नीरज पांडेय
डीप सी वेंट एक विशाल अंर्तजलीय ज्वालामुखी है। पूर्वी प्रशांत महासागर के तल में लगभग आठ हजार फुट नीचे ज्वालामुखी के फटने से यह बना है, जो कि पानी के भीतर का एक अजूबा माना जाता है। इस स्थान पर सूर्य की रोशनी भी नहीं पहुंच पाती। इसका निर्माण सागर की गहराई के तल में घटित ज्वालामुखी विस्फोट और महाद्वीपीय परतों के खिसकने और परस्पर टकराने के कारण हुआ था। इस भौगोलिक क्रिया के कारण इन परतों के स्थानों से लावा बहकर भू-प्रदेश पर चादर की तरह फैल गया। इस क्रिया से वहां का तापमान छह सौ डिग्री फॉरेनहाइट से अधिक हो गया और ज्वालामुखी की दीवारों में पड़ी दरारों से उबलता हुआ पानी लावे के साथ चारों ओर फैल गया। यह प्रक्रिया कई हफ्तों तक चलती रही। ज्वालामुखी से निकला काला गाढ़ा धुआं वास्तव में धात्विक गुणों से युक्त था, जो कि धीरे-धीरे जलगत ज्वालामुखी का पंख बन गया और उसके गर्म लावे ने चारों ओर अवक्षेप के रूप में जगह बना लीं।
ज्वालामुखी फटने की इस घटना से पानी में प्रतिवर्ग इंच पर कई हजार पौंड का दबाव बना और परिणामस्वरूप बना सुराख मैंगनीज और अन्य खनिजों से भर गया। इस छिद्र की खोज से पहले वैज्ञानिक मानते थे कि समुद्र में पाए जाने खनिजों को महाद्वीपीय नदियों द्वारा महासागर में ले जाया जाता है।इस आश्चर्यजनक सुराख वाले स्थान पर सूर्य की रोशनी नहीं पहुंचती, इसलिए यहां जलगत अजूबों को मानव चालित शक्तिशाली रोशनी में देखा जा सकता है। 1977 में पहली बार आल्विन नामक पनडुब्बी के वैज्ञानिकों ने इस सुराख की तस्वीरें खींच कर दुनिया के सामने रखीं। इसके अध्ययन से महासागरीय वैज्ञानिकों को इस स्थान की भोजन शृंखला का पता चला, जिसे वहां पनपनेवाले जीव खाते थे। इस सुराख में जीवन का प्रारंभ जीवाणुओं से होता है और ये ही दूसरे जीवों के लिए भोजन बन जाते हैं।
यहां तीन सौ प्रकार की समुद्री जीवों की प्रजातियां निवास करती हैं। इनमें बारह फुट लंबा लाल नोक वाला विशालकाय ‘ट्यूबवॉर्म’ प्रमुख है, जो अपने तीन लाख संस्पर्शकों की सहायता से पानी से भोजन खींच लेता है। यहां के नेत्रहीन केकड़े व झींगे, आॅक्टोपस के साथ-साथ घूमते रहते हैं, जो घोंघों और केकड़ों को खाकर जीवित रहते हैं। इसके अलावा गुलाबी वेंट फिश, समुद्री खीरे, स्पंज, नाजुक स्टारफिश और फूलों के समान लगने वाले ऐसे आकर्षक जीव भी पाए जाते है, जो अपने उपांगों को चट्टानों पर चढ़ने के लिए प्रयोग करते है।
इस अंधेरे सुराख में रहने वालों में मोलस्क की अड़तालीस प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें सीप भी शामिल है। यहां दस इंच लंबी सीप भी निवास करती हैं। ऐसे कई अज्ञात सुराख अभी तक प्रशांत महासागर और अटलांटिक महासागर में हैं, जिनकी खोज जारी है। वैज्ञानिकों का विश्वास है कि इनकी खोज के बाद और यहां रहने वाले जीवाणु के अनुसंधान से शायद यह पता चले कि धरती पर जीवन की शुरुआत किस विलक्षण तरीके से हुई है। ०

