नसीम साकेती
दक्षिण दिशा में महरूवा से एक सड़क बसोहरी के पास मड़हा नदी पर बने पुल को पार करके गोसाईगंज की ओर चली जाती है। इसी तरह दूसरी सड़क पश्चिम में स्थित भीटी से कोटवा के टीले को निहारती हुई हाल में अस्तित्व में आई अकबरपुर चीनी मिल से होती हुई तिवारीपुर के पास फैजाबाद रोड से गले मिल कर विश्व प्रसिद्ध कौतूहलपूर्ण ‘सीमई कारीरात’ गांव जहां पूरे गांव में किसी के घर में चौखट और दरवाजा नहीं लगाया जाता, की ओर विहंगम दृष्टि डालते हुए अकबरपुर की ओर चली जाती है। ये दोनों सड़कें जहां एक-दूसरे को नब्बे अंश के कोण पर काटती हैं, वह मिझौड़ा चौराहा के नाम से जाना जाता है। इस चौराहे से अनेक परिवारों की रोजी-रोटी का रिश्ता जुड़ा है। इस चौराहे को सबसे पहले आबाद करने वालों में रामखेलावन परचून वाले, कलीम खां साइकिल मिस्त्री, मिठाई लाल मिठाई वाले, सरजू पान-बीड़ी-सिगरेट-गुटखा वाले, फत्ते दर्जी और डॉ. जमशेद हैं, जो वैद्य, हकीम, एलोपैथिक और होमोपैथिक सभी प्रकार के इलाज के लिए पूरे जवार में जाने जाते हैं।
रामखेलावन परचून वाले की दुकान के पास एक विशालकाय बरगद का पेड़ है, जिसके चारों ओर निस्संतान रामखेलावन ने पक्का चबूतरा बना कर शंकरजी का एक छोटा-सा मंदिर बना दिया है। अब बरगद की जड़ों ने चबूतरे को कई जगह से फाड़ कर दरारों की शक्ल दे दी है। चबूतरे के बैठ जाने के कारण मंदिर भी एक ओर झुक गया है। मंदिर के शीर्ष पर लगा त्रिशूल भी तिरछा हो गया, जिसे सीधा करने के लिए एक रस्सी बांध कर बरगद के तने से लपेट दिया गया है।
इसी चबूतरे के पश्चिमी कोने पर कल्लू नाई की गुमटी है। कहते हैं कि कल्लू नाई के हाथ में जादू था। टूटी-फूटी बाबा आदम के जमाने की कुर्सी पर ग्राहक के बैठते ही कल्लू का स्वर उभरता- काका, दादा, भैया, अगर छोटा हुआ तो मुन्नू, क्या कराना है…? उत्तर में लोगों के स्वर उभरते- बाल कटवाना है। दाढ़ी बनवानी है।
फिर जैसे ही उसके हाथ कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को स्पर्श करके उस्तरा या कैंची चलाना शुरू करते, उस व्यक्ति को नींद आने लगती। कल्लू को उस व्यक्ति को हिला-डुला कर जगाना पड़ता- काका, सोइए नहीं। दादा, आंख खोले रहिए। … मुन्नू उस्तरा लग जाएगा, सोओ नहीं।
एक दिन प्रधान जी की दाढ़ी बनाने के बाद कल्लू, मिठाईलाल की दुकान पर चाय पीने चला गया। वहीं साइकिल मिस्त्री कलीम खां मिल गए।
‘मिस्त्री, आज आपसे चाय पीने का मन कह रहा है।’ कल्लू बोला।
‘कल्लू भाई, अभी तक बोहनी नहीं हुई है। पंचर वाली कोई साइकिल नहीं आई। दुकान खोलते ही एक लड़का हैंडिल सीधा कराने आ गया। एक बुढ़ऊ बाबा की पैडिल टेढ़ी हो गई थी, जो बार-बार उनकी धोती से फंस जाती थी… अभी तक सभी फोकटिया काम किया है, और तुम्हारे यहां तो सवेरे से ही भीड़ लगी है।’
