सत्तर के दशक में एक फिल्म आई थी-‘माय लव’। तब इस फिल्म का एक गीत ‘वो तेरे प्यार का गम एक बहाना था सनम, अपनी किस्मत ही कुछ ऐसी थी कि दिल टूट गया…’ और इसकी धुन लोगों की गुनगुनाहटों में समा गई थी। और जज्बातों से साथ गीतों में जीने वालों के सुर में आज भी वह उसी गहराई से गुनगुनाई जाती है। लेकिन एक धुन में गम और दर्द का समंदर उतार देने वाले संगीतकार दान सिंह को शायद लोगों ने याद रखना जरूरी नहीं समझा। मायानगरी की भूलभुलैया में जिंदा ही गुम कर दिए कर दिए गए इस फनकार के ‘जिंदा भूत’ को खोजने का श्रेय जाता है वरिष्ठ पत्रकार ईशमधु तलवार को। दान सिंह पर लिखी अपनी किताब में तलवार कहते हैं कि एक बार वे गुनगुना रहे थे, ‘जिक्र होता है जब कयामत का तेरे जलवों की बात होती है, तू जो चाहे तो दिन निकलता है, तू जो चाहे तो रात होती है।’ यह गुनगुनाते वक्त एक मित्र ने पूछा कि क्या आपको पता है कि इन गानों का संगीतकार कौन है! फिर उसी ने बताया कि दान सिंह जयपुर में ही रहते हैं।
तब इस बात पर तलवार ने एकबारगी यकीन नहीं किया, लेकिन फिर साधक दान सिंह की खोज में निकल पड़े और एक महीने में उन्हें खोज डाला। इसके साथ ही शुरू हुआ एक पत्रकार और जमाने में भुला दिए गए संगीतकार का रिश्ता। और इस सुरीले रिश्ते की याद को उन्होंने अपनी किताब ‘वो तेरे प्यार का गम: संगीत का खोया सितारा दान सिंह’ के जरिए साझा किया है।
दान सिंह को खोजने के बाद तलवार ने उनसे बातचीत की और उनका इंटरव्यू ‘नवभारत टाइम्स’ में प्रकाशित कराया। छपने के बाद दान सिंह ने तलवार से कहा, ‘आपने मुझे जिंदा कर दिया…मैं तो मर गया था।’ और इस घटना के ब्योरे के बाद तलवार ने किताब में फिल्मकार जगमोहन मूंदड़ा और फिल्म वितरक आरडी जैन की टेलीफोन पर हुई गुफ्तगू साझा की है। मूंदड़ा ने जैन को बताया कि फिल्म ‘बवंडर’ लगभग तैयार है, लेकिन मैं आपको उसका संगीत पहले सुनाना चाहता हूं…राजस्थानी लोक-संगीत का जो रूप मैं चाहता था, वह हू-ब-हू इसमें उतर आया है।
जैन ने जानना चाहा कि संगीतकार कौन है? मूंदड़ा ने जवाब दिया-दान सिंह। जैन का प्रतिप्रश्न था, क्या आप पागल हो चुके हैं? दान सिंह को मरे बाईस साल हो चुके हैं। उसकी तो 1978 में मुंबई में मौत हो गई थी। वरना अब तक वह चुप बैठता क्या?’ तलवार किताब के जरिए जिस बेपर्द तरीके से मुंबई की मंडी का बदसूरत सच दिखाते हैं, उस पर गौर करने के बाद सिहरन पैदा होने लगती है। किताब में गुमनामी की कब्र से बाहर निकाले गए इस संगीतकार के कई किस्से-कहानियां हैं, कई ठहाके हैं, धुनें हैं और कई गीत हैं। दान सिंह बचपन में अपने गले से कोयल की ऐसी कूक निकालते थे कि हर कोई समझता था कि वह कोयल ही है।
किताब में कई भावुक वर्णन हैं। ‘मेरा नाम जोकर’ में स्टेज पर लोगों को हंसाते-हंसाते जब राजकपूर को अपनी मां के मरने की खबर मिलती है तो उनकी आंखों पर लगी पिचकारी से आंसू की बौछारें होती हैं। जोकर रो रहा होता है और दर्शक हंस-हंस कर लोट-पोट हो रहे होते हैं। आकाशवाणी के जयपुर केंद्र में नौकरी कर रहे दान सिंह को जब अपनी मां के मरने की खबर मिली तो वे लाइव कार्यक्रम प्रसारित कर रहे होने के कारण घर नहीं जा सके। दान सिंह को लगा कि ऐसी नौकरी किस काम की। सब कुछ छोड़ कर पहुंच गए मुंबई।
लेकिन दान सिंह शायद यह नहीं जान सके थे कि मुंबई वह जगह है जहां लोगों को भावुक कर देने वाले गाने के कैसेट बेचने वाली कंपनियों पर तो पैसे बरसते हैं, लेकिन दिल और दिमाग से भावुक इंसान को एक पैसे के लिए भी तरसना पड़ता है। दान सिंह को जो फिल्में मिली थीं, उनके गाने खूब चले, मगर उनकी फिल्में टिकट खिड़की पर कोई कमाल नहीं कर पार्इं।
किताब में ऐसे कई प्रसंग पाठकों के भीतर जज्बातों का उथल-पुथल मचा देते हैं। यह दर्द ठीक उसी तरह दिल में ठहर जाना चाहता है, जिस तरह दान सिंह ने अपने समय के खिलाफ चल कर धीमे और मीठे गानों का रास्ता चुना। हर किसी के दिल के दर्द को साझा करते इनके गाने दिल पर तारी हो जाते हैं। किताब में मशहूर फिल्म गीतकार इरशाद कामिल कहते हैं कि वरिष्ठ संगीतकार दान सिंह ने ‘माय लव’ के रूप में फिल्मी संगीत को ऐसा तोहफा दिया है, जिसकी चमक कोहेनूर हीरे जैसी है। जब भी अच्छे और पाएदार फिल्मी संगीत की बात होगी तो ‘माय लव’ के संगीत को शायद नहीं भूला जा सकेगा।
