डॉ. वरुण वीर

मन, वाणी तथा शरीर से मनुष्य को सत्य का पालन करना चाहिए। योग मार्ग में सत्य बहुत महत्त्वपूर्ण स्तंभ है। बिना सत्य आचरण के जीवन में आत्मसाक्षात्कार की अनुभूति नहीं हो सकती। जीवन के प्रत्येक स्तर पर व्यवहार में शुद्ध, पवित्र आचरण मनुष्य को सामाजिक तथा आर्थिक स्तर के शिखर पर पहुंचा देता है। जिस समाज और राष्ट्र के व्यवहार में सत्यता होती है वहां भौतिक विकास भी तीव्र गति से होता है और कार्य में भी परिपक्वता दिखाई देती है। जो व्यक्ति सत्य का आचरण करता है, उसका सकारात्मक प्रभाव अन्य लोगों पर भी पड़ता है। सामान्य रूप से व्यवहार में असत्य बोलना पाप कर्म माना गया है। विश्व का कोई भी समाज या वर्ग असत्य व्यवहार को अनैतिक ही मानता है। चाहे घर-परिवार में हो, व्यापार, राजनीति या जहां भी हो, सामने वाला व्यक्ति आपसे सत्य व्यवहार की ही उम्मीद रखता है। जब व्यवहार में असत्यता हो, तो विश्वास टूट जाता है। संबंधों में दूरी आ जाती है, जो कि घृणा, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध तथा असंतोष को जन्म देती है।

एक समय था, जब झूठ बोलना पाप समझा जाता था और धन कमाने के लिए झूठ बोलना तो अत्यंत ही निकृष्ट माना गया था। लेकिन इस आधुनिक युग में भारत जैसे देश के लोगों की नैतिकता को अगर नापा जाए तो बड़े ही दुख के साथ कहना पड़ेगा कि योगी ऋषियों की पवित्र सात्विक भूमि पर आज समाज किस प्रकार से हिंसा, मांसाहार, गरीबी, अन्याय तथा अधर्म के गर्त में गिरता जा रहा है। आज मात्र धन कमाना लक्ष्य रह गया है। मैंने एक अनुसंधान में पाया कि एक सामान्य व्यक्ति दिन में लगभग दस झूठ बोलता है। जैसे किसी ने पूछा कि आप कितनी देर में आ जाएंगे? दूसरा व्यक्ति बोला, दस मिनट में, लेकिन वह व्यक्ति वहां उतने समय में नहीं पहुंचता है, तो नैतिकता की दृष्टि से यह भी असत्य की श्रेणी में ही आएगा। अगर वह थोड़ी देर से भी पहुंचे तो भी इसका कोई नफा-नुकसान किसी को नहीं है। मगर इस प्रकार के लगभग दस-पंद्रह झूठ दिन में एक सामान्य व्यक्ति अगर बोलता है, तो एक महीने में लगभग तीन सौ और एक साल में तीन हजार छह सौ झूठ बोलता है। इस तरह अगर व्यक्ति अस्सी वर्ष जीता है, तो वह अपने जीवन काल में लगभग दो लाख अट्ठासी हजार झूठ अपने जीवन में बोलता है, जिसका न कोई अधिक महत्त्व होता है और न ही कोई नफा-नुकसान। धन कमाने के लिए व्यापार में दूसरों को झूठे आश्वासन देना, कहना कुछ और करना कुछ, जाने कितने प्रकार के झूठ वह अपने पूरे जीवन काल में बोलता है। अगर इसका हिसाब-किताब लगाया जाए तो व्यक्ति बहुत भारी पाप का वजन अपने सिर पर लेकर मरता है। इस प्रकार के व्यवहार से सुविधाएं तो जुटाई जा सकती हैं, लेकिन आत्मिक सुख कभी नहीं पाया जा सकता है।

यह बात बिल्कुल असत्य है कि सत्य आचरण से इस जगत में नहीं जिया जा सकता। व्यक्ति को व्यवहार कुशल और वाकचतुर होना चाहिए। सत्यम शिवम सुंदरम का अनुकरण करना चाहिए। सत्य तो बोले, लेकिन उसे सुंदर तरीके से बोले, मीठा बोले, हितकर बोले। आज भारत की अपेक्षा यूरोप के व्यवहार में पारदर्शिता है। भारतीय समाज को चारित्रिक दृष्टि से ऊपर उठाने की अधिक आवश्यकता है। भारतीय दर्शन को भारतीय शिक्षा का अनिवार्य अंग बनाने की जरूरत है, जिससे विद्यार्थियों के जीवन में अनुशासन, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और संतोष का स्थान जीवन में हो तथा ईश्वर का भय और उसकी भक्ति स्वाभाविक रूप से जीवन में आए। सत्य के प्रयोग करने के दो मार्ग हैं। एक, जो पूर्ण रूप से योग मार्ग को समर्पित हो उसे पूर्ण रूप से, बिना स्वार्थ, संपूर्ण चराचर जगत के प्राणियों को समान तथा प्रेमभाव से देखना चाहिए। उस योगी की दृष्टि में किसी भी प्रकार का भेदभाव किसी के प्रति नहीं होना चाहिए। उसने अपने जीवन में जो ज्ञान, तप तथा भक्ति अर्जित की है उसका लाभ सभी ले सकें, यह उसकी भावना होनी चाहिए। योग को समर्पित व्यक्ति का जीवन संपूर्ण मानव जाति के लिए होना चाहिए, क्योंकि उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं होता है। जब उसके लिए सब समान होंगे, तो वह सत्य की प्रतिष्ठा सरलता से समाज में प्रतिष्ठित कर सकेगा। भारतीय परंपरा में संन्यासी का स्थान राजा से भी ऊपर माना जाता है। अगर राजा स्वार्थवश गलत कार्य करता था, तो संन्यासी उसे तुरंत सुधार के लिए आदेश दे सकता था। राजा स्वार्थी तथा असत्यवादी हो सकता है, लेकिन संन्यासी नहीं, क्योंकि वह धर्म की रक्षा करता है।