‘हां मिस्त्री, दुआ करो इसी तरह भीड़ लगती रहे, सुमन का हाथ अबकी जाड़ा में जरूर पीला करना है।’
‘जरूर ठाकुर।… बिटिया जितनी जल्दी घर से चली जाए, उतना ही अच्छा है। बलेसर बेचारा पैसे के अभाव में अभी तक अपनी जवान बिटिया का हाथ पीला नहीं कर पाया है। रात दिन मेहनत करता है।…’
‘अच्छा अब चलें मिस्त्री, गुमटी के पास दो-तीन लोग आ गए हैं।’ चाय का खाली गिलास मेज पर रख कर अपनी और कलीम मिस्त्री की चाय का पैसा मिठाईलाल को देकर वह अपनी गुमटी की ओर बढ़ने लगा। गुमटी के अंदर प्रधान जी कुर्सी पर बैठे-बैठे अभी तक सो रहे थे।
‘प्रधान जी, सवेरा हो गया।’ कल्लू हंस कर बोला।
‘प्रधान जी ने हड़बड़ा कर आंखें खोलीं और उठते हुए बोले- ‘तुम्हारे हाथ में जादू है। जब घर पर रहते हैं, तो दिन में लाख कोशिश करने पर भी नींद नहीं आती, यहां तक की प्रधानिन से सिर पर तेल रखवाने पर भी, और तुमने हाथ लगाया नहीं कि नींद आने लगती है, क्या माजरा है?…’
‘प्रधान जी, सब बगल वाले भोले शंकर की कृपा है।’
प्रधान जी कल्लू को दाढ़ी की बनवाई देकर दर्जी की दुकान की ओर मुड़ गए।
आज मिझौड़ा चौराहे पर साप्ताहिक बाजार का दिन था, साप्ताहिक बाजार में पूरे जवार से दाल, चावल, गेहूं, मिर्च, मसाला, भांति-भांति की हरी सब्जियां, गोश्त, मछली, सौंदर्य प्रसाधन की वस्तुएं, चूड़ी, माला, झालर, सिले-सिलाए बच्चों के सूट, पेटीकोट, ब्लाउज, बर्तन आदि की दुकानें सड़क के किनारे सज जाती हैं। लोग सप्ताह भर का खाने का सामान और अन्य जरूरत की वस्तुएं इसी साप्ताहिक बाजार से लेकर रख लेते हैं। साप्ताहिक बाजार में सामान सस्ता भी मिल जाता है।
कल्लू की भी आज के दिन पौ-बारह रहती है। काफी कमाई हो जाती है। काम की अधिकता के कारण आज के दिन कल्लू दोपहर का भोजन करने घर नहीं जाता, बल्कि उसकी पत्नी कलावती दोपहर का भोजन चौराहे पर लाकर दे जाती है। आज भी वह खाना लेकर आई थी, लेकिन काम अधिक होने के कारण कल्लू ने कहा- ‘किनारे रख दो बाद में खाएंगे।’
कलावती खाने का डिब्बा किनारे रख कर चली गई। उसका घर कोटवा से आगे कोराड़चक में था।
भीड़ के कारण कल्लू को आज सिर उठाने की भी फुरसत नही मिली। शाम होते-होते भीड़ धीरे-धीरे काई की तरह छंटने लगी। सूरज पश्चिम की तलैया में डूबने लगा। उसने गुमटी में ताला लगाया और सब्जी लेने सब्जी मंडी की ओर चल पड़ा। इस बाजार में सभी सब्जियां देहात से दो घंटे पहले खेत से निकाली हुई, एकदम ताजा आती है। कल्लू का नियम था कि वह शाम को सब्जी लेता था, क्योंकि देहात से सब्जी बेचने आए लोग जब घर जाने लगते हैं तब बची हुई सब्जी सस्ते में बेच जाते हैं। आज कल्लू ने और दिनों की अपेक्षा कुछ अधिक सब्जियां खरीदी थीं, क्योंकि कल उसकी बेटी सुमन के रिश्ते के लिए श्रवण-क्षेत्र के किसी गांव से कुछ लोग आने वाले हैं। यह वही ऐतिहासिक श्रवण-क्षेत्र है जहां मड़हा और बिसुइ नदियों के संगम से वजूद में आई ‘टौंस’ नदी के किनारे जब श्रवण कुमार अपने अंधे माता-पिता की प्यास बुझाने के लिए कमंडल में पानी भर रहे थे, तो राजा दशरथ ने शब्द-भेदी बाण चला दिया, बाण श्रवण कुमार को लगा और उनके प्राण-पखेरू उड़ गए।
