देविंदर शर्मा

खतरे की घंटी बच चुकी है। भारत में भू-क्षरण के बारे में लगातार चेतावनी भरी रपटें आ रही हैं। खाद्य सुरक्षा और देश के स्वास्थ्य के सवाल को जान बूझकर दरकिनार किया जा रहा है। आर्थिक विकास के नाम पर भूमि संसाधनों की जिस तरह इरादतन बर्बादी की जा रही है, वह गंभीर मामला है। इस तरह का विकास जलवायु परिवर्तन के लिए भी खतरा है। अंतर्राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान सलाहकार समूह (सीजीआईएआर), जो अंतरराष्ट्रीय कृषि अनुसंधान केंद्रों को संचालित करता है, ने निर्णायकरूप से कहा है कि कृषि, पशुधन और वनों की कटाई इकतालीस प्रतिशत ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है। एक के बाद एक फसलें उगाने, असंतुलित पोषक तत्त्वों के प्रयोग और कीटनाशकों केविवेकहीन उपयोग की वजह से न केवल मिट्टी, बल्कि भूजल भी बीमार हो चुका है। असल में, जो बात समझ में नहीं आ रही है, वह यह कि अस्वस्थ मिट्टी कभी स्वस्थ पीढ़ी का निर्माण नहीं कर सकती। अगस्त 2016 में, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि देश की भूमि का लगभग तीस फीसद यानी ब्रिटेन के आकार से चौगुना भूमि बंजर होने की कगार पर है।

राजस्थान और हरियाणा के अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों में बंजर होती भूमि की बात तो सर्वविदित है, लेकिन तथ्य यह भी है कि झारखंड, गुजरात, गोवा,दिल्ली और राजस्थान के भी पचास फीसद से अधिक हिस्से बंजर होने की प्रक्रिया में हैं, जो कि कहीं अधिक चिंताजनक है। यहां तक कि जम्मू एवं कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य तथा उत्तर पूर्व में ओड़िशा जैसे राज्य भी बंजरता की चपेट में हैं। ‘बंजर, भू-क्षरण और सूखे’ पर पांचवीं राष्ट्रीय रिपोर्ट के दो साल बाद जारी यह रिपोर्ट चेताती है कि देश की कुल भूमि का पैंतालीस प्रतिशत यानी 3290 लाख हेक्टेयर में से 1460 लाख हेक्टेअर भूमि जल-क्षरण, वायु-क्षरण, क्षारीयता या अम्लता और अन्य जटिल वजहों से रुग्ण हो चुकी है। पांचवी राष्ट्रीय रिपोर्ट में अनुमान था कि सिर्फ पच्चीस फीसद भूमि ही खराब हुई है। लेकिन, इसरो उपग्रह से मिले नवीनतम आंकड़े के मुताबिक तीस फीसद भूमि का क्षरण हो चुका है। दो साल के भीतर अगर भू-क्षरण में पांच फीसद का इजाफा हुआ है तो यह सरकार के लिए बड़ी चेतावनी है। और उसे बंजर हो रही भूमि से निपटने के लिए फौरन आपात योजना बनानी चाहिए। बहरहाल, भू-क्षरण, जिस तरह से खेती के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है, वह इस देश को भोजन की कमी जैसी एक अपूर्व स्थिति में डाल सकता है।

अध्ययन बताते हैं कि हर साल 5.3 अरब टन मिट्टी का कटाव हो रहा है, जिसमें पानी और हवा की वजह से ज्यादा कटाव होता है। इसमें से 29 फीसद मिट्टी स्थायी रूप से समुद्र में चली जाती है। दस फीसद जलाशयों में जमा हो जाती है और उनकी भंडारण क्षमता को कम करती है। और 61 फीसद मिट्टी, एक से दूसरे स्थान पर इधर से उधर होती रहती है। यह मिट्टी न सिर्फ उत्पादन क्षमता कम करती है बल्कि धरती को रेगिस्तान बनाने में भी मदद करती है। हरे वनों की कटाई और शहरीकरण ने भी भू-कटाव और बंजरीकरण में बढ़ोतरी की है। उदाहरण के लिए हरियाणा में तेज हवाओं के कारण टीलों से उड़ कर रेत खेती की भूमि पर फैल रही है।