दूसरी ओर सामान्य व्यक्ति को जीवन में सत्य का पालन बुद्धिपूर्वक व्यावहारिक होकर करना चाहिए। अपना और दूसरे का नुकसान किए बगैर कार्य को साधना चाहिए। आज आधुनिक समाज में समस्या यह है कि जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है। अगर है भी तो केवल भौतिक सुख-सुविधाओं या फिर कोई पद पाने तक सीमित है। शरीर और मन को ही संतुष्ट करने वाले लक्ष्य हैं। आत्मा को संतुष्ट करने वाला लक्ष्य किसी-किसी दुर्लभ व्यक्ति का होता है। सामान्य रूप से भौतिक लक्ष्य की प्राप्ति मात्र आज के अधिकतर युवाओं का लक्ष्य है। कठिनाई यह है कि शिक्षण संस्थानों में नैतिक शिक्षा का अभाव है और यही हाल माता-पिता का भी है। जो अपने बच्चों को केवल ऊंचे पदों पर तो देखना चाहते हैं, लेकिन चरित्र निर्माण की बात नहीं करते हैं। जीवन में शरीर, प्राण, मन स्वस्थ्य तथा प्रसन्नता रहे, इस विचार के साथ अपनी युवा पीढ़ी के साथ चलना है। यह एक ही जीवन नहीं, बल्कि अनेक जीवन हैं। जो व्यक्ति ‘एक ही जीवन’ की विचारधारा को मानता है वह यह भूल जाता कि मूल में दुख का कारण भी यही है। जीवन-मृत्यु का चक्र अनंत है। सृष्टि का यह चक्र कभी रुकता या समाप्त नहीं होता है। परमात्मा की कर्मफल व्यवस्था में यह चक्र चलता रहता है। जो इस चक्र को नहीं मानता, वह प्रत्यक्ष रूप से परमात्मा को अन्यायकारी सिद्ध करता है। इस कारण एक ही जीवन मानने वालों में नैतिकता का अभाव हो जाता है। आज के भौतिकवादी युग में प्रत्येक देश में अपने आप को आगे बढ़ाने की होड़ में सभी प्रकार के अनैतिक हथकंडे अपना कर चलते हैं, जिसके कारण देशों के संबंधों में प्रतिस्पर्धा की भावना आ जाती है, जो कि हिंसा को जन्म देती है। पृथ्वी पर रहने वाले सभी मनुष्य समान हैं। सभी में एक आत्मा है। कोई बड़ा-छोटा नहीं। मूर्खतापूर्ण अहंकार के कारण दूसरे को अपने से छोटा या हीन मानना नादानी है। कभी कोई देश शिखर पर होता है, तो कभी कोई देश। इसका कोई बड़ा महत्त्व नहीं है। महत्त्व इस बात का है कि उस देश या सभ्यता से मानव समाज को कितना लाभ हुआ है। व्यक्तिगत सामाजिक तथा राष्ट्रीय स्तर पर सत्य को अपने जीवन में अपना कर केवल मनुष्यता के उत्थान और रक्षा के लिए जो कार्य करता है वही वास्तव में श्रेष्ठ है, अन्यथा अपने स्वार्थ सिद्ध करने के लिए तो सभी कार्य कर रहे हैं।

बिना सत्य व्यवहार के जीवन में आनंद नहीं आ सकता और न ही योग सिद्ध हो सकता है। शरीर, वचन तथा मन में सत्याचरण का लाभ होता है। मन में असत्य व्यवहार चित्त में असत्य संस्कारों को जन्म देता है और योग में सभी प्रकार के संस्कारों को समाप्त कर ध्याता, ध्यान, ध्येय का चिंतन करना चाहिए। जीवन में सत्य आचरण बहुत बड़ी तपस्या है। सत्य बोलने से व्यक्ति अनेक प्रकार के दोषों से बच जाता है। बुद्धि पूर्वक सत्य को अपना कर ही जीवन में सफलता प्राप्त करें। वही शांति तथा आनंद की सीढ़ी होगी।