प्रेम पर पहरे सदियों से बिठाए जाते रहे हैं। समाज प्रेम को अनैतिक मानता है। फिर भी प्रेम करने वाले तमाम अवरोधों, तमाम पहरों को चुनौती देते रहे हैं। मगर प्रेम जितना मोहक, जितना जादुई और आनंददायक है, उतना ही जटिल भी। यही वजह है कि कभी एक-दूसरे पर जान निछावर करने का जज्बा रखने वाले अक्सर प्रेम से ऊब कर अलग होने का फैसला करते हैं। इससे समाज में टूट पैदा होती है, बिखराव आता है, विकृतियां जन्म लेती हैं। इसलिए धर्म और समाज के सिपाहियों को प्रेम के खिलाफ मोर्चाबंदी का मौका मिल जाता है। मगर प्रेम का आकर्षण कम नहीं होता, उसकी चमक फीकी नहीं पड़ती। तमाम बंदिशों के बावजूद प्रेम कैसे अंखुए फोड़ता और हरियाली रचता है, बता रही हैं निवेदिता। 

प्रे म हमेशा से वर्जित फल रहा है। उसे सदा बहिष्कार मिला है। प्रेम करना बहिष्कृत होना है। फिर भी प्रेम हमें आकर्षित करता है, और प्रेम विवाह भी। यह इसलिए कि हमारे समाज में प्रेम एक विद्रोह है। जब आप विद्रोह करते हैं तो उसकी कीमत भी चुकाते हैं। प्रेम परंपराओं के विरुद्ध खड़ा रहता है। उसकी आंच से सामाजिक ताना-बाना तहस-नहस होता है। जाति, धर्म, संस्कृति की दीवारें दरकती हंै। मोमिन कहते हैं- ‘क्या-क्या न किया इश्क में क्या-क्या न करेंगे।’ इश्क को लेकर कौमों के बीच खूनी जंग, लूटपाट, आगजनी, बर्बादी के जाने कितने मंजर देखे हैं लोगों ने, फिर भी न तो प्रेम करना बंद हुआ, न प्रेम विवाह। ये आग का दरिया है डूब के जाना है। शायद यही वजह है कि तमाम पहरों, जुल्मों के बीच हमारे समाज को प्रेम ही जिंदा रखता है, जिसकी अनेक धाराएं निरंतर बहती रहती हैं। प्रेम का जंगल इतना सधन है कि उससे बाहर निकलना मुमकिन नहीं।

प्रेम का जादू एक ऐसा विविधता भरा कथानक है, जिसे कितने ही स्वरों में गाया जा सकता है और हर आदमी का प्रेम दूसरे आदमी के प्रेम से उतना ही अलग होगा, जितने संगीत के दो स्वर। प्रेम का यह स्वर हर युग में हम सुनते रहे हैं। सोहनी-महिवाल, हीर-रांझा, शीरीं-फरहाद, लैला-मजनू, सस्सी-पुन्नु जैसे प्रेमी युगल सदियों से हमारे देश के जनमानस में रचे-बसे हैं, जिनका प्रेम सांस्कृतिक प्रतीकों में बदल गया, जिसे न तो सामाजिक निषेध और न दुनियावी रस्मो-रिवाज छू पाते हैं। इतिहास में प्रेमी युगलों की अनेक कहानियां हमें आंदोलित करती रही हैं। रोमांटिक युग की सबसे चर्चित प्रेम कथा होमर और शेक्सपियर के समान समझे जाने वाले महाकवि गेटे ने लिखी थी। अठारवीं शताब्दी की पृष्ठभूमि में लिखा गया यह उपन्यास जितना चर्चित हुआ उतना शायद किसी और प्रेम कहानी को दुनिया के साहित्य में जगह नहीं मिली। कहानी के अंत में नायक अपनी प्रेमिका के पति के पिस्तौल से ही आत्महत्या कर लेता है। कहा जाता है कि इस प्रेम कहानी ने सिर्फ जर्मनी में नहीं, पूरे यूरोप में इतना प्रभाव डाला कि अनेक प्रेमियों ने उस दौर में आत्महत्या की।

