धर्मेंद्रपाल सिंह

मध्य वर्ग के उदय, आबादी पर युवा तबके के असर और संचार-क्रांति के कारण हाल के कुछ वर्ष में भारत में खेलों का विस्तार तेजी से हुआ है। आज देश की 29.3 प्रतिशत आबादी 0-14 वर्ष आयु वर्ग की है। पहले टेलीविजन और अब इंटरनेट की बदौलत खेल घर-घर में दस्तक दे रहे हैं। 2014-15 के बीच देश में खेल-प्रेमी टीवी दर्शकों की संख्या में तीस फीसद का उछाला आया था। आज की युवा पीढ़ी स्मार्ट फोन और इंटरनेट की है, जिसका लाभ खेलों को मिला है। भारत में डिजिटल दर्शकों में 60 प्रतिशत 13.35 आयु वर्ग के हैं। 2005 में कुल जनसंख्या में मध्य वर्ग का हिस्सा महज चार फीसद था, जो 2025 तक बढ़कर 41 फीसद हो जाने का अनुमान है। 2005 में हर परिवार अपनी आय का औसत पांच प्रतिशत धन मनोरंजन पर व्यय करता था, जो 2025 में बढ़कर नौ फीसद हो जाने की आशा है। मतलब यह कि भारत में खेलों का भविष्य बहुत उज्ज्वल है।कल तक खेल केवल मनोरंजन का माध्यम थे, अब कमाई का जरिया बन चुके हैं। विकसित देशों में तो वह बाकायदा उद्योग का दर्जा ले चुका है। 2007 में इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के उदय के बाद हिंदुस्तान का सबसे लोकप्रिय खेल क्रिकेट भी उद्योग बन गया है।

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अनुसार आज आईपीएल की ब्रांड वैल्यू करीब 3.70 खरब रुपए है। 2015 में सकल घरेलू उत्पाद में इस प्रतियोगिता का योगदान 115 खरब रुपए था। यह आंकड़ा अच्छे-खासे कारपोरेट के होश उड़ाने को काफी है। आईपीएल की सफलता से प्रेरित हो आज देश में करीब एक दर्जन खेल लीग चालू हैं। लाखों लोग हॉकी, फुटबॉल, कबड्डी, टेनिस, बैडमिंटन, कुश्ती लीग के दीवाने हैं। क्रिकेटरों की करोड़ों की कमाई पुरानी बात है, अब तो हाकी, फुटबाल, कबड्डी, बैडमिंटन लीग से जुड़े अनाम खिलाड़ियों की बोली भी पचास लाख से एक करोड़ रुपए के बीच लगती है। इतना ही नहीं, क्रिकेट से इतर खेलों के नामी खिलाड़ी करोड़ों रुपए के अनुबंध कर रहे हैं। रियो ओलंपिक में बैडमिंटन का रजत पदक जीतने वाली पीवी सिंधु ने पचास करोड़ रुपए का करार कर सबको चौंका दिया। कंफेडरेशन आॅफ इंडियन इंडस्ट्री (सीसीआई) और नामी कंसल्टिंग फर्म केपीएमजी ने गत वर्ष ‘बिजनेस आॅफ स्पोर्ट्स’ नामक रिपोर्ट जारी की, जिसमें अनेक दिलचस्प तथ्यों का खुलासा होता है। रिपोर्ट के अनुसार आज दुनिया में खेल उद्योग की कीमत 480 से 620 अरब डालर (317 से 410 खरब रुपए) के बीच है। खेलों के दीवाने कुछ देशों की जीडीपी में खेल उद्योग का हिस्सा पांच प्रतिशत तक है। मोटा-मोटी इस उद्योग का अर्थ है खेल उपकरणों का निर्माण और व्यापार, खेल मेडिसन का कारोबार, आधारभूत संरचना खड़ी करना, प्रतियोगिताओं का आयोजन, प्रायोजन और प्रसारण आदि।