कल्लू ढेर सारी सब्जियां लेकर घर की तरफ बढ़ रहा था। अभी वह दिलावलपुर के आगे ईदगाह के सामने ही पहुंचा था कि चीनी मिल की ओर से हवा से बातें करते आ रहे ट्रक ने कल्लू को ऐसी टक्कर मारी की वह कटे पेड़ की तरह धराशायी हो गया। ट्रक उसके सीने और सिर को रौंदता हुआ मिझौड़ा चौराहे की ओर तेजी से भाग चला। मगर बाजार से लौट रहे कुछ लोगों ने उस ट्रक को किसी को रौंदते हुए देख लिया था, उन्होंने शोर मचाना शुरू किया। शोर सुन कर अच्छी-खासी भीड़ सड़क पर आ गई। विवश होकर ड्राइवर को ट्रक रोकना पड़ा। भीड़ ने ट्रक को घेर लिया। इतनी देर में मिझौड़ा चौराहे की पुलिस चौकी से दो पुलिस वाले आ गए और ड्राइवर को ट्रक से उतार लिया कि भीड़ कहीं उसकी जान न ले ले। भीड़ का गुस्सा शांत करने के लिए पुलिसिया चाल चलते हुए, पुलिस वालों ने ड्राइवर को दो-तीन थप्पड़ भी मारे और बोले-‘साले… शराब पीकर ट्रक चलाते हो!’ आक्रोशित भीड़ का गुस्सा शांत होते न देख दोनों पुलिस वाले ड्राइवर को मोटरसाइकिल पर बिठा कर वहां से रफूचक्कर हो गए। भीड़ उत्तेजित होती जा रही थी। ड्राइवर तो उन्हें मिला नहीं, उन्होंने अपना गुस्सा ट्रक पर उतारा और उसे आग के हवाले कर दिया। अब भीड़ दुर्घटना-स्थल की ओर बढ़ने लगी। वहां पहुंच कर लोग सन्न रह गए।
‘अरे! यह तो कल्लू है!’ बगिया वाले कलीम भैया की आवाज उभरी।
कल्लू खून से लथपथ था। उसकी जीवन-लीला समाप्त हो चुकी थी। यह खबर उसके घर पहुंची। उसकी पत्नी, सुमन और अन्य बच्चों के साथ बदहवास हाल घटना स्थल पर पहुंची और काठ मार-सी गई। सुमन तथा बच्चों की चीत्कार से वातावरण बोझिल होकर गमगीन हो गया। कल्लू की पत्नी कलावती को जैसे सांप सूंध गया हो, वह एकदम खामोश खड़ी रही, लेकिन थोड़ी देर बाद उसकी खामोशी भी चीत्कार में बदल गई। वह और उसके बच्चे कल्लू से लिपट कर अपने होश-हवास खो बैठे।
सरकारी औपचारिकताओं के बाद दूसरे दिन जब कल्लू का शव उसके घर पर लाया गया, तो वहां भीड़ उमड़ आई थी, जो कल्लू की लोकप्रियता की परिचायक थी।
अंतिम संस्कार और अनुष्ठान संपन्न हो गए।
एक दिन कलावती अपने घर के सामने झाडू लगाने के बाद एक कोने मे बैठे थी। थोड़ी देर बाद सुमन और अन्य बच्चे भी आ गए और मां के सामने जमीन पर पालथी मार कर बैठ गए। कोई बोल नहीं रहा था, सभी के चेहरों पर चिंता थी। कलावती ने सुमन की ओर देखा और जाने कहां खो गई। सुमन भी मां को देख कर शायद सोचने लगी थी… माई, मेरा क्या होगा?
मां की ममता ने शायद सुमन के मन की आवाज सुन ली। वह सुमन की ओर देख कर मन ही मन बोली- ‘बेटी, मैं हूं न!’