दरअसल, प्रेम जीवन में हो या साहित्य में, वह अनेक मनोवृत्तियों, प्रवृत्तियों, मनोदशाओं का एक अत्यंत जटिल भावबोध है। अगर यह भाव इतना जटिल न होता तो प्रेम में मर मिटने वाले प्रेमी युगल अलगाव के लिए क्यों जाते? यकीनन किसी भी प्रेम और विवाह की सफलता-विफलता उन दो लोगों पर निर्भर करती है कि वे अपने संबंधों को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। प्रेम अगर रचनात्मक बनाता है, तो वह उदासी और अंधेरे की तरफ भी धकेलता है। आज के जीवन में प्रेम के साथ बाजार भी है, प्रेम के साथ जीवन को आगे ले जाने की ललक है, प्रेम समानता और बराबरी की मांग करता है, तो जाहिर है प्रेम का स्वरूप बदलेगा ही। प्रेम में दिल मिलेंगे और टूटेंगे भी। प्रेम में विवाह करेंगे और विवाह में विफल भी रहेंगे।

पिछले कुछ सालों के आंकड़े कहते हैं कि हमारे समाज में प्रेम विवाह का चलन बढ़ा है। प्रेम पर जितना पहरा बढ़ाया गया, प्रेम को पाने की चाह भी उसी तेजी से बढ़ी। छोटे शहरों, गांवों, कस्बों में प्रेम करना और प्रेम विवाह करना आज भी कठिन है, पर महानगरीय जीवन में ये घटनाएं होंगी ही, चाहे परिवार या सत्ता इसके खिलाफ खड़ी हो। लव जिहाद, एंटी रोमियो स्कॉड के बावजूद प्रेम होते रहे हैं, होते रहेंगे। चिंता की बात यह नहीं है कि प्रेम पर पहरा है। प्रेमी उससे निपटते रहे हैं। चिंता की बात है प्रेम का हमारे समाज में अपराध घोषित किया जाना। प्रेम पर पहरा बिठाना। सीधे-सादे, सपाट से लगने वाले कबीर के इस ढाई आखर प्रेम से आखिर दुनिया क्यों डरती है। दुनिया डरती है कि प्रेम उनकी बनाई सत्ता को नहीं मानता। धर्म को डर है कि प्रेम उनकी सत्ता को चुनौती देता है। परिवार डरता है कि प्रेम में लड़के-लड़कियां भाग न जाएं। उनका भागना उनकी सत्ता का ढहना है।

प्रेम में लोग भागेंगे, उसकी गिरफ्त में आएंगे। प्रेम घटा की तरह उमड़ कर आता है, कि आप बाहर भीतर भींग जाएं। कितना अच्छा होता कि किसी प्रेमी को भागने की जरूरत नहीं होती। प्रेम दरअसल, तमाम सत्ता को चुनौती देता है। इसलिए प्रेम उन लोगों के लिए खतरा है, जो अपनी-अपनी सत्ता बनाए रखना चाहते हैं। जब आप प्रेम करते हैं तो वे तमाम दीवारें दरकती हैं, जिन्हें धर्म ने, समाज के ठेकेदारों ने अपने फायदे के लिए बनाया है। सबसे पहले घर की जंजीरें टूटती हैं। प्रेम ही इन जंजीरों को तोड़ने की ताकत रखता है।
कई बार लगता है कि हमारे देश के संविधान ने दो बालिग लोगों को- चाहे वे जिस धर्म, जाति से हों- अपना जीवन साथी चुनने की आजादी दी है, तो फिर हमारा समाज क्यों उसके विरोध में खड़ा है।

