कहानी- दिनेश चमोला ‘शैलेश’

पाजी, दादाजी ऐसे दुबके-पिचके से क्यों रहते हैं? कभी तो आप कहते थे कि उनकी एक आवाज से पूरा घर थर्रा उठता था। लेकिन उन्हीं दादाजी की ऐसी स्थिति …आखिर, उनको अब क्या हो गया?’ छोटा टोनी बड़े चिंतातुर भावों से अपने पापा से यह पूछ बैठता। ‘नहीं…नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है…उम्र के साथ-साथ यह होता ही है। देख नहीं रहे, कितने बूढ़े हो गए हैं… शरीर से लेकर दिमाग तक कुछ भी तो काम नहीं करता उनका… दिन-भर जाने क्या बड़-बड़ करते रहते हैं।’ पापा उदासीनता से उसको निरुत्तर करने का प्रयास करते व अपने काम में व्यस्त हो जाते।

‘कहीं ऐसा तो नहीं कि वे आप लोगों के ऐसे व्यवहार के कारण ही दादाजी ऐसे हो गए हों? दादीजी के गुजरने के बाद आखिर हमारे अलावा इस घर में उनका है भी कौन? न आप उनसे ठीक ढंग से बातें करते हो; न उनके पास बैठते हो; न उनको टीवी देखने देते हो…और न हमें ही उनसे बतियाने देते हो तो ऐसी कैद वाली जिंदगी वे भला जिएंगे भी कैसे?’
‘टोनी! तुझे कितनी बार कहा है कि तू अपनी हद में रहा कर… बहुत दादा न बनाकर। उनको घर में रखा है, क्या यही कम है? मेरी जगह कोई दूसरी होती तो कब की घर से निकाल बाहर फेंक देती। किसके पास इतना समय है अपनी सुंदर खोपड़ी खराब करने का?’ किचन से गुर्राते हुए मम्मी ने कहा।
‘लेकिन मम्मीजी, जो आप आज इतना चिल्ला रही हो …इस सबके कारण भी तो दादाजी ही तो हैं। यदि उन्होंने पापाजी को न पाल-पोसकर बड़ा किया होता… न यह सुंदर घर बनाया होता तो आज आप इतनी शेखियां कहां बघारतीं? वैसे ही उन्होंने भी पापाजी को पढ़ा-लिखाकर बड़ा किया होगा… जैसे आप हमें कर रहे हैं। सोचो, यदि हम अंत में आपके साथ ऐसा बर्ताव करें तो क्या आपको अच्छा लगेगा?’

‘ए दादाजी के चमचे, चुप कर के बैठ अपनी जगह।’
मम्मी की गुर्राहट वाली इस बात को सुनकर केवल टोनी ही ही नहीं, बल्कि दादाजी भी मानों बगलें झांकने लगे थे। वे ऐसे कांपने लगे थे गोया कि दाना चुगती गौरैया के सामने अचानक कोई मोटा बिलौटा आकार खड़ा हो गया हो। भरे-पूरे परिवार के रहने वाले थे दादाजी… जीवनभर उपदेश करने वाले दादाजी हर वक्त कई-कई छात्र-छात्राओं व लोगों से घिरे रहते थे। यह अकेलापन किस पाप की सजा थी, यह दादाजी की चिंता के साथ-साथ टोनी की भी चिंता का गंभीर विषय था। टोनी ने कई-कई बार दादाजी को अकेले में रोटी खाते-खाते मोटे-मोटे आंसू बहाते देखा था। वे जब भी कोई बात कहने का साहस करने लगते तो मम्मी इतनी जोर से डपटती कि दादाजी की आवाज ही न निकलती। अब दादाजी की असली आवाज लगभग गुम सी हो गई थी व झूटी-मूटी पतली आवाज ही उनकी अपनी आवाज हो गई है जो मुश्किल से ही किसी की समझ में आ पाती है।
दादाजी को ऐसे क्यों रखा जाता है… क्यों उनसे बोलने नहीं दिया जाता… क्यों मम्मीजी एक-दो रोटी देने के बाद दादाजी को दोबारा रोटी के लिए नहीं पूछतीं? …जबकि दादाजी फिर से रोटी पाने के लिए लगातार टकटकी लगाए रहते हैं व प्रतीक्षा में अपनी खुरदरी अंगुलियां चाटते ही रहते हैं। ऐसे में जब दादाजी ठीक से खड़े भी नहीं हो पाते… क्यों उन्हें अपने कपड़े खुद धोने के लिए कहा जाता है?

