धार्मिक प्रतीकों को ढोते-ढोते हांंफ गई हो, वहांं लड़कियों को हिजाब के विरोध से…
पांच इंच के परदे पर दुनिया तो जरूर सिमट आई है, पर जो निकट है, आदमी उससे दूर हो गया…