श्रीशचंद्र मिश्र
विश्व विरासत सूची में भारतीय स्थलों की संख्या अब पैंतीस हो गई है, जो यूनेस्को की नजर में ऐतिहासिक धरोहर हैं और उनकी उचित देखभाल करने की जरूरत है। इटली (इक्यावन), चीन (पचास), स्पेन (पैंतालीस), फ्रांस (बयालीस) और जर्मनी (इकतालीस) के बाद यूनेस्को की सूची में भारत का छठे स्थान पर आना एक मायने में उपलब्धि है। अभी छियालीस और स्थलों को विरासत सूची में शामिल करने का भारतीय दावा समीक्षा के स्तर पर है। इस्तांबुल (तुर्की) में हुई विश्व विरासत समिति की चालीसवीं बैठक में बिहार के नालंदा विश्वविद्यालय के भग्नावशेष के अलावा स्विस-फ्रेंच वास्तुशिल्पी ली कर्बूजिए के बसाए चंडीगढ़ शहर और सिक्किम के रवांग चेंद जोंगा राष्ट्रीय उद्यान को विरासत की मान्यता दी गई। विरासत सूची की अवधारणा 1972 में शुरू हुई थी। इसका लक्ष्य विभिन्न देशों के सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक महत्त्व के स्थलों का चयन कर उन्हें संरक्षित रखने की कोशिश करने का था। 1978 में ऐसे बारह स्थलों से शुरू हुई यह सूची अब एक हजार चालीस तक पहुंच गई है।
यूनेस्को की विरासत सूची एक औपचारिकता भर नहीं है। इसमें शामिल स्थलों के रखरखाव पर एक वैश्विक पैनल नजर रखता है। विरासत स्थलों की देखरेख के लिए स्पष्ट दिशा निर्देश हैं। एक सौ बानबे देश इस अभियान में शामिल हैं। भारत में विरासत सूची में शामिल स्थलों के रखरखाव की हालत कैसी है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अरसा पहले विश्व विरासत की सूची में शामिल हुई कुतुब मीनार की पांचवी मंजिल में आई दरारों को तब पाटा गया जब उसके ढहने की नौबत आ गई। दिलचस्प बात यह है कि 1955 में पहली बार इन दरारों को देखा गया था। तब कामचलाऊ मरम्मत कर दी गई। उसके बाद इस तरफ ध्यान ही नहीं दिया गया। नीचे से देखने पर इन दरारों का आसानी से कभी पता नहीं चल पाया। लिहाजा उसकी उपेक्षा होती रही। कुतुब मीनार बनाने में लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर का इस्तेमाल किया गया। पांचवी मंजिल में आई दरार को भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के विशेषज्ञों ने फिलहाल तो पाट दिया, पर उसका स्थायी इलाज अभी तक नहीं हुआ है। दरार दो पत्थरों के बीच में थी और दो से तीन इंच की थी। विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी पुरानी इमारत में लोहे का भी इस्तेमाल किया गया है, इसलिए समय के साथ-साथ लोहे में जंग लग जाने की वजह से चट्टानों में दरार पड़ जाना सामान्य बात है। बहरहाल, विश्व विरासत सूची में शामिल स्थलों की देखरेख और उन्हें संरक्षित रखने का काम थोड़े बहुत मानक स्तर पर हो रहा है तो यूनेस्को की समिति के दिशा निर्देशों की वजह से, लेकिन उस सूची में ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्त्व के जो स्थल शामिल नहीं हैं, उनकी लगातार दुर्दशा हो रही है। देश भर में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) के जिम्मे जिन स्थलों के संरक्षण का काम था, उनमें से चौबीस लुप्त हो गए हैं।