पहली पंचवर्षीय योजना में ‘भूमि पुनर्वास’ पर जोर था, आशा था कि योजनाकार इस संकट को काबू कर लेंगे। कई मंत्रालयों और विभागों- वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, कृषि मंत्रालय, जल संसाधन मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय वगैरह ने अपनी नीतियों में मिट्टी के क्षरण को रोकने की कार्ययोजना को मंजूरी दी थी। इसका असर कई राष्ट्रीय नीतियों में भी दिखाई पड़ा। राष्ट्रीय वन नीति (1988), पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, (1986), राष्ट्रीय कृषि नीति ( 2000), राष्ट्रीय जल नीति ( 2012), राष्ट्रीय पर्यावरण नीति (2006) राष्ट्रीय किसान नीति (2007), राष्ट्रीय जल नीति (2012) और राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण (2007) आदि में इसका असर देखा जा सकता है।

अब जबकि साफ हो गया है कि पिछले कुछ दशकों से भू-क्षरण और मरुस्थलीकरण तेजी से बढ़ रहा है। फिर भी, राष्ट्रीय नीतियों की अधिकता के बावजूद मिट्टी के क्षरण को एक मुद्दे के रूप में कम ही प्राथमिकता दी जा रही है। वास्तव में, पिछले कुछ वर्षों में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने अपनी नीतियों में मिट्टी की सुरक्षा, संरक्षण और संसाधनों के पुनर्वासन को कम करके आंका है। पर्यावरण मंत्रालय, आदिवासी मामलों के मंत्रालय और खान मंत्रालय ने चुपचाप एक ऐसे प्रावधान को शामिल कर लिया, जिसके तहत वनों को पुनभार्षित किया जाएगा। कुछ खनन कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए वन एवं पर्यावरण की अनुमति भी नहीं ली गई है। क्षेत्र के कई हजार हेक्टेयर खनन भूमि हथियाने का यह एक उदाहरण है। एक ग्यारह सदस्यीय समिति इस बीच भारतीय वन अधिनियम, 1927 में सुधार करने के लिए गठित की गई है। पहली योजना में पर्यावरण के दस्तावेजों में जो कुछ कहा गया था, बाद की सरकारों ने उसके उलट काम किया।

खाद्यान्न का भविष्य
अक्सर यह कहा जाता रहा है कि आप वही होते हैं, जो आप खाते हैं। और आप क्या खाते हैं, यह इस पर निर्भर करता है कि आपकी मिट्टी कितनी स्वस्थ और पौष्टिक है। आखिरकार सभी पौधे अपनी खुराक मिट्टी से ही खींचते हैं। अगर मिट्टी अस्वस्थ होगी तो आपका भोजन भी अस्वस्थ होगा, यह तय है। जैविकरूप से संपन्न और रासायनिकरूप से संपन्न मिट्टी का अंतर पूछना है तो किसी किसान से पूछो। वह आपको बता देगा कि मिट्टी को समृद्ध बनाने के लिए किस तरह प्रकृति के साथ काम करने की जरूरत है। स्वस्थ मिट्टी न केवल जैव विविधता को बढ़ावा देती है, बल्कि अधिक मधुमक्खियां, अधिक केंचुए, अधिक पक्षी कटावों को रोकते हैं, मिट्टी को पोषक तत्त्वों और कार्बन का गोदाम बनाने में मदद करते हैं।

