(एक)

एक सख्त लोहे को पिघलाने के लिए
किसी बड़े से कोयले की नहीं, छोटे-छोटे टुकड़ों
की जरूरत होती है
लेकिन तब,
देखना यह है कि वे एकजुट हैं या तितर-बितर
इस बार भी कहीं कोई घात न हो जाए
हमारी आशाओं पर तुषार-पात न हो जाए

आपने देखा होगा,
निरंतर टूटते और छोटे होते जा रहे टुकड़ों में
दहकने की तीव्रता बढ़ती चली जाती है
और एक अदद चेहरे के लाल होते ही
पूरी की पूरी भट्ठी सुलग जाती है
तब चाहे जितना भी लाल-पीला हो ले
वह सख्त लोहा उसका हश्र है, हम सबको पता
लेकिन तब, देखना यह है कि हवा की नीयत क्या है
आक्सीजन में कहीं हाइड्रोजन न मिल जाए
और इस बार भी कहीं कोई घात न हो जाए
हमारी आशाओं पर तुषार-पात न हो जाए।

(दो)

गांव वालों ने मिल कर
गांव की जमीन पर
गांव घर के लोगों के लिए
जो तालाब खोदा था
वह इतनी जल्दी सड़ जाएगा
कब हमने सोचा था
पर भाई मेरे,
चौरे पर बिखरे फूल की सुगंध से तालाब की
सड़ांध नहीं जाती
बास मारते लोटे को मुंह से लगा कर
आंखें भींच लेने भर से जी का मिचलाना नहीं
रुकता
तो भाई मेरे, कब तक हमें आंखों को मींचना होगा
अब इस पूरे तालाब को उलीचना ही होगा।

खींचना ही होगा हमें नसों की प्रत्यंचा को
और, त्रिशूल लेकर वर्षों से पानी के बीचोबीच खड़े
इस घुन खाए लट्ठे को तोड़ना ही होगा
जो हर बार नए सिरे से पानी को सड़ाता है
बड़ी शिद्दत से, खामोशी से, चुपके-चुपके
और, जिसके इशारों पर खड़े रहे हम वृक्ष बन कर
किनारों पर
यह मान कर कि हमारे भजन-कीर्तन से शिवालय
का शिव जागेगा
और, हम सबों के बीच से ही कोई त्रिनेत्र बन पानी
को भाप बनाएगा
या फिर, लट्ठे को उसका पाप ही खा जाएगा
क्योंकि सांय-सांय करती हवाएं, व्यक्त कर चुकी हैं
हर पेड़ पर अपनी-अपनी व्यथाएं,
तो भाई मेरे, पानी में पहल करने से पहले हमें एक-
दूसरे का हाथ खींचना ही होगा
इस पूरे तालाब को उलीचना ही होगा।

(तीन)

चिड़ियों से कौन कहे कि किसी एक बिजूके का
टूट जाना आतंक का अंत नहीं
अभ्यस्त हाथ हर लाठी को बिजूके की शक्ल देना
जानते हैं
दुश्मन वे हाथ हैं
और, हाथों की शक्तियां
हंड़िए का भूत या भूसे का बुत नहीं
चोंच के वार जिसने आज तक सहे।
चिड़ियों से कौन कहे।
कौन कहे तोड़ने को
हाथों की हड्डियां
जिनकी रंगों में है चिड़ियों का खून
कानून के दस्ताने पहनने के बाद
छिपे जाते हैं जिनके खूनी नाखून
और, जिनके गुर्गे, हर खेत में खड़े हैं
कंधों पर लटकाए चिड़ियों की लाशें
भूख से तपड़ते, रोते-कलपते
चिड़ियों के दस्ते को हुलकाते बार-बार
आज भी खड़े हैं वे फसलों के बीच
आदिम लिबास में, पर शातिर अंदाज में
आवाजें बदल के जो छलते रहे
चिड़ियों से कौन कहे।

(विवेकानंद)