देवेंद्रराज सुथार

भारत में भ्रष्टाचार का रोग बढ़ता ही जा रहा है। हमारे जीवन का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं बचा, जहां भ्रष्टाचार के असुर ने अपने पंजे न गड़ाए हों। नैतिक मूल्यों और आदर्शों का कब्रिस्तान बन गया है। देश की सबसे छोटी इकाई पंचायत से लेकर शीर्ष स्तर के कार्यालयों और क्लर्क से लेकर बड़े अफसर तक, बिना घूस के आज सरकारी फाइल आगे ही नहीं सरकती। ‘ट्रांसपैरेंसी इंटरनशेनल’ की एक रपोर्ट से भी इसकी पुष्टि होती है। इस रिपोर्ट के अनुसार, 2017 के ‘ग्लोबल करप्शन परसेप्शन इंडेक्स’ में भारत इक्यासीवें पायदान पर है। इस सूची में एक सौ अस्सी देशों को शामिल किया गया है। सार्वजनिक क्षेत्र में फैले भ्रष्टाचार के कथित स्तर के आधार पर इसमें स्थान तय किया गया है, जिसमें भारत को इक्यासीवें स्थान पर रखा गया है। 2016 में भारत एक सौ छिहत्तर देशों की सूची में उन्यासीवें स्थान पर था।

दरअसल, भ्रष्टाचार पहले से और विकट हो गया है। लगता है, आज के समय में ईमानदारी तो महज कागज का एक टुकड़ा बन कर रह गई है। हर क्षेत्र में जब तक जेब से हरे-हरे नोटों की उष्णता नहीं दिखाई जाए, तब तक हर काम कछुआ चाल से ही चलता है। न जाने कब पूरा होगा? राम भरोसे! लेकिन जैसे ही नोटों की गर्मी पैदा होती है, काम में तेजी आने लग जाती है। इस गर्मी के प्रकोप से बड़े-बड़ों का ईमान पिघलने लगता है। बच्चों का शिक्षण संस्थान में दाखिला करवाना हो या किसी को सरकारी अस्पताल में भर्ती कराना हो, बिना मुट्ठी गरम किए होता नहीं है। भ्रष्टाचार की दीमकें हमारी सारी व्यवस्था को खोखला कर रही हैं। कभी सोने की चिड़िया कहा जाने वाला भारत आज भ्रष्टाचार के कीचड़ में धंस चुका है। हमारे नैतिक मूल्य और आदर्श सब स्वाहा हो चुके हैं। बढ़ता हुआ भ्रष्टाचार आचरण-दोष का ही परिणाम है। आजकल अखबारों, टीवी और रेडियो में एक ही खबर सुनने-देखने को मिल रही है, वह है भ्रष्टाचार की। हर दिन भ्रष्टाचार के काले करनामे उजागर हो रहे हैं। देश में भ्रष्टाचार को मिटा कर सभी नागरिकों को रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करना सरकार का काम ही नहीं, बल्कि राजनीतिक धर्म भी होता है। लेकिन आजादी से लेकर अब तक देश की सरकारें भ्रष्टाचार को मिटाने में विफल रही हैं। दरअसल, जब तक भ्रष्टाचार की राजनीतिक बुनियाद पर चोट नहीं की जाती, भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई भी मुहिम तार्किक परिणति तक नहीं पहुंच सकती। चुनाव कितने खर्चीले हैं, चुनावों में कितना बेहिसाब धन बहाया जाता है, हर कोई जानता है। लेकिन यह कितने लोग जानते हैं कि यह सारा धन किन जगहों से, किन स्रोतों से जुटाया जाता है? चुनावों में खर्च होने वाले धन का अधिकांश स्रोत अज्ञात रहता है। जब तक चुनाव पूरी तरह पारदर्शी और सादगीपूर्ण नहीं होंगे, भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लग पाएगा।

भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा प्रचलित रूप रिश्वतखोरी है। आए दिन अखबारों में रिश्वत के कारनामे उजागर होते रहते हैं। आज हरेक क्षेत्र रिश्वतखोरी के रंग में रंग चुका है। लोगों में रिश्वत देकर काम निकलवाने की प्रवृत्ति घर करती जा रही है। जनमानस में यह धारणा बैठ गई है कि रिश्वत देने से हर कठिन काम सरल हो जाता है। इसलिए आज हर मौके पर और हर काम के लिए रिश्वत दी और ली जा रही है। सरकारी दफ्तरों में रिश्वत लेने का सिलसिला बहुत पुराना है। भारत पूरे एशिया में रिश्वतखोरी के मामले में सबसे अव्वल है। दुनिया भर में भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली बर्लिन स्थित संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा कराए गए सर्वे के मुताबिक एशिया में एक चौथाई लोगों को पिछले साल सरकारी सेवा लेने के लिए घूस देनी पड़ी। संस्था की रिपोर्ट में बताया गया है कि पाकिस्तान से आस्ट्रेलिया तक एशिया प्रशांत के सोलह देशों में बीस हजार लोगों से बातचीत की गई। इस सर्वे से आए नतीजों के अनुसार, नब्बे करोड़ लोगों को पिछले साल कम से कम एक बार सरकारी अधिकारियों की जेब गरम करनी पड़ी। भारत में प्रत्येक दस में से करीब सात भारतीयों को सार्वजनिक सेवाएं लेने के लिए किसी न किसी रूप में घूस देनी पड़ती है। रिश्वतखोरी के मामले में भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शीर्ष पर है। रिपोर्ट के अनुसार, रिश्वत की दर भारत और विएतनाम में सबसे अधिक थी, जहां दो तिहाई लोगों का कहना है कि शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी आधारभूत सेवाओं के लिए भी उन्हें सरकारी कर्मचारियों को खुश करना पड़ा। इस सर्वे में जापान, दक्षिण कोरिया, हांगकांग और आस्ट्रेलिया में घूसखोरी के सबसे कम मामले बताए गए। जहां तक रिश्वत लेने वाले सरकारी अधिकारियों का सवाल है, सर्वे के अनुसार घूस मांगने के मामले में पुलिस महकमा सबसे ऊपर है। पिछले साल पुलिस के संपर्क में आने वाले करीब एक तिहाई लोगों ने माना कि उन्हें रिश्वत देनी पड़ी है। साथ ही, संस्था का कहना है कि रिश्वतखोरी से सबसे ज्यादा गरीब लोग प्रभावित होते हैं। सर्वे में शामिल गरीब तबके के अड़तीस प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें रिश्वत देनी पड़ी। यह तादाद किसी भी आयवर्ग में सबसे ज्यादा थी।

दुनिया के दस सबसे भ्रष्ट देशों में शीर्ष पर सोमालिया और दसवें पायदान पर वेनेजुएला है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के अनुसार भारत, पाकिस्तान और थाईलैंड जैसे देशों में घूसखोरी का शिकार गरीब लोगों के बनने की आशंका ज्यादा है। हाल ही में विएतनाम के लोगों ने वहां की सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के प्रति गंभीर न होने के आरोप लगाए हैं। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति पार्क गेउन हाय पर तो संसद ने दिसंबर में महाभियोग चलाया था और लाखों लोग उनके इस्तीफे की मांग करते हुए सड़कों पर उतरे थे। मलेशिया के प्रधानमंत्री नजीब रजाक पर अरबों रुपए के गबन का आरोप है। बढ़ते भ्रष्टाचार से चीन और थाईलैंड के लोग भी चिंतित हैं। रिश्वतखोरी रोकने के लिए सर्वप्रथम हमें खुद को बदलना होगा, क्योंकि रिश्वत देकर परेशानियां खड़ी करने वाले भी हम ही हैं और बाद में सरकार को कोसने वाले भी हम ही हैं। इसलिए अगर भ्रष्टाचार से निजात पाना है, तो हमें खुद से ही शुरुआत करनी होगी, रिश्वत न देने का संकल्प लेना होगा। फिर, मतदाता के तौर पर भी हम भ्रष्टचार से लड़ने में काफी अहम भूमिका निभा सकते हैं। विभिन्न प्रत्याशियों के हलफनामों से पता चल जाता है कि किसके पास कितनी धन-संपत्ति है। और अब तो सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी निर्देश दे दिया है कि उम्मीदवारों को अपनी और अपने परिवार के अन्य सदस्यों की संपत्ति के साथ-साथ इन सबकी आय के स्रोत का भी खुलासा करना होगा। यह निर्देश अमल में आने के बाद यह जान पाना आसान हो जाएगा कि किस उम्मीदवार ने अपनी आय के ज्ञात स्रोत के मुकाबले अधिक धन-संपत्ति जुटाई है। ऐसे उम्मीदवार को क्यों चुना जाए, चाहे वह किसी भी पार्टी का हो? ऐसे उम्मीदवारों को नकारने का अभियान चले तो पार्टियों पर यह दबाव बनेगा कि वे खूब छानबीन कर ईमानदार लोगों को ही टिकट दें।