भारत छोड़ो आंदोलन, जिसे अगस्त क्रांति भी कहा जाता है, आजादी के लिए भारतीय जनता के जज्बे की अद्भुत मिसाल है। जब गांधीजी ने करो या मरो का नारा दिया, तो सामान्य जनता भी इस आंदोलन में कूद पड़ी थी। शहरों से कहीं ज्यादा गांवों से लोगों ने हिस्सेदारी की और विभिन्न ब्रिटिश कार्यालयों पर तिरंगा फहराने का साहस दिखाया था। इसमें सभी वर्गों और राजनीतिक विचारधाराओं के लोगों ने बलिदान की भावना से हिस्सा लिया था। भारतीय जनमानस के इस अदम्य साहस की कहानी कह रहे हैं प्रवेश कुमार।
भारत छोड़ो आंदोलन (1942) जिसे ‘अगस्त क्रांति’ भी कहा जाता है, भारतीय जनता की वीरता और लड़ाकूपन की अद्वितीय मिसाल है। यह अपने अर्थों में अधिक मायने रखता है। इस आंदोलन में समाज का वह वर्ग बढ़-चढ़ कर भाग लेता है, जिसे आजकल का बुद्धिजीवी वर्ग राजनीतिक रूप से अचेत (पॉलिटिकल अनकांशियस) समझता है। सन 1942 का जन-आंदोलन काल और परिस्थितियों में उभरा ऐसा आंदोलन था, जिसका केंद्र सिर्फ शहर नहीं थे, बल्कि इसका प्रभाव क्षेत्र गांवों में ही ज्यादा था। यह आंदोलन संपूर्ण समाज की अगुआई में लड़ा गया था, इसलिए महात्मा गांधी ने पहले ही यह घोषित कर दिया था कि इस आंदोलन में कोई नेता नहीं, जनता ही इसकी नेता है। आप खुद निर्णय लें और जन-आंदोलन खड़ा करें। अब अंग्रेजों को भारत से जाना ही होगा। भारत छोड़ो आंदोलन भले ही 1942 में प्रारंभ हुआ, लेकिन उसकी पृष्ठभूमि पहले ही तैयार हो गई थी।
सन 1937 के आम चुनाव में कांग्रेस ने बड़े बहुमत के साथ जीत हासिल की और आठ प्रांतों में उसकी सरकार भी बनी। इसी के दो वर्ष बाद यानी एक सितंबर,1939 को द्वितीय विश्वयुद्ध का आगाज हो गया। इस युद्ध में जर्मनी जहां सोवियत संघ की ओर बढ़ रहा था, वहीं जापान दक्षिणी-पूर्वी एशिया के फ्रांसीसी एवं ब्रिटेन के उपनिवेशों की ओर तेजी से बढ़ रहा था। यह सब देख कर ब्रिटेन ने भी युद्ध में शामिल होने की घोषणा कर दी। इस कर्म में भारत में वायसराय लार्ड लिनलिथगो ने तीन सितंबर को ‘भारत भी इस युद्ध में शामिल होगा’ की घोषण कर दी। यह घोषणा बिना किसी विचार-विमर्श के की गई, जिसका कांग्रेस ने विरोध किया, क्योंकि कांग्रेस को कुछ वर्षों पूर्व जनता ने चुना था। एक निर्वाचित सरकार से न पूछना जनता को भी नागवार गुजरा। इसलिए वह भी अंग्रेजी राज के खिलाफ हो गई। इसी विरोध में कांग्रेस शासित आठ प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इन सबने अंग्रेजी शासन के युद्ध में शामिल होने के फैसले से अपने को अलग कर लिया। इसके खिलाफ विनोबा भावे अपने हजारों समर्थकों के साथ जेल गए। वहीं गांधीजी ने व्यक्तिगत सत्याग्रह किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक चिट्ठी के हवाले से ज्ञात होता है कि संघ के कार्यकर्ताओं को व्यक्तिगत रूप से आंदोलन में सम्मिलित होने के लिए तैयारी में लगने को कहा गया था।
इस प्रकार ऐसे तमाम संगठन अंग्रेजी शासन के खिलाफ एकजुट हो रहे थे। विश्वयुद्ध के शुरू होने के कारण बढ़ती कीमतों और जरूरी वस्तुओं के अभाव ने भी जनसाधारण में बेहद असंतोष बढ़ाने का काम किया। बंगाल और ओड़िशा के तटीय इलाकों में लोगों की नावों को सरकार द्वारा जब्त कर लिया गया था, ताकि जापानी उनका इस्तेमाल न कर सकें। नावें जब्त होने से लोगों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था। जापानी कहीं सिंचाई की नहरों का जल-परिवहन के लिए इस्तेमाल न कर लें, यह सोच कर नहरों का पानी बहा दिया गया। इससे खेत सूखने लगे थे। इन सभी परिस्थतियों में कांग्रेस ने अपनी कार्यसमिति में 14 जुलाई, 1942 को गांधीजी के नेतृत्व में ‘अब संघर्ष हो’ का फैसला किया। गांधी जी ने बैठक में ब्रिटिश शासन से साफ -साफ कहा, ‘या तो अंग्रेज जनता को सत्ता सौंप दें या फिर अभूतपूर्व अहिंसात्मक जनांदोलन का सामना करें।’
देश से बाहर सुभाष चंद्र बोस ने जर्मनी में हिटलर से मुलाकात की और जापानी सेना की सहायता से इन सबने अंग्रेजी राज की जड़ें हिलाने का काम किया। यह सब देख 12 अगस्त, 1941 को अमेरिका और ब्रिटेन के राष्ट्र प्रमुखों की मुलाकात हुई और अटलांटिक चार्टर जैसा एक दस्तावेज दुनिया के सामने आया। इसमें दोनों राष्ट्रों ने माना कि ब्रिटिश और अमेरिकी सरकार सभी लोगों के अपनी सरकार चुनने के अधिकार का सम्मान करती है और यह चाहती हैं कि उनको जिन्हें स्वशासन के परमधिकार से बलपूर्वक वंचित कर दिया गया है, वह परमधिकार उनको लौटा दिया जाए।
इसी क्रम में मार्च, 1942 में क्रिप्स मिशन को भारत भेजा गया। क्रिप्स मिशन ने तीन बातें कहीं। पहली बात यह थी कि देश का शासन देश की जनता चलाएगी। दूसरी थी- युद्ध समाप्त होने के बाद भारत की जनता द्वारा संविधान निर्माण किया जाएगा और तीसरी बात जिस पर सबसे ज्यादा विवाद हुआ, वह यह थी कि जो भी देसी रियासतें भारत का हिस्सा बनना चाहती हैं या जो अलग रहना चाहती हैं, उनको आजादी है। गांधी और कांग्रेस ने इसका विरोध किया। देश की जनता भी इस प्रस्ताव के खिलाफ थी। सात और आठ अगस्त,1942 को कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक थी। इसी बैठक में आठ तारीख को रात दस बजे भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पास किया गया। इस सभा में गांधीजी ने तीन बातें कही थीं। पहली बात प्रस्ताव को लेकर की, जिसमें ‘करो या मरो’ का नारा दिया, दूसरी बात ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ नारे को लेकर थी। तीसरी और अंतिम बात थी- आज से प्रत्येक भारतीय अपने को स्वतंत्र समझें।