वह मन ही मन कह तो गई कि मैं हूं न, लेकिन यकायक चौंक उठी, क्योंकि न तो उसके पास खेती-बाड़ी थी और न रोजगार का कोई और साधन। सुमन की शादी और बच्चों के पालने-पोसने, पढ़ाने-लिखाने का संकट मुंह बाए उसके सामने खड़ा था। ऐसी हालत में बुलंद हौसले वाले भी टूट कर बिखर जाते हैं। अंधेरे में परछाइयां भी साथ छोड़ देती हैं। नाते-रिश्तेदार भी मुंह मोड़ लेते हैं।
दिन बीतते गए और कलावती भी इन अनुभवों से गुजरते हुए अपनी मंजिल की तलाश में जुट गई। एक सुबह क्रांतिकारी निर्णय लेते हुए उसने हाथों में कैंची, कंघा और उस्तरा लिया और अपने बच्चों के साथ मिझौड़ा चौराहे पर आकर अपने पति की गुमटी में लगे ताले को खोल कर उसकी साफ-सफाई की और अगरबत्ती सुलगाई। लोग कौतूहल से उसे देख रहे थे। उसने सबसे पहले अपने बेटे सुनील को कुर्सी पर बिठा कर उसके बाल काटना शुरू किया।
आज से काफी पहले एक दिन की बात है, जब कल्लू जीवित था, कलावती किसी बात पर मनोविनोद करती हुई बोली थी- ‘तुम नाउ ठाकुर हो, तो मैं भी नाउन ठकुराइन हूं।’
‘तो क्या तुम चौराहे पर जाकर गुमटी में मेरी तरह बाल काट सकती हो? दाढ़ी बना सकती हो?’
‘क्यों नहीं?’
चुहल-चुहल में उसने कैंची-कंघा उठाया और अपने बेटे सुनील के बाल काटने लगी थी। कल्लू ने अपनी पत्नी की ओर देखा और मुस्करा कर कुछ सोचने लगा था, ‘अरे, तुम तो सचमुच…।’ और फिर एक दिन तो हद ही हो गई, जब कल्लू शाम को अपनी दुकान बढ़ा कर घर आया, तो कलावती उसकी दाढ़ी की ओर हाथ से इशारा करते हुए बोली- ‘दाढ़ी बढ़ा कर साधु बन कर ‘जंगली बाबा’ के मंदिर में बैठना है क्या?…’
‘नहीं जी।’
‘फिर?’ और उसने शरारत से अपनी आंखें मटकाते हुए कल्लू की ओर देखा।
‘चार-पांच दिन से बड़ी भीड़ हो रही है, सहालक की वजह से, फुरसत ही नहीं मिलती कि अपनी दाढ़ी बना लूं। वैसे मैंने आज सोचा था कि चिकना होकर तुमसे मिलूंगा।’
‘धत…’
‘तुम तो नाउन ठकुराइन बनती हो, तुम्हीं बना दो न…?’
‘एकदम बना सकती हूं।’
‘अरे! नहीं… नहीं… मैं तो ऐसे ही चुहल कर रहा था।’ कल्लू बोला, लेकिन कलावती ने गजब की मुस्कराहट के साथ कल्लू से धीरे से कुछ कहा, जिसे सुन कर वह लोट-पोट हो गया और बोला- ‘अच्छा, अगर ऐसी बात है तो… ’ और कलावती सचमुच उसकी दाढ़ी बनाने लगी थी। कल्लू आंखें फाड़े उसे देखता रहा था।
आज कलावती ने मिझौड़ा चौराहे पर बिना किसी शर्म-हया के बाकायदा लोगों के बाल काटने और दाढ़ी बनाने का काम शुरू कर दिया था और वह भारतीय गांवों की ‘प्रथम महिला नाई’ बन गई।
उसके इस हैरान करने वाले निर्णय पर उसकी बिरादरी के लोग नाक-भौं सिकोड़ने लगे। कुछ लोग तो आग-बबूला हो रहे थे, बिरादरी से बाहर करने की बातें कर रहे थे, लेकिन वह उनकी परवाह किए बिना अपनी मंजिल की ओर बढ़ती रही।
धीरे-धीरे कल्लू की उस गुमटी में पहले जैसी रौनक लौट आई।
डसके बच्चों की खुशियों का ठिकाना न रहा, फूले नहीं समा रहे थे। उनमें सबसे ज्यादा खुशी सुमन के चेहरे पर नाच रही थी।