मिट्टी मुख्य रूप से तीन प्रमुख पोषक तत्त्वों-नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश से भरपूर होती है। इसके अलावा, इसमें लोहा, कैल्शियम और जिंक सहित सोलह सूक्ष्म तत्त्व भी पाए जाते हैं। लेकिन गहन खेती के तरीकों यानी गेहूं और चावल की एक सतत फसल पद्धति होने, बीच में आलू और सब्जियों की पैदावार लेने की वजह से मिट्टी में कार्बनिक तत्त्व समाप्त हो चुके हैं, जैसा कि हम पंजाब में देख चुके हैं। पंजाब और दूसरे हरित क्रांति क्षेत्रों में मिट्टी में से कार्बनिक पदार्थ बस 0.1 फीसद रह गया है। इसका मतलब यह है किसानों के सामने सिवाय रासायनिक खादों का इस्तेमाल करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया है। लेकिन, उत्पादकता संतृप्त हो चुकी है। जो उत्पादन पांच पहले था, आज भी वही है। रासायनिक खाद, खासकर- यूरिया के अत्यधिक प्रयोग ने मिट्टी में पोषक तत्त्वों को असंतुलित कर दिया है। पौधों द्वारा नाइट्रोजन का केवल तीस फीसद हिस्सा ही अवशोषित हो पाता है, बाकी हिस्सा धरती के भीतर चला जाता है जो भूजल को प्रदूषित करने में मदद करता है।

समस्या तब विकराल हो जाती है जब देश के कृषिविश्वविद्यालय सघन खेती से खराब हो चुकी मिट्टी के पोषण के लिए रासायनिक खादों के इस्तेमाल की सलाह देते हैं। किसी भी स्तर पर कृषि विश्वविद्यालयों और राज्य कृषि विभाग के अधिकारियों ने किसानों को एकीकृत खेती करने तथा जैविक और हरी खादों के प्रयोग करने की सलाह नहीं दी है। यंत्रीकृत खेती के साथ-साथ रासायनिक उर्वरकों के लगातार प्रयोग से मिट्टी गठीली हो गई है। कुछ स्थानों पर तो सतह से एक एक फुट नीचे तक गठीली परत बन गई है, जिससे पौधे की जड़ें पनप नहीं पा रही हैं। दूसरी ओर, जैविक खेती पद्धति से मिट्टी भुरभुरी होती है, जो मिट्टी को जीवाणुयुक्त बनाती है, जो पर्यावरण के लिए भी उपयोगी है। एक स्वस्थ मिट्टी की पहचान यही है कि उसमें कितने प्रतिशत केंचुए पाए जाते हैं। जितने ज्यादा केंचुए होंगे, उतनी सेहतमंद मिट्टी होगी।

हर किसान के लिए मृदा स्वास्थ्य कार्ड बनाने को लेकर जो नजरिया अपनाया गया है, उसमें कमी है। इसे इस तरह बनाया गया है कि वह रासायनिक खादों के संतुलित खुराक पर जोर देता है। मैं ऐसे मृदा स्वास्थ्य कार्ड का हिमायती हूं जो मिट्टी में कार्बनिक तत्त्वों को बढ़ाने में सहायक हो और यह सुनिश्चित करे कि मिट्टी की संरचना और शक्ति में कैसे सुधार हो सके। एक समय था, जब रासायनिक उर्वरकों, विशेष रूप से नाइट्रोजन को जलवायु परिवर्तन में ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार माना जाता था और सारा जोर इसके इस्तेमाल में कमी लाने पर था। असल में, यह राजनीतिक अर्थव्यवस्था है जो रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों को बढ़ावा देती है। इसे समझना जरूरी है। आम तौर पर यह माना जाता है कि रासायनिक खादों में मिलनेवाली सबसिडी ही भूमि क्षरण के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है। हालांकि, कई बार रासायनिक उर्वरकों-खासकर, फॉस्फोरस और पोटाश पर से सबसिडी घटाने की कोशिश तो हुई, लेकिन किसान समूहों के दबाव और कुछ अन्य राजनीतिक कारणों से इस बारे में कोई बीच का रास्ता निकल नहीं पाया। इस वजह से किसान कभी कार्बनिक खेती की तरफ आकर्षित नहीं हो पाते। मैं हमेशा से कार्बनिक खादों, जैविक-कीटनाशकों पर सबसिडी देने और अलग से मूल्य नीति बनाकर कार्बनिक उत्पादों को प्रोत्साहित करके कार्बनिक खेती को बढ़ावा देने की वकालत करता रहा हूं।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए तमाम अध्ययनों में यह कहा गया है कि सामान्यतौर पर खेती को कारोबार मानना सही तरीका नहीं है। पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने, पर्यावरण की रक्षा करने और मिट्टी का प्रबंधन ठीक करने के लिए खेती की पद्धति में बदलाव लाने का सही वक्त आ चुका है। विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र द्वारा समर्थित (जिसमें विश्व स्तर के चार सौ वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया।)एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में बताया गया है कि गैररासायनिक तरीके से खेती करने के चलन में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। और यही दुरस्त रास्ता है।

