शास्त्री कोसलेंद्रदास

संस्कृत ज्ञान राशि की सबसे प्राचीनतम स्रोत भाषा है। विश्व की कोई भी भाषा प्राचीनता में संस्कृत की बराबरी शायद ही कर पाए। भाषाशास्त्री संस्कृत को बड़े आदर की दृष्टि से देखते हैं। पिछली दो शताब्दियों में जर्मनी के अनेक विद्वानों ने केवल संस्कृत में लिखे शास्त्रों के अध्ययन में ही सारी उम्र निकाल दी। ग्रिफिथ और मैक्समूलर इसके बड़े उदाहरण हैं। संस्कृत हमारे पुरखों की संपदा है, फिर भी पिछले चार-पांच दशक से उसकी चर्चा हमारे देश के बजाय पश्चिमी देशों में अधिक हो रही है। एक अध्ययन के अनुसार भारत से बाहर दो सौ उनचास विश्वविद्यालयों में संस्कृत की पढ़ाई और उस पर शोध का काम भारत से अधिक हुआ है। संस्कृत का अस्तित्व में रहना हिंदी समेत सारी भारतीय भाषाओं के बचे रहने के लिए जरूरी है। वह स्रोत भाषा है। संविधान के अनुच्छेद 251 में लिखा है कि ‘राष्ट्रभाषा हिंदी की शब्दावली मुख्य रूप से संस्कृत से ली जाएगी।’ दरअसल, संस्कृत हिमालयी भाषा है। जब संस्कृत का हिमालय द्रवित होता है तब भारतीय भाषाई नदियों में पानी आता है। इसकी वैज्ञानिकता असंदिग्ध है। यह ध्वनिशास्त्र के सिद्धांतों पर खरी उतरती है। एए मैकडोनाल्ड ने ‘हिस्ट्री ऑफ संस्कृत’ में लिखा है, ‘संस्कृत भाषा की वर्णमाला संपूर्ण वर्णमाला है। उसका वर्गीकरण ध्वनि के सिद्धांत पर किया गया है। यह ध्वनि वर्णमाला, सहस्रों वर्षों से इसी भांति चली आ रही है। इससे अधिक वैज्ञानिक वर्णमाला कोई नहीं है। दूसरी ओर हम यूरोपीय, महान संस्कृत वैयाकरण पाणिनी के ढाई हजार वर्षों बाद, यह दावा करते हैं कि हम एक वैज्ञानिक युग में रह रहे हैं। पर वास्तव में हम एक ऐसी वर्णमाला का प्रयोग कर रहे हैं, जो हमारी भाषा को ध्वनियों में प्रवाहित करने में असमर्थ है। हमने स्वरों और व्यंजनों को इस तरह मिलाकर रखा है, जो अत्यंत अवैज्ञानिक है।’

अंग्रेजों ने समझा महत्त्व
संस्कृत के मौजूदा हालात पर बात करने से पहले देश के प्रथम संस्कृत शिक्षण संस्थान का इतिहास जानना जरूरी है। यह हमें प्रेरणा देता है कि संस्कृत बची रही तो हम और हमारी संस्कृति बची रहेगी। देश के पहले संस्कृत शिक्षण संस्थान की स्थापना का इतिहास सम्मोहित तो करता है, आश्चर्य में भी डालता है कि देश को पारतंत्र्य के संकट में डालने वाले अंग्रेजों ने भी संस्कृत के ऐतिहासिक महत्त्व को समझते हुए उसे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। बनारस के रेजिडेंट जोनाथन डंकन ने एक संस्कृत अध्ययन केंद्र खोलने की अंग्रेजी हुकूमत से सिफारिश की। इसके तहत 1791 ईस्वी में बनारस में एक संस्कृत पाठशाला स्थापित की। डंकन ने तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड कार्नवालिस को संस्कृत पाठशाला खोलने के लिए दो जरूरतें बताई। पहली, संस्कृत भाषा का पठन-पाठन जारी रखना, जिससे पुरातन वैदिक शिक्षण व्यवस्था का संरक्षण किया जा सके। संस्कृत पाठशाला से निकले पंडित धर्मशास्त्र संबंधी मसलों को हल करने के लिए न्यायालय में न्यायाधीशों की मदद कर सकें, यह दूसरी आवश्यकता थी। कार्नवालिस ने संस्कृत पाठशाला के लिए प्रतिवर्ष बीस हजार रुपए का बजट स्वीकृत किया। संस्कृत पाठशाला स्थापना से आठ साल तो ठीक चली, लेकिन अचानक एक खतरनाक मोड़ तब आया जब वेदों के अध्ययन के लिए खोली गई इस पाठशाला में ही वेदों की पढ़ाई पर मनाही हो गई। वाकया कुछ यों हुआ कि 1798 में पाठशाला के प्रधानाध्यापक पंडित काशीनाथ तर्कालंकार और उनके कुछ खास शिक्षकों ने शिक्षकों और छात्रवृत्ति पाने वाले विद्यार्थियों के गलत नाम लिख कर रुपए उठा लिए। इस प्रकरण की जांच हुई, जिसमें प्राचार्य और बाकी शिक्षकों को दोषी पाया गया। सजा के तौर पर इन्हें पाठशाला से निकाल दिया गया। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि वेद-अध्यापन बंद हो गया। सात साल तक पाठशाला ठप रही। वक्त बदला तो 1805 में दुबारा कक्षाएं लगना शुरू हुई।

