आनंद भारती
शैलेंद्र ने जब ‘मारे गए गुलफाम उर्फ तीसरी कसम’ कहानी को पहली बार पढ़ा, तभी से उनके दिलो-दिमाग पर फिल्म बनाने की धुन सवार हो गई। उन्होंने रेणु जी से बात की लेकिन उनकी एक ही शर्त थी कि कहानी जैसी है वैसी ही रहनी चाहिए क्योंकि यह बड़े जतन से लिखी गई है। दोनों प्रमुख पात्रों के रूप में महमूद और मीना कुमारी के नाम लगभग तय हो गए थे। लेकिन बाद में राज कपूर पहले के अपने निर्णय को बदलते हुए खुद काम करने के लिए राजी हो गए। उनके साथ वहीदा रहमान को लिया गया।
अब भी एक सवाल है कि इस फिल्म का स्टार कौन है? राज कपूर, वहीदा, रेणु, कहानी, मेला, नौटंकी या बैलगाड़ी? इस पर आज तक एक राय कायम नहीं हो पाई है। यहां तक कि कजरी नदी और महुआ घटवारिन भी पात्र बनकर अचानक बिजली की तरह कहानी में कौंध जाती है और दर्शक की आंखें चौंधिया जाती हैं। इसकी शूटिंग पहले इसके कथा-स्थलों पर (पूर्णिया जिले) ही होनी थी मगर डर-भय के कारण आउटडोर बंबई के पास ईगतपुरी में शिफ्ट कर दिया गया। इंडोर शूटिंग कमाल स्टुडियो में सेट लगाकर की गई। इसे गुलाबबाग मेले का हू-ब-हू रूप दिया गया। हालांकि मेला गढ़बनैली का है, जो गुलाबबाग के ही पास है। रेणु जी खुद शूटिंग में मौजूद रहे।
इस फिल्म की खास बात यह थी कि एक छोटी सी कहानी को बड़े फ्रेम में डाला गया। इसमें दो ही प्रमुख पात्र हैं। एक भोला-भाला गाड़ीवान हीरामन (राज कपूर) और दूसरे नौटंकी की बाई हीराबाई (वहीदा रहमान)। दोनों की मुलाकात अचानक होती है। एक लंबे सफर के दौरान वे एक-दूसरे के करीब हो जाते हैं। दोनों का आकर्षण सहज मानवीय भाव के साथ चलता है, जिसमें कहीं भी कलुषता नहीं है। उनमें जो बेचैनी है, वह प्यार की हद से भी बड़ी है। एक ऐसा समय भी आता है जब हीराबाई का जमीर उसे अंदर से तोड़ने लगता है। उसे लगता है कि स्टेज पर दो घंटे नाटक करना आसान है लेकिन वास्तविक ज़िंदगी में सती-सावित्री का नाटक करना बहुत मुश्किल है।
अंतिम दृश्य की कल्पना करें, जब हीराबाई गढ़बनैली मेले की नौटंकी को छोड़कर किसी दूसरी कंपनी में जा रही है। वह रेलवे स्टेशन पर हीरामन का इंतजार कर रही है। ट्रेन आ चुकी है और जाने का सिग्नल हो चुका है। वहां जो हीराबाई की हीरामन के लिए बेताबी है, दर्शकों के दिलों की धड़कन को आकुल-व्याकुल कर देती है।
हीरामन आता है। हीराबाई उसे अपने पास सुरक्षित रखे हीरामन के पैसे लौटाती है और कहती है, गुलाबगंज (गुलाबबाग) के मेले में उससे मिलने आना। ट्रेन आगे बढ़ जाती है। वह रो रही है। हीरामन अपनी बैलगाड़ी पर लौट आता है और तीसरी कसम खाता है- ‘कंपनी की बाई को अब कभी गाड़ी में नहीं बिठाऊंगा।’ उस समय दर्शकों की सांसें थम जाती हैं और आंखें वीरान हो जाती हैं। हीरामन गाड़ी हांकता है। पीछे से गीत के स्वर उभरते हैं-
प्रीत बनाके तूने जीना सिखाया
हंसना सिखाया रोना सिखाया…।
गाड़ी दूर जाती है।
फिल्म समाप्त होती है। ०
एक ‘आवारा’ शर्त को ठुकराने का साहस
आज भी एक सवाल खड़ा है कि अगर राज कपूर की इच्छानुसार फिल्म ‘तीसरी कसम’ व्यावसायिक दरकारों के साथ बनाई गई होती तो क्या यह ‘आवारा’ से भी बड़ी नहीं हो जाती? कला भी होती, कहानी भी सुरक्षित रहती और दायरा भी विशाल हो जाता। क्या रेणु फिल्म के व्याकरण, राज कपूर के ‘विजन’ और दर्शकों की पसंद को समझ नहीं पाए?
अलबत्ता सवाल का दूसरा छोर यह भी है कि छपे शब्दों में उतरी रचनात्मकता के साथ जुड़े लेखक की अना क्या इतनी कमजोर होनी चाहिए कि किसी व्यावसायिक तकाजे के आगे घुटने टेक दे। रेणु का अपनी कहानी के साथ डटे रहना हिंदी की रचनात्मक अस्मिता की मिसाल है।