जाहिर है, धर्म और जाति को बनाए रखने और उसकी सत्ता कायम रखने के लिए यह गठजोड़ जरूरी है। इसलिए खाप पंचायतों से लेकर सम्मान के नाम पर हत्या और हिंसा का खेल हमारे ही देश में चलता है। ऐसी अनेक कहानियां हैं, जहां प्रेम करने या प्रेम विवाह के कारण लोगों की हत्या कर दी गई। हाल ही में गुमला में एक हिंदू स्त्री से प्रेम करने के अपराध में एक मुसलमान को पीट-पीट कर मार डाला गया। जिस समाज में प्रेम अपराध हो, वहां इस तरह की हत्या को सामाजिक मान्यता मिल जाती है। अगर आप समाज के हिंसक कारनामे से बच गए तो सत्ता भी आपको प्रेम करने के जुर्म में सजा दे सकती है। पूरे उत्तर प्रदेश में अब कॉलेज, स्कूलों में सादे वेश में पुलिस पहरा दे रही है। एंटी रोमियो स्कॉड शहर, गलियों में घूम रहे हैं, जो हमारी नई पीढ़ी के प्रेम पर पहरा बिठा रही है। दुनिया जानती है कि हर दौर में प्रेम पर पहरा बिठाया गया, पर प्रेम करना कभी बंद नहीं हुआ।
प्रेम एक जटिल भाव है। उसके कई रंग हैं। प्रेम को लेकर समाज के मन में हमेशा संशय रहा है। प्रेम को न तो सामाजिक निषेध और न ही दुनियावी रस्मो-रिवाज छू पाएंगे। तो फिर क्या वजह है कि जो प्रेम आदमी को बचा लेता है वही प्रेम जानलेवा हो जाता है। उसी प्रेम से निकलने की गहरी छटपटाहट दिखती है। अगर आंकड़ों में न भी जाएं तो आज जिस अनुपात में प्रेम विवाह हो रहा है, उसी अनुपात में प्रेम विवाह टूट रहा है। प्रेम मनुष्य की आदि और अंतिम वृत्ति है। इसे हम महान उपन्यासकार टॉलस्टाय के उपन्यास अन्ना केरेनिना से समझ सकते हैं। इसमें मानवीय मन का गहन मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया गया। अन्ना केरेनिना का प्रेम ऊब की उत्पत्ति नहीं है, न ही दांपत्य जीवन की एकरसता से मुक्ति पाने की कोशिश है। यह प्रेम से मोहभंग की कथा है। यह परंपरागत वैवाहिक व्यवस्था और आरोपित प्रेम के प्रति विद्रोह की पराकाष्ठा है। वर्षों से अन्ना के भीतर जो सुलग रहा था वह लावा बन कर फूट पड़ा।

दुनिया की तमाम प्रेम कहानियों का सच यह है कि प्रेम ही जीवन को आगे ले जाएगा। प्रेम करने का मतलब है एक-दूसरे के लिए सिर झुकाना। एक-दूसरे की खुशी में शामिल होना। महान नाटककार कामू कहते हैं- ‘प्यार तो धीरे-धीरे सिर झुका देता है। जिनकी गर्दन अकड़ी हुई हो, सिर उठा हुआ हो, आंखें जमी हुई हों उनके अभिमानी दिल में प्यार क्या करेगा?’ महान नर्तकी इजाडोरा कहती हंै- ‘कितना अजीब और परेशानी भरा है एक मनुष्य के हाड़-मांस के माध्यम से उसकी आत्मा तक पहुंचना। हांड, मांस के आवरण के जरिए आंनद, उत्तेजना और मोह को तलाशना। सबसे बढ़ कर इस आवरण के जरिए उस चीज को तलाशना, जिसे लोग खुशी कहते हैं- और उस चीज को, जिसे लोग प्रेम कहते हैं।’
दरअसल, प्रेम ज्ञान है, लय है, प्रकृति है। प्रेम का मतलब है एक-दूसरे को जानना। आदम और हव्वा के इसी जानने की प्रक्रिया को बाइबल ने अपराध कहा। उन्होंने जिस क्षण ज्ञानवृक्ष का फल खाया, उसी दिन वे एक-दूसरे को जान गए। उसके लिए उन्हें हमेशा तकलीफ उठानी पड़ी, लेकिन उन्होंने जानने का रास्ता चुना। और अपने अस्तित्व के, अपने प्यार के अर्थ जान कर ही वे सार्थक हुए। धर्मग्रंथों में आदम और हव्वा अपराधी माने गए हैं, क्योंकि उन्होंने प्रेम किया, एक-दूसरे को जाना। शायद यह मनुष्य का पहला विद्रोह रहा होगा। धर्मग्रंथ डरते हैं, क्योंकि वे मानते हैं कि प्रकृति का निर्माण देवताओं ने किया है। अगर उसका अतिक्रमण किया तो देवता नाराज होंगे। प्यार अज्ञान के अंधेरे से बचाता है, प्यार पशु से मनुष्य बनने की प्रक्रिया है।