अध्ययनों से पता चला है कि उर्वरक सबसिडी में एक फीसद कटौती करने पर तीन फीसद भू-क्षरण में कमी होती है। यह एक चौंकाऊ विश्लेषण है, लेकिन अनुसंधान प्राथमिकताओं सहित राष्ट्रीय कृषि नीतियों में इसे आजमाया जाना चाहिए। जनसंख्या घनत्व और गरीबी का अनुपात, दोनों के गुणांक सांख्यिकीय रूप से महत्त्वपूर्ण हैं, और ये भू-क्षरण के उत्तरदायी कारकों में माने जाते हैं। मगर, 2015 में कृषि अर्थशास्त्री एम.गुरुमूर्ति द्वारा किए गए अध्ययन में पाया गया कि इन दोनों को भू-क्षरण के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। बल्कि, गरीबी का अनुपात और भू-क्षरण के संबंध में दूसरे तमाम अध्ययन यह साबित करते हैं कि गरीब खुद भू-क्षरण के भुक्तभोगी हैं, न कि उसके लिए जिम्मेदार। मिट्टी को कार्बनिक खादों से पोषित करने और जल उपयोगिता क्षमता बढ़ाने के लिए बेहतर जल निकासी प्रणाली के जरिए भू-क्षरण रोकना उतना ही जरूरी है, जितनी उसकी उर्वरकता को बरकरार रखना। लेकिन, इससे भी ज्यादा अहम है, नीति निर्माताओं को यह समझना होगा कि मिट्टी के स्वास्थ्य का पुनर्निर्माण भविष्य में बढ़ती जनसंख्या की खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिए अहम कड़ी है। जो बात कहनी जरूरी है, वह यह कि स्वस्थ मिट्टी ही स्वस्थ आबादी की परवरिश कर सकती है।

इस मामले में हम चीन का उदाहरण ले सकते हैं। एक समाचार एजेंसी के मुताबिक चीन ने एक महत्त्वपूर्ण पहल करते हुए तेजी से हो रहे शहरीकरण में कमी करने का फैसला किया है और खेती योग्य जमीनों को बचाने के प्रति प्रतिबद्धता जताई है। चीन 2020 में अपने पास 1240 लाख हेक्टेअर कृषि योग्य भूमि तैयार करना चाहता है, जिसमें 530 लाख हेक्टेअर भूमि उच्च गुणवत्ता वाली होगी। भारत में, पैंतालीस प्रतिशत कृषि योग्य भूमि भू-क्षरण से जूझ रही है। देश को इस खतरे से निपटने के लिए उठ खड़ा होना जरूरी हो गया है। ‘खेतों को भी उसी तरह बचाना होगा, जैसे हमने अपने पांडा को बचाया है।’ चीनी सरकार के एक प्रवक्ता ने कहा है। इसी तर्ज पर, भारत को भी अपनी खेती बचाने के लिए एक ऐसा राष्ट्र-व्यापी अभियान चलाना होगा, जैसा वह बाघों के लिए चला रहा है।