डॉ. वरुण वीर
करीब सोलह साल पहले जब मैं पहली बार चीन आया, तब योग के नाम पर यहां बहुत कुछ नहीं था। पर मैंने अपनी आंखों से योग को चीन में फैलते हुए देखा है। चीन में योग के फैलने की गति भारत, यूरोप और अमेरिका से भी तेज रही है। अमेरिका और यूरोप में योग अपनाने का कारण विकसित अर्थव्यवस्था होने के साथ वहां के दैनिक जीवन में तनाव आ जाना था। पर चीन में योग विकासशील दौर में ही फैलने लगा और पश्चिम के विकासवाद के दुष्परिणामों को जान कर चीन ने पहले ही शरीर और मन को स्वस्थ तथा प्रसन्न रखने की विधियां अपनाने में कोई संकोच नहीं किया। चीन के लोग स्वास्थ्य के प्रति अधिक जागरूक हो रहे हैं। चीन में छोटे शहर से लेकर शंघाई, बेजिंग, शेंजन, नानजिंग आदि बड़े-बड़े शहरों में स्थानीय योग शिक्षकों के साथ-साथ भारतीय योग शिक्षकों की संख्या भी अच्छी-खासी है।
मगर एक समय था जब चीन में अच्छे भारतीय योग शिक्षकों की कमी थी। तीन से छह महीने का कोर्स करने के बाद अनेक भारतीय योग शिक्षक चीन में योग सिखाने पहुंच जाते थे, जिसके चलते योग की गुणवत्ता यूरोप और अमेरिका के मुकाबले कम थी। पर आज क्वालिटी कंट्रोल आॅफ इंडिया के कारण भारत से प्रशिक्षित और अनुभवी योग शिक्षक ही बाहर जा रहे हैं।
आज योग केंद्र विश्व के किसी भी देश में इतने नहीं हैं, जितने कि चीन में हैं। फिटनेस सेंटर में भी योग की कक्षाएं नियमित रूप से चलती हैं। स्थानीय चीन के लोगों में भारतीयों के प्रति श्रद्धा और मिलनसारिता का भाव है। बौद्ध धर्म के कारण भारत को वे अपने निकट मानते हैं। भारत और चीन का संबंध सांस्कृतिक रूप से सदा ही प्रगाढ़ रहा है। ह्वेन सांग 627-643 ईस्वी में जब भारत से अपने देश चीन वापस लौटा तो लगभग ढाई हजार आयुर्वेद के नुस्खे अपने साथ ले गया, ताकि वहां रोगियों की चिकित्सा में लाभ हो सके। प्योर योगा इंटरनेशनल योग केंद्र के नाम से विख्यात विश्व के अनेक देश जैसे हांगकांग, सिंगापुर, चीन, ताइवान तथा यूएसए में बड़ा कार्य कर रही है। प्योर योग केंद्र का पहला योग स्टूडियो हांगकांग में 2002 में खुला था और आज 2019 में लगभग एक अरब डॉलर की कंपनी बन चुका है। भारत की योग डिप्लोमेसी ने चीन में योग को फैलाने का अद्भुत कार्य किया है।
भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद तथा युन्नान मिंजु यूनिवर्सिटी का अनुबंध करना चीन और भारत के संबंध को राजनीतिक दृष्टि से ऊपर उठा कर स्थापित करने की बात है। आज चीन में भारत से अधिक और आधुनिक योग स्टूडियो बन चुके हैं। योग के प्रति लोगों का लगाव केवल योग दिवस पर नहीं, बल्कि प्रतिदिन योगासन करने से दिख जाता है।
आजीविका की दृष्टि से भी भारतीय योग शिक्षक चीन में अच्छा वेतन पा रहे हैं। लगभग योग शिक्षक का योग्यता और परिश्रम के आधार पर एक से तीन लाख रुपए प्रतिमाह कमा लेना आम बात है। भारत के योग शिक्षकों के लिए ही नहीं, बल्कि चीन के लोगों के लिए भी योग सिखाना, उससे धन कमाना एक बड़े व्यवसाय के रूप में फैलता जा रहा है। कोई भी फिटनेस सेंटर, हेल्थ क्लब और बड़े होटल में योग सरलता से उपलब्ध है। चीन पहले से ही एक स्तर तक आध्यात्मिक समाज में रहने वाला माना जाता रहने के साथ ध्यान की अनेक परंपराओं को विकसित करने का श्रेय भी जाता है। चीन राजनीतिक रूप से खुले विचारों वाला देश नहीं माना जाता है। लेकिन आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा स्वास्थ्य से संबंधित सभी प्रकार के विचारों का स्वागत करता है।