ऐतिहासिक कार्य
1820 में सरकार ने संस्कृत कॉलेज के काम का जायजा लेने के लिए एक समिति बनाई। समिति के सदस्यों, एच.एच. विल्सन और कप्तान फ्यल ने अपनी रिपोर्ट में कॉलेज प्रशासन की जम कर निंदा की। परिणामत: कॉलेज का प्रबंधन और संचालन पंडितों के हाथ से निकल कर कप्तान फ्यल के हाथ आ गया। 1830 में यहां संस्कृत के साथ अंग्रेजी की पढ़ाई भी शुरू हुई। पाठशाला से संस्कृत कॉलेज में बदलने के बाद जॉन म्योर पहले प्राचार्य हुए। उनके बाद जेम्स आर 1845 में जेम्स वैलेंटाइन कॉलेज के प्रमुख हो गए। 1857 से स्नातकोत्तर कक्षाएं शुरू हुर्इं। 1880 से लिखित परीक्षा प्रणाली प्रारंभ हुई। 1894 में कॉलेज के प्रसिद्ध ‘सरस्वती भवन ग्रंथालय’ का निर्माण हुआ। प्रो. राल्फ ग्रिफिथ जब संस्कृत कॉलेज के प्रिंसीपल हुए तब कॉलेज बुलंदियों को छूने लगा। ग्रिफिथ संस्कृत के उच्च कोटि के विद्वान थे। वे वैदिक संस्कृत विभाग में प्रोफेसर थे। ग्रिफिथ ने तीस वर्षों के कठिन परिश्रम से ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के साथ वाल्मीकि रामायण और महाकवि कालिदास विरचित कुमारसंभव का सबसे पहले अंग्रेजी में अनुवाद किया। यह 1870 के आसपास की बात है। कालांतर में मैक्समूलर ने इनके अनुवाद का सहारा लेकर छह खंडों में वेदों का प्रकाशन किया। जॉर्ज थिबॉट जब संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य बने तब भारतीय दर्शन शास्त्र के अध्ययन पर तेजी से काम शुरू हुआ। थिबॉट अलवर के पंडित श्रीराम मिश्र के शिष्य थे। थिबॉट ने शुल्ब सूत्र, बोधायन सूत्र पर भाष्य के साथ ही शंकराचार्य और रामानुजाचार्य के ब्रह्मसूत्र भाष्य पर अंग्रेजी टीका लिख कर वेदांत दर्शन को विश्वमंच पर पहुंचाया। 1914 में ऑर्थर वेनिस संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य हुए। 1918 में सर गंगानाथ झा संस्कृत कॉलेज के प्रथम भारतीय प्राचार्य बने। बिहार के मधुबनी में जन्मे गंगानाथ झा न्याय-वैशेषिक और जैन-बौद्ध दर्शन समेत संस्कृत के शिखर विद्वान थे। तंत्रशास्त्र के उत्कृष्ट विद्वान पंडित गोपीनाथ कविराज 1923 में संस्कृत कॉलेज के प्राचार्य बने। बंगाल में जन्मे और जयपुर के महाराजा कॉलेज में पढ़े कविराज 1937 तक प्राचार्य रहे।

सरकार समझे दायित्व
अगर सरकार वास्तव में संस्कृत का भविष्य सुरक्षित करना चाहती है तो उसे अपने ऐतिहासिक दायित्व को समझना चाहिए। जैसे अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय में समझा गया था। उस वक्त संस्कृत को भरपूर प्रोत्साहन दिया गया। संस्कृत केंद्रों की आर्थिक कमी को दूर किया गया। संस्कृत शिक्षकों की नियुक्ति का रास्ता खोला गया। देश में तीन मानित संस्कृत विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई। इनमें से दो दिल्ली में और एक तिरुपति में हैं। फिर भी केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा प्राप्त एक भी संस्कृत विश्वविद्यालय देश में नहीं है। हालांकि दिल्ली के लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ के कुलपति प्रो. रमेश कुमार पांडेय का मानना है कि ‘सिर्फ सरकार के सहारे कोई भी भाषा खड़ी नहीं हो सकती। समाज को भी संस्कृत के लिए आगे आना होगा।’ प्रो. पांडेय के इस कथन को हिब्रू भाषा का संघर्ष प्रमाणित करता है। यहूदियों की भाषा हिब्रू थी, जिसे शताब्दियों पहले उन्होंने पढ़ना और प्रयोग करना छोड़ दिया था। उन्होंने अंग्रेजी और अन्य भाषाएं पढ़नी शुरू कर दी थी, जिनसे उन्हें नौकरी और सम्मान मिला। पर अब वहां के लोगों ने अपनी भाषा को फिर से पढ़ना शुरू कर दिया है। हिब्रू अब वहां न सिर्फ बोलचाल की भाषा है, बल्कि इसे राजभाषा और न्यायालयों की भाषा का दर्जा मिल गया है। इसी प्रकार सभी भारतीयों को संस्कृत की उन्नति के लिए प्रयत्न करना चाहिए। अगर हम भी हिब्रू की भांति संस्कृत को अपना लें, तो यह पुनर्जीवित होकर अपने पांवों पर खड़ी हो सकती है।