चिंता की बात यह है कि पुरुष द्वारा स्त्री के प्रति दरिंदगी का यह अत्याचार घटने के बजाय बढ़ता दिखाई…
किसी नदी के किनारे पर सुकून से कलकल को सुनें तो ऐसा महसूस होता है कि नदी गुनगुना रही है।
विवाह समारोहों के विभिन्न रिवाजों के निर्वाह और पालन में आजकल विवाह का मूल उद्देश्य भी बिल्कुल भुला दिया जाता…
किसी भी मौके पर यात्राओं या जुलूस में दिखावे के साथ-साथ परंपरागत आयोजनों को एक विचित्र उत्सव में तब्दील करके…
कुछ क्षणों का जीवन जीने वाले जीव हों या कई बार शतायु से भी ज्यादा जीवन जीने वाला मनुष्य, सब…
छोटी उम्र से ही बालिकाओं को यह सिखाया जाता है कि यह उनका अपना घर नहीं है। उन्हें दूसरे घर…
समाज के लिए जहां सत्य सामाजिक बंधन बनाने में मदद करता है, वहीं झूठ और पाखंड प्रतिकूल प्रभाव डालता है…
एक सभ्य और सुसंस्कृत इतिहास वाले देश के नागरिक से कम से कम यह उम्मीद तो की ही जाती है…
मनुष्य के रूप में हम एक दूसरे के साथ जुड़ने और भरोसा करने के लिए ही बने हैं।
हम आधुनिकता के चक्रव्यूह में फंसकर अपने रिश्तों, मर्यादाओं और नैतिक दायित्वों को भूल रहे हैं।
दुख-परेशानी में उलझा हुआ व्यक्ति खुद भी दुखों-परेशानियों का एक बड़ा कारण है, पर उसकी उलझन इतनी गहरी हो चुकी…
अब तो मोबाइल का चलन इतना व्यापक हो चुका है कि उसके बिना आदमी घर से बाहर एक कदम भी…