योग की सभी शाखाओं को चीन में अपनाया जा रहा है, जैसे हठयोग, नादयोग, ध्यान योग, ज्ञानयोग तथा प्राणायाम आदि और वर्तमान समय में योग के बदलते हुए स्वरूप जैसे पावर योग, हॉट योग, एरियल योग आदि भी बहुत प्रचलित हो रहे हैं। मुख्य रूप से चीन की युवा पीढ़ी पावर योग एवं हठयोग अपनाने में सबसे आगे है। इसका परिणाम भी शरीर के स्तर पर जल्दी ही देखने को मिल जाता है। युवा पीढ़ी सौंदर्य के साथ-साथ स्वास्थ्य के प्रति जागरूक दिखाई देती है। लगभग दस हजार योग स्टूडियो आज चीन में हैं, जो मुख्य रूप से शरीर के स्तर पर योग सिखा रहे हैं। सत्तर के दशक में जब योग भारत से यूएसए और यूरोप गया तभी योग चीन में भी गया था। उस समय जिस तेजी से योग पश्चिम में फैला उस गति से चीन में नहीं फैला था।
इसका कारण था चीन का अपने आप को एक वैचारिक सीमा में बांध कर रखना और साथ ही उस समय चीन आर्थिक दृष्टि से भी मजबूत नहीं था। लेकिन आज चीन का कायापलट हो चुका है। जिस प्रकार धन का खुलापन चीन में आया है उसी प्रकार से दुनिया के उन सभी तत्वों को स्वीकार करने में चीन परहेज नहीं कर रहा है, जिससे कि चीन की आम जनता शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का लाभ उठा सके। बौद्ध देश होने के कारण चीन में अध्यात्म के प्रति श्रद्धा दिखाई देती है। बौद्ध संघ राजनीतिक स्तर पर चाइना पीपुल्स पार्टी का समर्थन भी करती है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक बुद्धिजीवी हैं, जो अपने संबोधन में अधिकतर चीनी संस्कृति की बात करते हैं।
कई चीनी बुद्धिजीवी भारत आए, उनमें से एक प्रोफेसर जू फैनचेंग भारत में पांडीचेरी श्रीअरविंद के आश्रम में आकर लंबे समय तक योग सीखा और पचास उपनिषदों का अनुवाद किया। आज भारत में चीनी राजदूत लुओ झाओहुई और उनकी पत्नी प्रोफेसर जू फैनचेंग के निकट और शुभचिंतक रहे हैं। चीनी राजदूत की धर्मपत्नी संस्कृत की जानकार होने के साथ-साथ बौद्ध संस्कृति की पुस्तकें भी कर चुकी हैं। एशिया के अधिकतर देशों की संस्कृति लगभग एक जैसी है, जिसमें परिवार, व्यापार सामाजिक दशा आदि के संस्कार दिखाई देते हैं। भारत और चीन एशिया के देश होते हुए विश्व के आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर अपना दबदबा रखते हैं। दोनों देशों को जोड़ने में योग महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
आने वाला समय एशिया का है। केवल एशिया के पास संस्कृति और संस्कारों की ऐसी परंपरा है, जो संपूर्ण विश्व को जोड़ सकती है। इस दिशा में योग चीन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। वैसे तो आरंभ से ही भारतीय आध्यात्मिकता चीन को लुभाती रही है और चीन भी सदा भारत को सम्मान की दृष्टि से देखता रहा है। पर आज भारत को चीन से योग के स्तर पर अच्छे संबंध बनाने के लिए अच्छे से अच्छे चरित्रवान, ईमानदार और परिश्रमी योग शिक्षकों को चीन भेजना चाहिए। कुछ महीने का योग प्रशिक्षण लेने के बाद भारतीय योग शिक्षक चीन चला जाता था। योग का गहरा ज्ञान न होने के कारण उसका आचरण योग को कलंकित करता था। अनेक भारतीय योग शिक्षक वहां जाकर मांस और शराब का सेवन करने लगते थे, जिससे योग की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लगता था।
भारतीय योग शिक्षकों का चीन में जाकर योग का प्रचार-प्रसार करना तभी सफल होगा जब योग शिक्षक केवल धन कमाने की सोच लेकर न जाए, बल्कि अपने मित्र देश में योग का राजदूत बन कर जाए, इसलिए उसका आचरण भी शुद्ध, सात्विक तथा सौम्य होना चाहिए, जिससे कि भारत और चीन का संबंध अधिक गहरा बन सके।