समाज पर खेलों के पड़ने वाले प्रभाव को लेकर भारत में अभी तक कोई अध्ययन नहीं हुआ है। इंग्लैंड में एक अध्ययन के अनुसार 2010 में वहां खेलों ने अर्थव्यवस्था में करीब 17.4 खरब रुपए का योगदान दिया, जो जीडीपी का 1.9 फीसद था। राष्ट्रीय रोजगार में खेलों का हिस्सा 2.3 प्रतिशत रहा और देश के चोटी के 15 उद्योगों में से एक खेल उद्योग था। आर्थिक पहलू के अलावा खेलों का एक सकारात्मक सामाजिक पक्ष भी है। अध्ययन के मुताबिक खेलों में रुचि के कारण इंग्लैंड का युवा वर्ग अपराध और समाज विरोधी गतिविधियों से विमुख हुआ, राष्ट्र भावना को बल मिला, जनता में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता आई तथा पर्यावरण पर अनुकूल असर पड़ा, क्योंकि लोग वाहन के बजाय पैदल चलने लगे या साइकिल का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने लगे। इसी बदलाव का परिणाम है कि आज क्रिकेट के अलावा कबड्डी, फुटबाल और हाकी लीग भी करोड़ों दर्शक देखते हैं। देश में कुश्ती, शतरंज, तीरंदाजी, बैडमिंटन, मुक्केबाजी, टेनिस, निशानेबाजी, स्नूकर और बिलियर्ड के विश्वस्तरीय खिलाड़ी हैं। पिछले पांच-सात बरस के दौरान खेलों में क्रांतिकारी बदलाव आया है। केपीएमजी की रिपोर्ट के अनुसार 2015 में हिंदुस्तान का केवल खेल प्रायोजन कारोबार 51.90 अरब रुपए था। आज क्रिकेट ही नहीं कबड्डी, हाकी, फुटबाल और कुश्ती लीग को भी भरपूर प्रायोजक मिल रहे हैं।

बदलाव तो दर्शकों में भी आया है। ग्रामीण परिवेश से उभरे कुश्ती और कबड्डी जैसे खेल शहरी बाबुओं को भा रहे हैं। ब्रॉडकास्ट आॅडियंस रिसर्च कौंसिल आॅफ इंडिया(बीएआरसी) के ताजा आंकड़ों के अनुसार आज विभिन्न खेल लीग के दर्शकों में 45 प्रतिशत ग्रामीण हैं। फुटबाल से जुड़ी इंडियन सुपर लीग के तो 47 फीसद दर्शक गांवों के हैं। दर्शकों में एक और बड़ा परिवर्तन हुआ है। अब हिंदुस्तानी महिलाएं भी बड़ी संख्या में खेलों की दर्शक हैं। 2016 के आईपीएल मैचों की कुल दर्शक संख्या में उनका हिस्सा इकतालीस प्रतिशत था। इसी प्रकार 2015 की प्रो कबड्डी लीग में उनकी भागीदारी 39 फीसद तथा 2014 की टेनिस लीग में 38 प्रतिशत थी। 2014 की फुटबाल लीग में तो बच्चों और महिलाओं की साझा संख्या आधे से अधिक (57 प्रतिशत) थी। खेल प्रसारण के दौरान विज्ञापन देने वाली कंपनियां इस बात से वाकिफ हैं। वे अपने प्रचार की भाषा और मसाला इसी हिसाब से गढ़ रही हैं। सारे बदलाव बदलते खेल बाजार का प्रमाण हैं। इसी वजह से भीमकाय कॉरपोरेट और बड़े-बड़े औद्योगिक घराने खेल कारोबार से जुड़ने लगे हैं। उनके लिए खेल केवल दान-दक्षिणा का काम नहीं, मोटी कमाई का जरिया हैं। अभी तक जो कॉरपोरेट टैक्स बचाने की नीयत से या कॉरपोरेट सोशल रेस्पोंसिबिल्टी (सीएसआर) की मजबूरी की वजह से खेल और खिलाड़ियों के कल्याण में पैसा लगाते थे, अब मुनाफे की मंशा से निवेश कर रहे हैं। वे लीग खरीदने से लेकर खेलों की आधारभूत संरचना विकसित करने, खेल उपकरणों का निर्माण करने, अकादमी बनाने, प्रसारण, मार्केंटिंग और मीडिया कंपनी खड़ी करने जैसे कामों में उतर आए हैं।