पुरातात्त्विक महत्त्व के कई ऐसे स्मारक हैं, जो उपेक्षित हैं। उनकी कोई सुध नहीं ली जाती। कुछ साल पहले महरौली (दिल्ली) के आर्कियोलॉजिकल पार्क में बने चौदहवीं शताब्दी के खान शाहिद मकबरे की बाहरी दीवारों को पोत दिया गया और एक अन्य छोटा स्मारक अतिक्रमण का शिकार हो गया। दो सौ एकड़ में फैले महरौली पार्क में पुरातात्तिवक महत्त्व के करीब साठ स्मारक हैं। पार्क के रखरखाव की जिम्मेदारी दिल्ली विकास प्राधिकरण की है। लेकिन उसके स्मारकों के सरंक्षण का जिम्मा एएसआई का है। बहरहाल, दिल्ली विकास प्राधिकरण, एएसआई और दिल्ली वक्फ बोर्ड के बीच उलझे स्मारकों की दशा बिगड़ रही है। समस्या सिर्फ यह नहीं है। पुरानी दिल्ली के दरीबां कला में मुगलकाल की आठ सौ साल पुरानी खंजाची की हवेली लगभग खंडहर हो चुकी है। मूल निर्माण से छेड़छाड़, तोड़-फोड़ और अंधाधुंध व्यावसायिक इस्तेमाल ने हवेली को जर्जर कर दिया है। दिल्ली सरकार ऐतिहासिक विरासतों को सहेजने का दावा भले करती रहे, लेकिन खंजाची की हवेली का नाम दिल्ली नगर निगम की विरासत स्थल की सूची तक में नहीं है। संगमरमर के नक्काशीदार खंभों पर खड़ी खंजाची की हवेली में शाहजहां के खंजाची बहीखाते रखा करते थे। हवेली में एक सुरंग है, जो लाल किले तक जाती है। उपेक्षित रहने की वजह से हवेली से कीमती संगमरमर और मुगल शैली की जालियां लोग उखाड़ कर ले गए हैं।

सालों तक पुरानी दिल्ली के बल्ली मारान में मिर्जा गालिब की हवेली में लकड़ियों की टाल रही। जैसे तैसे उसे विरासत मान कर उसकी दशा थोड़ी बहुत सुधारी गई। दिल्ली नगर निगम ने सात सौ सड़सठ ऐसी ऐतिहासिक इमारतें अधिसूचित की हैं जिनका पुरातात्त्विक महत्त्व है। उन्हें सांस्कृतिक विरासत मान कर उन्हें सहेजने का काम किया जाता है। इनमें फतेहपुरी मस्जिद और चांदनी चौक की वह पुरानी इमारत शामिल है, जिसमें स्टेट बैंक आॅफ इंडिया का दफ्तर बन गया है। विरासत स्थल की सूची बने अरसा हो गया है और इसके लिए दिल्ली सरकार समय-समय पर अपनी पीठ भी थपथपाती रही है। लेकिन इन विरासत स्थलों की दशा सुधारने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। ‘इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट ऐंड कल्चरल हेरिटेज’ ने कुछ समय पहले सात सौ अड़तीस ऐसी हवेलियों और इमारतों की सूची तैयार की, जिनका संरक्षण किया जाना जरूरी है।

चौंकाने वाली बात यह है कि दिल्ली के एक सौ चौहत्तर स्मारक एएसआई की संरक्षण सूची में हैं, लेकिन इनमें से बारह या तो गायब हैं या उनका पता नहीं चल पा रहा। ये स्मारक है- मोती गेट, फूल चादर, बाराखंभा कब्रिस्तान, अलीपुर कब्रिस्तान, कुतुब मीनार के पास महरौली में शम्सी तालाब, जोगाबाई गुंबद, निकलसन की प्रतिमा, कोटला मुबारकपुर की गुमटी, निजामुद्दीन में तीन गुंबद वाला मकबरा आदि। एएसआई सूत्रों का अनुमान है कि बढ़ते शहरीकरण की वजह से दो और स्मारक गायब हो गए होंगे। हालांकि उनकी अभी पहचान नहीं की जा सकी है। एएसआई की संरक्षित सूची वाले स्मारकों की हिफाजत के लिए कानून बने हुए हैं। 2010 में पुराने स्मारकों, पुरातात्त्विक स्थलों और अवशेषों के लिए बने कानून में संशोधन कर व्यवस्था की गई थी कि अधिसूचित स्मारकों के आसपास के सौ मीटर के दायरे में जरूरी मरम्मत और सजावट के अलावा कोई निर्माण कार्य नहीं कराया जा सकता। एक सौ एक से तीन सौ मीटर के दायरे में भी निर्धारित मापदंडों के अनुरूप ही निर्माण कराए जाने की इजाजत है। लेकिन एएसआई संरक्षित ज्यादातर स्मारकों में इस कानून का धड़ल्ले से उल्लंघन हो रहा है।