ध र्मवीर भारती अपने प्रेमपत्र में कहते हैं- ‘इस शरीर में जितने आस्वादन हैं, जितना रस है, जितना मधुराई है, जितनी आग है, जितना नशा है, जितना आलोक है, जितने गूढ़ मर्म हैं वह सब कोई आज का है? कितने लाखों वर्षों की समस्त संस्कृति की चरमतम उपलब्धियों के रस से तुम्हारा जिस्म बना है न- इसका अर्थ तो मैं जानता हूं प्यार मेरे। यदि यह राग न होता, तो क्या मनुष्यत्व होता? क्या आज भी हम द्विपद पशुओं की भांति आदिम गुफाओं में कच्चे मांस का भक्षण करने वाले राक्षस न बने रहते। प्रेम है इसलिए यह सृष्टि है। प्रेम है तभी हम कहते हैं- ‘कागा सब तन खाइयो/ चुनि-चुनि खइयो मांस/ दुइ अंखियां मत खइयो/ पिया मिलन की आस।’
प्रेम की इतनी सुंदर अभिव्यक्ति को क्या कोई दूसरा रूप दिया जा सकता है। अगर हम अपने समय को थोड़ा पीछे ले जाएं तो रामायण में सीता और राम के प्रेम को देखें। जो प्रेम जनमानस में रचा-बसा है, हमारी संस्कृति का हिस्सा है। प्रेम का यह रूप साहित्य को भी लुभाता है। प्रेम का इतना सजीव वर्णन कुर्रतुल ऐन हैदर ने अपनी एक कहानी में किया है कि हम पढ़ते हुए चकित होते हैं- ‘दरखतों के कुंज में सीता ने राम पर नजर डाली, उनकी नजरें रात पर ऐसे जमी जैसे चकोर खिजां के चांद को देखता है- उन्होंने राम को आंखों के जरिए दिल में दाखिल करके पलकों के किवाड़ बंद कर दिए।’

दरअसल, हमारा साहित्य, हमारी कला, हमारी संस्कृति का मूल स्वर प्रेम ही है। यही हमारी साझी सांस्कृतिक विरासत का सबसे बड़ा सबूत है। फिर भी हमारा समाज प्रेम के विरुद्ध खड़ा है। हर रोज प्रेम में मारी जा रही लड़कियों के खून से प्रेम लहूलुहान है। प्रेम विवाह ही वह रास्ता है, जो समाज को बचा सकता है। जाति, धर्म, संप्रदाय के दलदल से। प्रेम ही हमें मनुष्य बने रहने में मदद कर सकता है। अगर हम घृणा के विरुद्ध हैं तो प्रेम के पक्ष में खड़ा होना होगा। प्रेम आपको नितांत मौलिक नजरिए से देखने की दृष्टि देता है।
जो लोग भगवान या खुदा पर यकीन करते हैं वहां भी हमारी संस्कृति मनुष्य से प्रेम करके ही ख्ुादा तक पहुंचने की बात करती है, जिस राह में मुल्ला और पंड़ितों की कोई भूमिका नहीं है। जब पूरी कायनात ही मुहब्बत में गिरफ्तार हो तोे धर्म और जाति की क्या बिसात।
प्रेम है तो नदियां समंदर में जा मिलेंगी, जल-थल एक होंगे। सुबह के आफताब ने सुर्खी सजाया होगा। भौंरे गुनगुना रहे होंगे, चिड़ियां गा रही होंगी, हिरण सुकून में खो गए होंगे। १