मम्मीजी ‘ढप्प…’ की आवाज से जोर से वहां का दरवाजा बंद कर आती हैं। इससे भी टोनी को डर ही लगा रहता है कि कहीं भूले-भटके दादाजी की उभरी नसों वाली बेजान अंगुलियां न उससे दब जाए। जब भी बाहर से ड्राइंग रूम में कोई मेहमान आता है तो दादाजी अति उत्साही होकर उसके स्वागत के लिए कांपते हाथों से दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो जाते हैं। वे उससे बहुत देर तक बतियाना चाहते हैं… अपना सुख-दुख लगा उसका हाल-चाल जानना चाहते हैं। दादाजी पिछवाड़े के कमरे में रहते हैं, जो लगभग चारों ओर से बंद है। ऐसा कभी नहीं हुआ जब दादाजी ने अपने अनुसार खुलकर जीवन जिया हो। खाने-नहाने से लेकर कपड़े पहनने तथा घूमने-टहलने तक।

बस, दादाजी को मम्मी की ही लाठी से हंकना होता है, वे चाहकर भी कभी-कभी कुछ और नहीं कर सकते। टोनी व उसकी छोटी बहन उमा दादाजी के साथ बोलने-बैठने से लेकर कथा-कहानी तक… सब कुछ में हाथ बंटाना चाहते हैं। लेकिन इस घर में तो केवल मम्मीजी का शासन चलता है, यह सभी को मालूम है। पापाजी यदि दादाजी के बारे में कुछ कहते भी हैं तो मम्मीजी भला-बुरा कहकर सारा आसमान सर पर उठा लेती हैं।जब भी मम्मीजी बाजार या कहीं बाहर गई होती हैं तो टोनी और उमा खूब दादाजी के पास बैठते हैं, कथा-कहानी सुनते हैं, हंसते और हंसाते हैं, तब भूखे पेट भी दादाजी के चेहरे पर अलग चमक रहती है।

टोनी को मम्मीजी की ही नहीं, बल्कि अपने पापाजी की भी बातें बुरी लगती हैं। एक बार दादाजी ने दिनभर में पेट न भरने की बात पापाजी से कही तो पापाजी ने डपटते हुए कहा… ‘अब तुम्हारे लिए ही रोटी बनाने के लिए थोड़े ही है मेरा परिवार। जो मिलता है उसी से काम चलाया करो… और अधिक खाने का मन हो तो है दूसरों के यहां चले जाओ अभी।’ और जोर का धक्का भी दिया था। दादाजी छोटे बच्चे की तरह औंधे मुंह फर्श पर गिर पड़े थे।

दूसरे दिन सुबह-सुबह दादाजी पूरे उत्साह के साथ नहाए। संध्या-पूजा की, कपड़े पहने, तिलक लगाया…अपना पुराना थैला पकड़ा। मम्मीजी गंगा स्नान करने गई थीं। कांपते हाथों से अपनी फटी जेब से पचास-पचास रुपए के दो पुराने नोट निकाले। उनके सिर पर हाथ रखते हुए कहा-‘मैं जा रहा हूं बेटा! खुश रहना। बड़े होकर वैसा मत करना जैसे तुम्हारे मम्मी-पापा ने मेरे साथ किया है…।’ दादाजी बच्चों से सुबकने लगे थे। बाहर अभी भी अंधेरा था। टोनी और उमा सपना जान फिर से चादर ओढ़ सो गए थे।
फिर दादाजी दोबारा लौटकर कभी नहीं आए। अब पूजाघर के ऊपर दादाजी का हंसता हुआ माला से घिरा चित्र टंगा है, जहां मम्मी-पापा दोनों रोज देर तक माथा टेकते हैं। जीवन के सारे गम अपने में समाए अब हमेशा हंसते रहते हैं बेचारे दादाजी!!