नरेंद्र मोहन
देखे थे मैंने उन दिनों
लाहौर में
आगजनी, हत्याकांड और बलात्कार के
सैकड़ों मंजर
सियाह पड़ते खूनी हाशिए
और मेरे बचपन में उतर गए थे
जिलावतनी के लंबे काफिले
पेड़ से टूटी टहनियां-सी टांगे और हाथ
डर से विस्फारित आंखें
जले हुए आदमी और ध्वस्त पड़ी इमारतें
उघड़े हुए नंगे घरों का अंधेरा और
लुटी-पुटी दुकानों का उजाड़
औरतों का आर्त्तनाद
और स्मृति गवां चुके बच्चे
जली-सहमी दहलीजें और डयोढियां
और देखता हूं खुद को
पाब्ला पिकासो की पेंटिंग ‘गुरर्निका’ में
दाखिल एक पल
निकलते भागते दहशतजदा दूसरे पल
दबे कुचले हाशियों पर
कौन लिख रहा खूनी लकीरों-सी इबारत
अब भी
कुएं में गिरती आवाज-सी एक खलां
अब भी
कैसे हुआ कि बोलने और सुनने से
नफी
उसने बुरी तरह हकलाते हुए देखा-भर
और बयां कर दी अमानवीय यातना
और त्रासदी की अकथ-कथा
रेखाओं रंगों की सिकुड़नों में
आखिर सांस की मर्मांतक पीड़ा
और मेरी आंखों में घूमने लगी है
सतीश गुजराल की पार्टीशन
पेंटिंग की सीरीज
चक्राकार
और मैं देख रहा
अपने गिर्द
अब भी
दम तोड़ता मंटो
और फैलते हुए सियाह हाशिए…
अंधेरे को ठेल रही लड़कियां
रात है-
गहरे मंथन में
धीमे-धीमे सांस ले रहा समुद्र
हिलोरे धीमी धीमी
नि:शब्द
रोशनी मद्धम मद्धम
चमक रहा समुद्र
अंधेरे में
तूफान के आसार हैं
उजाला बेशक दाग दाग
अंधेरे को ठेल रही
समुद्र की बेटियां
पुलसिया बूटों तले रौंदी-मुचड़ी पड़ी
किताबें ही किताबें
अनगिनत पन्ने बिखरे पड़े
हर सिम्त
उतर रहा अंधेरा
किताबों के उजाले को
शहीदी बीड़ की मानिंद
सिर पर उठाए ये लड़कियां
तड़ तड़ बजती लाठियों को चीरती
एक लय बनी
तंरग-सी
खौफ के चिथड़े उड़ाती चीख-सी
निरभै बिंदास ये लड़कियां
उजाला बेशक दाग-दाग
अंधेरे को ठेल रही लड़कियां

