एलियंस के साथ संवाद

केप केनेडी से 1972 में पायनियर-10 अंतरिक्ष यान में एक धातु पट्टिका पर संदेश उकेर कर भेजा था। एलियंस के नाम लिखे इस संदेश में एक से दस तक की संख्या, पांच मूलभूत तत्वों की परमाणु संख्या, डीएनए कुडंली और पृथ्वी पर खड़े मनुष्य का रेखाचित्र भेजे थे। यह अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष में ही भटक कर सौरमंडल की सीमा के पार कहीं चला गया। इसके बाद 1977 में वॉयजर-1 तथा वॉयजर-2 अंतरिक्ष यान छोड़े गए। इनमें अज्ञात ग्रहों के अज्ञात पराग्रहियों के लिए लंबे समय तक गूंजने वाले रिकार्डेड दृश्य-श्रव्य संदेश भेजे गए। इनमें पृथ्वीवासियों की कई प्रकार की आवाज और प्राणियों, पहाड़ों, नदियों और अन्य भौगोलिक स्थलों के छायाचित्र थे। इनमें भारत की एक भीड़ भरी सड़क, ताजमहल का चित्र और लोकगयिका केसरबाई केलकर के गाए गीत ‘राम तुम जात कहां हो,’ का अंश भी शामिल है। ज्यादातर खगोलविदों ने एलियंस से संवाद के लिए गणितीय भाषा का प्रयोग सर्वोत्तम माना है। इसीलिए बाइनरी अर्थात भारतीय अंक प्रणाली की संख्याओं के चित्र पायनियर-10 अंतरिक्ष यान में भेजे गए थे।

अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले इतिहासकार चार्ल्स हैपगुड से आइंस्टीन ने कहा था, ‘मैं यह मानने को तैयार हूं कि प्रागैतिहासिक काल में ग्रहों के वासी पृथ्वी पर आए थे।’ पराग्रही प्राणियों के अध्ययन क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. फ्रांसिस क्रिक और लेस्त्री आर्गल जैसे जीव विज्ञानियों का मानना है कि ‘जीवन की उत्पत्ति पृथ्वी पर नहीं हुई। आज से अरबों वर्ष पूर्व, हमारी आकाशगंगा में स्थित किसी सभ्य ग्रह से शैवाल अथवा सूक्ष्मजीवों से भरा कोई अंतरिक्ष यान पृथ्वी पर आया होगा और पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति और सभ्यता का विकास करके अपने ग्रह पर वापस लौट गया होगा।

इसी क्रम में प्रसिद्ध जीव वैज्ञानिक कार्ल सैगन ने कहा था-‘अन्य ग्रहों पर जीवन है या नहीं, इस खोज की शुरुआत हमें पृथ्वी से ही करनी होगी, क्योंकि पृथ्वी पर अन्य ग्रहों पर जीवन के अनेक बोलते प्रमाण हैं।’ कार्ल सैगन ने अपने प्राध्यापक मित्र आइएस स्कलोवस्की के साथ मिलकर एक विचारोत्तेजक शोधपूर्ण पुस्तक ‘इंटेलिजेंट लाइफ इन द यूनिवर्स’ पराग्रहियों पर लिखी है। इसमें दोनों ने अनेक तर्कों और साक्ष्यों से यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि जिस काल में मानव पूर्ण मानव (होमोसेपियेंस) बना था, उस कालखंड में या उससे कुछ समय पूर्व पृथ्वी पर अन्य किसी ग्रह से अत्यंत सभ्य और प्रबुद्ध प्रजाति के लोग आए थे।

उन्होंने इस मत का आधार प्राचीन सुमेर तथा अक्कद (वर्तमान बेबीलॉन) की कला, संस्कृति और विज्ञान को बनाया है। जैविक विकास प्रक्रिया के अनुसार उन्हें सभ्य होने में कई हजार वर्ष लगने थे, पर वे जिस तत्परता से सभ्य हुए, वह हैरानी में डालने वाला तथ्य है। दरअसल, ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि सुमेर और अक्कद देशों के लोग अंतरिक्षवासियों के उत्तराधिकारी थे। बेबीलोन, असीरिया और फारसवासी असुर यानी सक्षम जाति के लोग थे। सुमेर के प्राचीन इतिहास में उल्लेख है कि प्राचीन सुमेरवासी ऐसे लोगों के वंशज हैं, जो मानव नहीं थे तथा अन्य ग्रहों से पृथ्वी पर आए थे। सुमेर की दंतकथाओं में ऐसा उल्लेख है। इन कथाओं में ‘अपकल्लूू’ नामक देवता का जिक्र बार-बार आया है। सुमेर की प्राचीन शैल भित्तियों पर कीलाक्षर लिपि में ताम्रपत्रों पर जो वर्णन है, उससे ज्ञात होता है कि इस देवता का अवतरण प्राचीन सुमेर के जन्म के कई हजार वर्ष पूर्व हुआ था। अमेरिकी खगोलशास्त्री जेएन हाइन ‘अंतरिक्ष में जीवन’ विषय पर शोधरत हैं।

उनका मानना है, ‘पृथ्वी के अतिरिक्त अन्य ग्रह भी हैं, जहां मनुष्य से भी अधिक उन्नत और सभ्य प्राणी निवास करते हैं।’ रूसी खगोलशास्त्री वेलारिना जूरावलेवा ने कहा था-‘अपने अध्ययन से हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि अंतरिक्ष के विभिन्न ग्रहों से अंतरिक्ष यात्री अपने अंतरिक्ष यानों से प्राचीन काल से पृथ्वी पर आते रहे हैं। हमारी परिकल्पना है कि ये अंतरिक्ष यात्री पौराणिक कथाओं के देवता रहे होंगे। ये यात्री स्वान नामक तारा-समूह में स्थित एक सुदूर ग्रह से आए थे। आज भी इस ग्रह से पृथ्वी पर समझ में नहीं आने वाले रेडियो संदेश आते रहते हैं। स्वयं हमने ऐसे कुछ संदेश प्राप्त किए हैं।’

ब्रितानी वैज्ञानिक जॉन केज ने स्वीकार किया है कि ‘ग्रहों से पृथ्वी पर आने वाले प्राणी, वास्तव में दूरस्थ ग्रहों के ऐसे संज्ञावान प्राणी हैं, जिनकी रचना ऋणात्मक विद्युत से हुई है। वे मानव निर्मित सजीव पदार्थों के किसी भी वर्ग में नहीं आते। जब कभी उनमें विद्युत ऊर्जा अधिक हो जाती है, तो वे अतिरिक्त ऊर्जा को विसर्जित करने पृथ्वी पर आ जाते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान वे कई रंग, रूप और आकार धारण करते हैं।’ नासा में भारतीय वैज्ञानिक रहे डॉ. राम सिन्हा ने कहा था- ‘अंतरिक्ष की खोज से संबंधित वैज्ञानिक अब यह मानते जा रहे हैं कि अतीत में सभ्य ग्रहों के समृद्धशाली व तकनीक से संपन्न लोग पृथ्वी पर आ चुके हैं। उन्होंने पृथ्वी और अन्य अविकसित ग्रहों से लगातार संपर्क बनाए रखने के लिए, अंतरिक्ष में कहीं अपना ठिकाना भी बना रखा है।’